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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 360, कुल 408 में से

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पृष्ठ 360

358 / बन्दी जीवन
कलकत्ता पहुंचकर मैंने अनुशीलन समिति के दूसरे साथियों को फिर नये
सिरे से समझाना चाहा कि हम सब प्रतुल गांगुली की तरह एक-एक करके
गिरफ्तार हो जाएंगे और काम कुछ भी न कर पाएंगे। इसलिए हमारे कार्यक्रम
में शीघ्र ही ऐसा परिवर्तन आवश्यक है जिससे गिरफ्तार होने के पहले हम लोग
कुछ कर सकें और भारतवर्ष के स्वतन्त्रता-संग्राम को आगे बढ़ा सकें।
मैमनसिंह से लौटते समय रास्ते में प्रतुल बाबू से मेरी जो कुछ बातचीत
हुई उससे मैंने अनुभव किया था कि प्रतुल बाबू उस समय तक कम्युनिज्म आदि
सिद्धान्तों से परिचित नहीं थे। भारतीय समाज के नव जागरण से राजनीतिक
क्षेत्र में नवीन चेतना का जैसे संचार होगा वैसे ही साहित्य, कला, ऐतिहासिक
गवेषणा, दार्शनिक सिद्धान्तों तथा धार्मिक भावनाओं में भी युगान्तकारी परिवर्तन
होंगे। इस बात से अनभिज्ञ रहने के कारण प्रतुल बाबू और उनके साथी राज-
नीतिक क्षेत्र के एक तंग दायरे के अन्दर ही अपने विशिष्ट कार्यक्रम में लिप्त
रहते थे। मैमनसिंह से वापस लौटते समय मैंने प्रतुल बाबू को अपने कुछ लेख
पढ़कर सुनाए थे। इन लेखों में कुछ दार्शनिक बातों की भी चर्चा थी। प्रतुल बाबू
इन सब बातों को उपेक्षा की दृष्टि से देखते थे। कम्युनिस्ट नेतागण इस बात
को भली प्रकार समझ गए हैं कि दार्शनिक विचार भूमि पर जिस सिद्धान्त की
प्रतिष्ठा नहीं हुई है उसकी उपयोगिता तथा उसका स्थायित्व सन्देह-युक्त है।
समाज का सर्वांगीण विकास तभी सम्भव है जब एक सुचिन्तित एवं सुविन्यस्त
विचारधारा के आधार पर उसकी अभिव्यक्ति होती हो। कम्युनिज्म के इस
दृष्टिकोण से भारतीय नवयुवकगण आज भी अच्छी तरह परिचित नहीं हैं।
कलकत्ता वापस आकर मैंने सब जिलों से अपने दल के कार्यकर्ताओं को
बुलाना प्रारम्भ कर दिया। अधिकांश कार्यकर्त्ता उग्र कार्यक्रम के पक्ष में थे।
हमारे सामने प्रश्न यह था कि एक ओर तो सरकार ने बिना मुकदमा चलाए हम
लोगों को पकड़-पकड़कर जेलों में बन्द करना प्रारम्भ कर दिया था और दूसरी
ओर अनुशीलन समिति के पुराने नेतागण ऐसा कोई काम करना नहीं चाहते थे
जिससे जनता में क्रान्तिकारी भावनाओं का यथेष्ठ प्रचार होता। मैं यह समझता
था कि संगठित रूप से विस्तारपूर्वक युक्तिपूर्ण ओजस्वी लेखों के द्वारा क्रान्ति-
कारी सिद्धान्तों का प्रचार होना परम आवश्यक है एवं इसके साथ-साथ अर्थ-
संग्रह के लिए देशी धनी व्यक्तियों पर डकैती न डालकर सरकारी सम्पत्ति को
लूटने का प्रबन्ध करना पड़ेगा। अनुशीलन के अन्य नेतागण इस बात से सहमत
नहीं हो रहे थे। परन्तु मैंने स्वतन्त्र रूप से इन सब बातों का प्रबन्ध करना
प्रारम्भ कर दिया।
मैमनसिंह सभा के निर्णय के अनुसार अनुशीलन समिति के पुराने कार्यकर्त्ताओं
ने अपने-अपने अधीन सब सदस्यों का मेरे साथ परिचय कराना प्रारम्भ कर दिया।
इसके अतिरिक्त बंगाल के दूसरे क्रान्तिकारी दलों के नेताओं से मैंने स्वतन्त्र रूप
से मिलना प्रारम्भ किया। इस सम्बन्ध में चटगांव के एक दल के मुख्य व्यक्तियों