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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 408 में से

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पृष्ठ 364

362 / बन्दी जीवन

पड़ा कि भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन निरा बच्चों का खिलवाड़ नहीं है। परन्तु
उनकी गांधी-प्रीति उन्हें हमारे दल में आने से रोक रही थी। यदि किसी दिन
तुमुल तर्क के बाद मैं उन्हें कुछ झुकता हुआ पाता था तो किसी दूसरे दिन पुनः
वही पुराना तर्क खड़ा हो जाता था। धीरेन्द्र बार-बार इस बात पर जोर देते कि
अहिंसा नीति पर ही विराट् जन-आन्दोलन की सृष्टि हो सकती है जैसी महात्मा
जी ने की है। उनके समझाने पर भी मैं यह नहीं समझ पाता था कि विराट् रूप
से जन-आन्दोलन करने के लिए अहिंसा के सिद्धान्त पर इतना अधिक जोर डालने
की क्या आवश्यकता है। महात्माजी के कथनानुसार यह बात सत्य नहीं है कि
व्यक्तिगत जीवन में जैसा हम तपस्या के परिणाम में अहिंसा के द्वारा हिंसा को
जीत सकते हैं, उसी तरह से तपस्या न करके ही असंख्य जनसाधारण स्थूल दृष्टि
से अहिंसक रहने पर कैसे हिंसा पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। ममत्व बोध का
पूर्ण रीति से बिना त्याग किए कोई भी मनुष्य यथार्थ में अहिंसक नहीं हो सकता
है। ममत्व बोध का त्यागना जीवनभर की तपस्या का परिणाम होता है। जन-
साधारण से ऐसी तपस्या की आशा हम कैसे कर सकते हैं फिर परिपूर्ण तपस्या के
बाद जो कुछ प्राप्त की जाती है उस सिद्धि को पहले ही आधे रास्ते में ही हम कैसे
प्राप्त कर सकते हैं। इन सब कारणों से सैद्धान्तिक रूप से हम अहिंसा नीति का
प्रयोग राजनीति के क्षेत्र में नहीं कर सकते। इसका अर्थ यह नहीं है कि हिंसा के
मार्ग पर ही हम जन-आन्दोलन को चला सकते हैं, हमारे पास अस्त्र नहीं है इस-
लिए हम बाध्य होकर जन-आन्दोलन को ऐसे मार्ग पर चला देंगे जिसमें अस्त्र की
आवश्यकता नहीं होगी। महात्माजी की मनोकामना तो यह है कि संसार को अहिंसा
रूपी नवीन धर्म देकर अपने जीवन को सार्थक बनाएं। इस नवीन धर्म प्रचार के
सामने भारत की स्वतन्त्रता का प्रश्न नितान्त तुच्छ बन गया है परन्तु पिछले
महायुद्ध के अवसर पर ब्रिटिश सरकार को अर्थ एवं जन की सहायता देकर
महात्माजी ने कैसे अहिंसानीति का पालन किया यह बहुतों के लिए नितान्त
दुर्बोध्य है। मेरे ऐसे क्रान्तिकारी के निकट अहिंसा के प्रश्न की मीमांसा इस
प्रकार है कि जैसे एक प्रवीण चिकित्सक रोगी की मंगल-कामना से प्रेरित होकर
उसकी देह पर बल-प्रयोग अथवा शल्योपचार करता है तो इस आचरण को कोई
भी सुधी जन हिंसात्मक नहीं कह सकता। उसी तरह यदि कोई क्रान्तिकारी
सरलतापूर्वक शुद्ध हृदय से निरहंकार होने की प्रबल चेष्टा करते हुए समाज की
कल्याण कामना से प्रेरित होकर सशस्त्र विद्रोह के लिए षड्यन्त्र करता है तो वह
भी हिंसा नहीं है। सशस्त्र क्रान्ति का आन्दोलन उचित है या नहीं, हिंसा-अहिंसा
के प्रश्न के साथ इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। भारतीय दार्शनिक दृष्टि से हम यह
कह सकते हैं कि जो व्यक्ति ममता बोध का अतिक्रम कर चुका है उसके निकट
हिंसा अथवा द्वन्द्व ममत्व बोध तक ही सीमित है। जिस साधक का ममत्व बोध
लुप्त हो गया है और उसका जीवन लक्ष्य मानव-समाज की सेवा करना है उसका
व्यक्तित्व मानव-समाज से भिन्न नहीं है। कौन-सा लक्ष्य मानव-कल्याण के