बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] आदर्शों का संघर्ष / 345
वासियों से निवेदन नामक मेरे नाम से प्रकाशित एक पर्चे में देशबन्धुदास के क्रान्ति-
कारी-विरोधी सिद्धान्त का मैंने स्पष्ट शब्दों में युक्तिपूर्ण रीति से खंडन किया था।
इसी बात से वे मुझसे अत्यन्त रुष्ट हो गए थे। इस पर्चे के प्रकाशित होने के बाद
जब मैं उनसे मिलने के लिए उनके मकान पर गया तो उन्होंने मुझसे मिलने से
इनकार कर दिया। मैं समझ गया कि राजनीतिक-चालों से मैं नितान्त अनभिज्ञ
हूँ। कांग्रेसी नेतागण जब जी चाहे प्रकाश्य रूप से वक्तृता-मंच पर अथवा संवाद-
पत्रों में क्रान्तिकारी आन्दोलन की यथेष्ठ निन्दा करते हैं। उन्हें यह भलीभाँति
मालूम है कि क्रान्तिकारियों के लिए प्रकाश्य रूप में अपने पक्ष का समर्थन करने
का कांग्रेस नेताओं की तरह अवसर अथवा सुयोग प्राप्त नहीं है।
देशबन्धु सी० आर० दासजी ने गया कांग्रेस के सभापति के आसन से क्रान्ति-
कारी आन्दोलन के प्रति कुछ कटाक्ष किए थे। उन्होंने यह कहा था कि क्रान्तिकारी
आन्दोलन सफल नही हो सकता, इसलिए मैं क्रान्तिकारी आन्दोलन में योगदान नहीं
करता हूँ। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि मेरी समझ में यह बात आ जाय कि
क्रान्तिकारी आन्दोलन सफल होगा तो मैं उसी क्षण इस आन्दोलन में शामिल हो
जाऊंगा। लेकिन उन्होंने अहिंसा नीति के आधार पर क्रान्तिकारी आन्दोलन का
विरोध नही किया। इसके प्रत्युत्तर में मैंने लिखा था कि जिस दिन सबको यह
प्रतीत हो जाएगा कि क्रान्तिकारी आन्दोलन सफल होने जा रहा है उस दिन तो
लाखो की संख्या में मनुष्य इस आन्दोलन में भाग लेने लगेंगे। उस दिन देशबन्धु
जैसे व्यक्ति इस आन्दोलन में भाग लेंगे या नही इसका विशेष महत्त्व नही रह
जाएगा। जिस देश मे विदेशी सरकार जब जैसा चाहे वैसा ही क़ानून बना सकती
है उस देश मे क़ानूनी लड़ाई लड़ना अथवा जिस देश में विदेशी सरकार पाशविक
बल से शासन करती है उस देश में बल का प्रयोग न करके स्वाधीनता के लिए
लड़ाई करना बातुलतामात्र है ऐसा मैंने उस पर्चे में लिखा था। मैंने यह भी बताने
की चेष्टा की थी कि क्रान्तिकारी आन्दोलन आतंकवाद नही है कारण यह कि
भारत मे किसी भी क्रान्तिकारी का यह विश्वास नहीं है कि केवल आतंकवाद से
ही स्वाधीनता प्राप्त हो सकती है। यदि सरकारी अत्याचारों के विरुद्ध इक्का-
दुक्का व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल का प्रयोग भी करते हैं तो उसका अर्थ नही हुआ
कि क्रान्तिकारीगण निरे आतंकवाद से ही स्वाधीनता की लड़ाई लड़ना चाहते हैं।
इसी प्रकार क्रान्तिकारी आन्दोलन के विरुद्ध आक्षेपों का उत्तर इस लेख में था।
मैंने अपने नाम से इस 'देशवासी के प्रति निवेदन' शीर्षक के पर्चे को छपवाया
था। कलकत्ता में प्रकाश्य सभाओं के अवसरों पर ये पर्चे बंटवाए थे। इस पर्चे ने
कलकत्ता में बड़ी खलबली मचा दी थी। यह पहला अवसर था कि भारतवर्ष में
किसी क्रान्तिकारी ने अपने नाम से प्रकाश्य गण्यमान्य नेता के विरुद्ध आन्दोलन के
समर्थन में आवाज़ उठाई थी।
इस पर्चे के कारण अनुशीलन समिति के दूसरे नेतागण मुझसे असन्तुष्ट हो
गए थे। मेरा अपना यह विश्वास था और अब भी है कि यदि क्रान्तिकारीगण