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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 408 में से

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पृष्ठ 359

आदर्शों का संघर्ष / 357

बढ़कर सामने देखा तो देखता हूँ धान के खेतों के बीच न जाने कहाँ छिप गए हैं।
एक लम्बे से बाँस की सहायता से मल्लाह पानी के नीचे की भूमि को ढकेलते
हुए अपनी नाव को आगे बढ़ा रहा है। मैं छप्पर के नीचे से निकलकर नाव के
बाहरी भाग पर खड़ा हो गया तो क्या देखता हूँ कि चारों तरफ अनन्त की ओर
धान के पौधे विस्तृत हैं। और बीच-बीच में कुछ बड़े-बड़े वृक्ष भी दिखाई देते
हैं। संभव है मल्लाह इन्हीं वृक्ष तथा बगीचों को देखकर अपने रास्ते का निर्णय
करता हो। कभी-कभी दूसरी ओर से अन्य नावों को भी आते-जाते देखते थे।
इसी प्रकार खेतों के बीच से नावों पर चलते-चलते एक खाड़ी के अन्दर आ गए।
यह स्थान स्वप्न-लोक-सा मालूम पड़ता था। खाड़ी दोनों ओर से वृक्षों से घिरी
हुई थी। दोपहर के समय भी चारों दिशाओं में सूर्य की दीप्ति रहते हुए भी वृक्षों
से घिरी हुई इस खाड़ी के अन्दर अँधेरा-सा लग रहा था। औपन्यासिकों की सृष्टि
नितान्त काल्पनिक नहीं होती। हम षड्यन्त्रकारी गण ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध
अंग्रेजों की पलटनों और पुलिस की दृष्टि बचाते हुए इस प्रकार नद-नदी और
खाड़ियों के बीच स्वप्नवत घूमते-घूमते मैमनसिंह के एक गांव को गए और लौट
आए।
मैमनसिंह के गांव में जिस मकान में हम लोग ठहरे थे उसके कितने ही कमरे
बाँसों के मचानों के ऊपर बने हुए थे। इस समय पानी तो हट गया था परन्तु
समस्त स्थान सेंवार से भरे हुए थे। इस दृश्य से मनुष्य व्याकुल हो उठता है।
गुप्त मीटिंग होने के बाद इस मकान में हम लोगों को एक रात और रहना पड़ा
था। अनुशीलन समिति के एक नेता श्री प्रतुल गांगुली और मैंने एक ही कमरे में
रात्रि व्यतीत की थी। एक रात जगने के बाद दूसरी रात हम लोग खूब सोये।
पुलिस हम लोगों की खोज में थी। बंगाल आर्डिनेंस के अनुसार हम लोग गिर-
फ्तार किये जा सकते थे। हम लोगों के वारंट नाम से निकले हुए थे। सोते
समय प्रतुल बाबू ने दो मनुष्यों को बारी-बारी से पहरे में रख दिया था।
मीटिंग का सब काम समाप्त होने पर मैं और प्रतुल बाबू कलकत्ता वापस
लौटे। मेरे साथ बंगवाणी नामक प्रसिद्ध बंगला मासिक पत्र के कुछ अंक थे।
इनमे मेरे लिखे हुए बन्दी जीवन के द्वितीय भाग के कुछ अंश छपे थे। रास्ते में
मैंने प्रतुल बाबू को अपने लिखे हुए इन अंशों को पढ़कर सुनाया।
प्रतुल बाबू चाहते थे कि मैं उनके साथ कलकत्ता को वापस जाते हुए बंगाल
के कुछ जिलों में जाऊँ। मैं जानता था कि प्रतुल बाबू को बंगाल की खुफिया
पुलिस अच्छी तरह से पहचानती है। और मैं यह भी जानता था कि बंगाल की
अधिकांश पुलिस मुझे नहीं पहचानती। इसलिए मैं प्रतुल बाबू के साथ नहीं जाना
चाहता था। प्रतुल बाबू ने मुझे अपने साथ ले जाने के लिए बहुत अनुरोध किया
परन्तु मैंने स्वीकार नहीं किया। आखिर में हुआ वही। मैं तो अपने स्थान पर
सकुशल पहुँच गया लेकिन प्रतुल बाबू घूमते-घूमते एक स्थान पर गिरफ्तार हो
गए।