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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

332 / बन्दी जीवन
वाद-विवाद में ऐसा भी समय आया जब प्रश्न खड़ा हो गया कि मैं जो करने जा
रहा हूँ वह उचित है या अनुचित। रवीन्द्रनाथ के बताने पर कि मैं अनुचित मार्ग
पर जा रहा हूँ मैंने माताजी से पूछा, "क्यों माताजी क्या तुम भी ऐसा ही समझती
हो ।" माताजी ने मृदु-मृदु हँसते हुए यह कहा कि "नहीं मैं ऐसा नही समझती हूँ।
मैं यह नहीं कह सकती कि तुम गलत रास्ते पर जा रहे हो। मैं केवल इतना ही
कहना जानती हूँ कि अब मुझसे सहा नहीं जाता। आज भी मेरे सामने वह दृश्य
भयानक आतंक की सृष्टि करता है जो कि मजदूरिन ने आकर तुम्हारी पहली
गिरफ्तारी के दिन कहा था। कपड़े का खूँट तुम्हारे गले मे लिपटा है, हथकड़ी से
दोनों हाथ बँधे हुए हैं, एक वस्त्र लेकर थाने की हवालात को तुम जा रहे हो।"
यह सन् 1915 की बात थी। राजनैतिक षड्यन्त्र के मामले मे यह मेरी पहली
गिरफ्तारी थी। उस दृश्य का वर्णन करते-करते माताजी का सुन्दर मुखावयव
ऐसा गम्भीर और कोमल हो गया जैसे वर्षणोन्मुख घन-विन्यस्त बादल होते हैं।
अभी तक हमारी बातचीत में कुछ ऊष्मा थी, कुछ हास-उपहास, कुछ व्यंग्य, कुछ
छेड़-छाड़ थी। अब सबके चेहरों पर कुछ गम्भीरता आ गई। माताजी ने मेरा
नाम लेकर फिर पूछा, "क्या तुम्हें डर नहीं मालूम होता ? क्या वे कालेपानी के
दृश्य तुम्हें याद नहीं आते ?" मैंने सरलतापूर्वक कहा, "माताजी ! मुझे आज भी
वे दृश्य स्पष्ट और मर्मान्तक रूप से याद हैं, उनसे मैं विचलित भी हो जाता हूँ;
डर भी मालूम होता है। जेल का भोजन, जेल अधिकारियों के तिक्त और निष्ठुर
व्यवहार ये सब बातें स्मरण आते ही रोम खड़े हो जाते हैं। और जिस मार्ग पर
मैं चल रहा हूँ उसका अन्तिम परिणाम मेरे लिए कुछ अच्छा नहीं है यह भी सत्य
है। परन्तु यह सब जानते हुए भी मैं कर्तव्य-पथ से कैसे हट जाऊँ ? यदि भारत
को स्वाधीन होना है तो मेरे ऐसे शत-सहस्र युवकों को ऐसे निर्मम निर्यातन सहने
ही पड़ेंगे। जिस रास्ते पर मैं जा रहा हूँ केवल इसी रास्ते से ही भारत स्वाधीन
हो सकता है और दूसरा रास्ता नहीं है।"
मेरी इस बात ने और माताजी के हार्दिक व्यथापूर्ण मौन समर्थन ने विवाद
का अन्त कर दिया। माताजी की बात ने मानो हम सब भाइयों के मन को झक-
झोर डाला। वृष्टि से जो पहले ही भलीभाँति आर्द्र हो चुका हो ऐसे वृक्ष को
झकझोरने से जैसे उसके पत्तों से एकदम बूंदों की बौछार होने लगती है वैसे ही
हम चारों के नयनों से नीर की बौछार होने लगी। रोते-रोते अपूर्ण उच्चारण से
मैंने कह दिया कि मेरे निकल जाने की सब तैयारी हो चुकी है। मैं अब वृथा काल-
क्षेप न करके निकल पडूँगा। उस समय यह नहीं मालूम पड़ता था कि कौन किसे
सान्त्वना दे। घंटेभर की ऊष्मता बाष्पाकार में परिणत हो गई। अव्यक्त एवं
अवर्णनीय स्नेह ने आँसुओं का रूप ग्रहण कर लिया। मानो हम परस्पर के और
निकटवर्ती हो गए। पता नहीं मेरी तरुणी भार्या पर क्या बीत रही थी। गोद में
बच्चे को लिये हुए बेचारी सर्व क्षण एकाग्रचित्त होकर बैठी हमारी बातें सुन
रही थी। पता नहीं अपने भाग्य को कोसती थी या सराहती थी। अथवा अनिश्चित

गृह-त्याग / 333
विपद् की आशंका से भय-विह्वल हो रही थी। ज्ञात-अज्ञात, निश्चित-अनिश्चित
मार्ग पर अनन्त दिशा की ओर पुत्र-कलत्रादि को साथ लेते हुए असहाय, संपदहीन
होकर चल पड़ने का दिन आ गया। न जाने किस देश में किस स्थिति में रहना
पड़ेगा। कहावत है 'पथे नारी विवर्जिता' और मैंने दो नन्हे-नन्हे बच्चों और
तरुणी भार्या को साथ लेकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए फरार
होने का साहस किया। अज्ञात दिशा में जाना था, इसलिए मौसी की पालित
कन्या से प्रार्थना की कि थोड़े दिनों के लिए तो आप मेरे साथ हो लीजिए। घर के
सब लोगों ने इस बात को स्वीकार कर लिया। नूटू दीदी मेरे साथ चलने को
तैयार हो गईं।
पुलिस की दृष्टि से बचना था। बाल-बच्चे असबाब बिस्तरे लेकर पुलिस की
निगाह बचाकर रेलवे स्टेशन से चलना है। स्टेशन पर पुलिस की सख्त निगरानी
है। इलाहाबाद में पुलिस मुझसे ज्यादा और किसे पहचानती थी ?
मेरे भाई मेरे बच्चों को लेकर स्टेशन के लिए रवाना होने लगे। मैं उस समय
घर में था। माताजी की सहन-शक्ति अन्तिम सीमा तक आ पहुंची थी। जितना
रोती थी उससे कहीं अधिक उनकी देह दुःखावेश में हिल रही थी। ओठ कांप रहे
थे, ठोड़ी संकुचित विकुचित हो रही थी। भोहें कुंचित थी, आंसू अविराम टपक
रहे थे। द्वार तक आकर जब माताजी मेरे बच्चे को लेकर गाड़ी पर चढ़ने लगीं
तो वह बहुत रोने लगी । मेरा दो साल का बच्चा झुक-झुककर बार-बार माता
जी का मुंह देख रहा था। बुद्धदेव को महाभिनिष्क्रमण के समय ऐसा दृश्य देखना
नहीं पड़ा था।
मैं सीधा स्टेशन नहीं गया। मेरे मामाजी और भ्राताओं ने मेरे बाल-बच्चों
को गाड़ी पर सवार करा दिया। गाड़ी छूटने के समय से एक-आध मिनट पहले
किसी दूसरे रास्ते से मैं अपने बाल-बच्चों मे आकर सम्मिलित हो गया। जहाँ
तक याद है यह दिन के क़रीब दस बजे का समय था।
प्रिय जन के विच्छेद के दुःख के अतिरिक्त मेरे मन में और कोई ग्लानि नहीं
थी। फरार जीवन मेरे लिए दुस्सहनीय न था। बहुतों ने मुझसे कहा है कि फरार
जीवन की अनिश्चयता ने उन पर इतना अधिक बोझा डाला था कि उससे पिसकर
उन्होंने सेंत में पुलिस के हाथों में आत्मसमर्पण कर दिया था। मैंने कभी भी ऐसे
बोझ का अनुभव नहीं किया। जब गाड़ी पर सवार हो गया तो मैंने एक अपूर्व
स्फूर्ति का अनुभव किया। पुलिस के सब प्रयत्नों को विफल करते हुए जब उनकी
आँखों में धूल झोंक दी तो मैंने एक छोटी-सी विजय की आत्म-तुष्टि का अनुभव
किया। पाठक यह न समझें कि पुलिसवालों के साथ हम लोगों का यह निरा आँख-
मिचौनी का खेल था। पकड़े जाने पर हम लोगों को जीवन से हाथ धोना पड़ता
था। देशवासी आज भी क्रान्तिकारियों के कार्यों को खिलवाड़ समझते हैं। लेकिन
ब्रिटिश सरकार की दृष्टि से हम लोगों के कार्यों का इतना गुरुत्व था कि हम लोगों
के पीछे सरकार ने लाखों रुपए खर्च कर दिए। केवल संदेहमात्र से ही किसी

334 / बन्दी जीवन
अज्ञात कुलशील युवक का पीछा करने मे सरकार ने हज़ार रुपए खर्च कर दिए
ऐसे दृष्टान्त बहुत हैं। क्रान्तिकारियों की सबसे बडी कमी यह थी कि वे अपने
प्रयत्नों में असफल रहे, नही तो आज उनके छिद्रान्वेषीगण लज्जावन्त मुख होकर
नीरव बैठे रहते । आज भी हमारे देशवासीं स्वतन्त्रता के प्रेमी नही बने है। आज
भी उनमें वह तीव्र अभिलाषा उत्पन्न नही हुई है जिसके कारण भारत की
स्वाधीनता-प्राप्ति के लिए वे अधीर हो जाते । अस्तु, मै प्रसन्नचित्त होकर दुर्दम-
नीय अभिलाषा के साथ द्विधाहीन होकर, विप्लव कार्य मे आगे बढ चला ।

15
फिर बंगाल में
मिर्जापुर पहुँचकर मैंने चन्द्रनगर मे श्री नरेन्द्रनाथ बनर्जी के पास एक तार
भेज दिया । मेरे आने की सूचना उनको थी । केवल इतना ही वे नहीं जानते
थे कि कब और किस दिन मैं उनके पास पहुँचूँगा । यदि मैं इलाहाबाद से तार
भेजता तो संभव था कि पुलिस की दृष्ट आकर्षित हो जाती । मिर्जापुर स्टेशन
से यदि कोई पथिक तार करे तो पुलिस की दृष्टि आकर्षित होने की सबसे
कम संभावना थी। लेकिन 'जहाँ कबीर माठा का जाएँ, पडिया भेंस दोनो मर
जाएँ' मैने सोचा था कुछ, हो गया कुछ और । लोग भाग्य को मानते नही । परन्तु
यह बहुधा देखा गया है कि हजारों प्रयत्न करने पर भी किसी मनुष्य के लिए
कभी भी सरल रूप मे शुभ परिणाम नहीं निकलते । मैं उन अभागों मे से एक था
और अब भी मेरे अदृष्ट मे कुछ अन्तर हुआ है ऐसा नही मालूम पड़ता । रास्ते
मे तो कोई विपत्ति नहीं आई। लेकिन चन्द्रनगर पहुँचकर मेरी विडम्बना की
सीमा न थी । मेरा टिकट तो कलकत्ते तक का था । इसका भी कुछ रहस्य था ।
चन्द्रनगर मे हमारी गाड़ी बहुत थोड़ी देर रुकी । मेरे पास सामान यथेष्ठ था ।
चन्द्रनगर के स्टेशन पर मै बहुत उदग्रीव होकर देख रहा था कि नरेन्द्रनाथ आए
हैं या नहीं। नरेन्द्रनाथ को स्टेशन पर न देखकर मेरी उत्कण्ठा की सीमा न रही ।
परन्तु मुझे उतरना तो था ही। सहयात्रियों की सहायता से मैंने अपना सामान
उतार लिया और प्लेटफार्म पर असहाय की तरह इधर-उधर देखता और सोचता
रहा कि किसका सहारा लूं । घर-बार छोड़कर आया हूँ रहने का ठिकाना नहीं ।
नरेन्द्रनाथ जी का पता नही । इन्हीं के यहाँ ठहरने की बात थी । पहले से तय था
इन्हीं के मकान पर ठहरूँगा और सहायता के रूप मे मासिक कुछ दे दिया करूँगा ।
इनका मकान मैंने पहले से देख लिया था। कुलियों से सामान उठवा रहा था
और संदेहाकुल नयनों से इधर-उधर ताक रहा था । मन में भय था कहीं पुलिस-
वालों की दृष्टि मेरी ओर आकर्षित न हो जाय । इतने में स्टेशन से सब यात्री
चले गए थे, केवल दो-तीन व्यक्ति किसी के इन्तज़ार में प्लेटफार्म पर ठहर गए
थे, यह मेरी तरफ आए । मैं भी उनकी तरफ आगे बढ़ा । उन्होंने पूछा आप कहाँ
से आ रहे हैं, कहाँ जाएँगे । मैने उन्हें बताया कि मैं अपने एक मित्र श्री नरेन्द्रनाथ
बनर्जी के यहाँ जा रहा हूँ । उनके मुहल्ले का नाम बताया, पूछे जाने पर मैंने

336 / बन्दी जीवन

अपना नाम भी बताया। सब बातें सुनकर उन्होंने बहुत कौतुक अनुभव किया
और हँसकर बताया कि "आपका तार हम लोगों को मिला था। हमारे भी एक
आदमी का नाम शचीन्द्रनाथ है। वे भी मिर्ज़ापुर में ही रहते हैं और नरेन्द्रनाथ
भी हम लोगों में से इनका नाम है। चन्दनगर में एक ही मुहल्ले में दो नरेन्द्रनाथ
हैं। हम लोग समझ रहे थे कि हमारे आत्मीय शचीन्द्रनाथ आ रहे हैं। इसीलिए
स्टेशन पर आये थे। आपके मित्र को तो पता भी नहीं कि आप आ रहे हैं। अच्छा
हम अभी जाते हैं और उन्हें सूचित करते हैं कि आप आ गए हैं। आप लोग गाड़ी
पर आइए हम लोग सायकिल से चलते हैं।" कुछ तसल्ली हुई। आशा का उदय
हुआ। फिर हिम्मत बाँधी। नरेन्द्रनाथ का मुहल्ला बहुत दूर था। करीब घंटे-
भर चलने के बाद रास्ते में देखता हूँ कि नरेन्द्रनाथ अपने मकान से काफ़ी दूर पर
रास्ते में हम लोगों का इन्तजार कर रहे थे। हमें देखकर उन्हें कुछ प्रसन्नता नहीं
हुई। मैं मन-ही मन विचलित हो उठा। मेरा भय सच्चा साबित हुआ। अत्यन्त
घबड़ाहट के साथ नरेन्द्रनाथ जी ने कहा कि "आप लोगों का मेरे मकान मे रहना
संभव नहीं है। ब्रिटिश सरकार के एजेण्टों ने चन्दनगर के अधिकारी पुरुषों से कुछ
समझौता कर लिया है। अब फरार व्यक्ति का चन्दनगर में रहना आसान नहीं
है। बाहर से किसी आगन्तुक के आने पर हमें पुलिस को इत्तला देनी पड़ेगी।
ऐसी अवस्था में मेरे घरवाले आपको अपने यहाँ ठहराने के लिए प्रस्तुत नहीं है।"
मेग मुंह सूख गया। मुझमें इतना भी साहस बाकी नही रह गया कि मैं अपने स्त्री
और बच्चों की तरफ देखूं। तथापि अपने मन की व्यथा और विक्षोभ को मैंने
नहीं व्यक्त होने दिया। मैंने अपने मित्र से कुछ अनुनय विनय की और कहा कि
कम-से-कम दो-चार दिन तो ठहरने की व्यवस्था कर दो। उनके भय विह्वल
हृदय ने मेरी एक न मानी। मेरे पाम अधिक देर तक ठहरना भी उनके लिए दुःसह
हो गया। उनकी इस मानसिक स्थिति और आचरण को देखकर मेरे मन में
अत्यन्त क्रोध, घृणा एवं वितृष्णा की उत्पत्ति हुई। नरेन्द्रनाथ की तरफ लौटकर
देखने को दिल नहीं चाहा। गाड़ी वाले से कह दिया लोटो। अब किधर जाता।
मेरी पत्नी मुझ पर अत्यन्त अप्रसन्न हो गईं और कहने लगी, "इन्हीं आदमियों के
सहारे तुम इतना बड़ा काम करने जा रहे हो?" मैं इसका क्या उत्तर देता ! मैं
उनके चेहरे को एकाग्र दृष्टि से देख रहा था और अनुमान कर रहा था कि उनके
क्रोध और अप्रसन्नता की सीमा कहाँ तक पहुँची है। एक अपराधी व्यक्ति की
नाईं अपनी स्त्री की तरफ देखते हुए मैंने कहा, "कोई परवाह नहीं है अभी दूसरा
बन्दोबस्त हुआ जाता है।" मुंह से तो कह दिया लेकिन मन में डरता रहा। सन्
1914 के क्रान्तिकारीगण चन्दनगर में उपस्थित थे। पुलिस की दृष्टि से बचने के
लिए उन लोगों के यहाँ मैं नहीं गया था। चन्दनगर की राजनीतिक स्थिति से
मैं सुपरिचित था। नरेन्द्रनाथ जी ने मुझे कोई नई बात नहीं बताई थी। उनके
यह मेरे रहने के प्रस्ताव स्वीकार करने के पहले ही उन्हें सब बातें सोच लेनी
उचित थीं। इस प्रकार अकस्मात् मुझे विपत्ति के सागर में डाल देना उनका

फिर बंगाल में / 337
कितना बड़ा अपराध था पाठकगण स्वयं सोच सकते हैं।
नरेन्द्र के मुहल्ले से मेरे पुराने क्रान्तिकारी साथियों का मुहल्ला बहुत दूर
था। स्टेशन से नरेन्द्रनाथ के पास आने में घंटाभर लग गया था। अब फिर दूसरे
मुहल्ले जाने में एक घंटा लगा। साथ मे तीन महीने की एक शिशु कन्या और दो
साल का एक शिशु बालक भूख से व्याकुल हो रहे थे। पास दूध नही था। माता
के पयोधर से शिशु कन्या का निर्वाह हो चुका था। केवल दो-साल का बालक
क्षुधा से व्याकुल होकर अविरत रो रहा था। मेरी स्त्री ने फिर कहा, "तुम्हारे
काम में साथिन होने से और कोई आपत्ति थोड़े ही है, इन बच्चो के मुंह की तरफ
देखकर मुझसे सहा नही जाता। देखो अब इन बच्चो को क्या दूं, दो घंटे हो गए
अभी ठहरने का ठिकाना नही। तुम्हारे ऐसे साथी हैं कि तुम्हारे बाल-बच्चो को
सकट मे डालने मे उन्हे तनिक भी सकोच नही होता। ऐसे-ऐसे साथियो को लेकर
तुम काम करने चले हो। तुम्हे तजुर्वा तो कुछ है नही। हम लोगो को साथ
घसीटकर जाने कहां ले चले हो।" एक ओर ब्रिटिश सरकार से दुर्भावना की सीमा
नही है, दूमरी ओर नरेन्द्रनाथ जैसे साथियो के विश्वासघात से पीडित हो रहे है,
तिस पर अपनी प्रिया के मुख से यह सब अति मधुर वचन सुनकर मेरी अन्त-
रात्मा पर क्या बीत रही होगी पाठकगण इसका अनुमान कर सकते है। कितना
धैर्य, आत्मविश्वास, आदर्श निष्ठा, कितना अदम्य उत्साह एव आशावादी होने से
इतनी प्रतिकूलता के होते हुए भी क्रान्तिकारी अपना काम कर सकते है इसका
अनुमान पाठकगण स्वयं कर लेगे।
मै एक बडे पुराने लोक प्रसिद्ध क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस के एक आत्मीय
श्री श्रीशचन्द्र घोष के मकान को चलने लगा। रास्ते मे बच्चा बहुत रो रहा
था। और कोई उपाय न देखकर माताजी के दिए रसगुल्ले लडके को खाने को
दिए। क्षुधा की यन्त्रण से बालक के मुंह से इस समय एक या दो शब्द निकलते
थे 'दूध दाओ', बगला मे 'दो' को 'दाओ' कहते हैं। जीवन मे सर्वप्रथम मेरे बालक
ने इन्ही दो शब्दो का उच्चारण किया था। बेचारे के मुंह से 'दूध दाओ,' 'दूध
दाओ' के शब्द सुनकर अन्त मे हम लोगो ने उसे खाने को रसगुल्ले दिए। पूरा
रसगुल्ला खा जाने मे उसे कुछ भी समय न लगा। हमे डर था कि रसगुल्ला खाने
से कही बच्चे के पेट मे फोडा न हो जाए। एक रसगुल्ला और थोडा-सा रस खा-
पीकर बच्चा कुछ शान्त हुआ। हम लोगों को भी थोडी देर के लिए तसल्ली हो
गई। श्रीश बाबू को देखकर और भी तसल्ली हुई। बडी प्रसन्नता एव उत्सुकता
के साथ उन्होने मेरा स्वागत किया। मरुभूमि के बीच जलाशय को देखकर जैसे
पथिक सुखी होता है वैसे ही श्रीश बाबू को देखकर मुझे बेहद खुशी हुई।
बाबू श्रीशचन्द्र घोष के बारे मे दो-चार बाते यहाँ कह देना उचित होगा।
भारतवर्ष मे सबसे पहला जो बम षड्यन्त्र केस हुआ था जिसमे सर्वश्री अरविन्द
घोष, वारीन्द्रकुमार घोष, उपेन्द्रनाथ बनर्जी, हेमचन्द्रदास इत्यादि पकड़े गए थे
और भारत के इतिहास मे जिसने अलीपुर बम षड्यन्त्र केस के नाम से प्रसिद्धि

338 / बन्दी जीवन
लाभ की है बाबू श्रीशचन्द्र घोष इसी से सम्बन्धित दल के बचे-बचाए क्रान्तिकारी
थे। अलीपुर बम षड्यन्त्र केस सन् 1908 मे चला था। इसके बाद श्री मोतीलाल
राय और श्री श्रीशचन्द्र घोष ने इस दल के काम को जारी रक्खा था। श्री रास-
बिहारी बोस, जो आजकल जापान मे बस गए है और भारत में आने से जिन्हें
आज भी फांसी के तख्ते पर लटकना पडेगा, श्री श्रीशचन्द्र घोष के आत्मीय हैं,
गत महायुद्ध के समय श्रीश बाबू को लगातार कई वर्षों तक जेल में नजरबन्द
रहना पड़ा था। लडाई के अन्त मे जब दूसरे सब नजरबन्द छोड़ दिये गए थे
उसी अवसर पर श्रीश बाबू ने भी मुक्ति पाई थी। मुक्ति पाने के पहले श्रीश
बाबू ने पुलिस वालों की कुछ शर्तों को स्वीकार कर लिया था। श्रीश बाबू ने यह
स्वीकार कर लिया था कि भविष्य मे वे फिर किसी क्रान्तिकारी आन्दोलन मे
भाग नही लेंगे।
अण्डमन से लौटने के बाद श्रीश बाबू से मेरी बातचीत हो चुकी थी इसका
उल्लेख मै पहले ही कर चुका हूँ। मेरे मन में यह डर था कि शायद मुझे सहायता
देने मे उन्हें कुछ हिचकिचाहट हो। लेकिन फरार हालत मे चन्द्रनगर मे भेट होने
पर मुझे सहायता देने मे वे सहर्ष आगे बढे।
श्रीश बाबू अविवाहित थे। परन्तु उनके घर मे उनकी भावज, उनकी मौसी
इत्यादि स्त्रियाँ थी। अपने बाल-बच्चो को साथ लेकर मैं फरार हुआ था, यह
देखकर श्रीश बाबू घबडाए नही। बडी प्रसन्नता एव संयमपूर्ण आवेश के साथ
मेरे बाल-बच्चो को उन्होने स्त्रियों के पास भिजवा दिया। दरिया मे तैरते-तैरते
जब थके हुए मनुष्य का पैर किसी ठोस वस्तु को स्पर्श करता है उस समय उसकी
जो अनुभूति होती है अपने बाल-बच्चो को श्रीश बाबू के घर की स्त्रियो के पास
भेजकर मुझे भी वैसी ही तसल्ली हुई। बच्चो को दूध और मुझे साँस लेने का
समय मिला।
चन्द्रनगर कहने के लिए फ्रांसीसी है परन्तु यहाँ के गवर्नर को ब्रिटिश सरकार
अपने वश मे रखती है। तथापि क्रान्तिकारियों के लिए यहाँ कुछ सुविधा अवश्य
मिल जाती है। ब्रिटिश पुलिस सीधे आकर यहाँ पर धरपकड नही कर सकती।
फ्रांसीसी पुलिस की सहायता लिए बिना वह कुछ नहीं कर सकती। ब्रिटिश सर-
कार के गुप्तचर चन्द्रनगर में भी धड़ल्ले से घूमते हैं लेकिन किसी को गिरफ्तार
करने के लिए उन्हें फ्रांसीसी कोतवाली में जाना पड़ता है। इतने में क्रान्ति-
कारियों को अवसर मिल जाता है। ब्रिटिश सरकार के दबाव से चन्द्रनगर में भी
ये नियम बन गए हैं कि किसी भी परिवार में आगन्तुक के आने पर उन्हें थाने पर
सूचना देनी पड़ेगी। इसी प्रकार मकानदारों को भी नवागत के बारे में पुलिस
को सूचित करना पडेगा। ये सब बातें मुझे मालूम थीं। श्रीश बाबू ने मुझसे ये
सब बातें दोहराईं। अभी तक ब्रिटिश सरकार की तरफ से मुझ पर कोई अभियोग
नहीं लगा था। इसलिए सब बातें सोचकर मैंने निश्चय किया कि पुलिस को यदि
सूचना मिल भी जाय तो कोई हानि नहीं। मैं चन्द्रनगर में ही रहूँगा। पुलिस को

फिर बंगाल में / 339'
पता मिलने पर मेरे लिए चन्द्रनगर के बाहर जाना प्रायः असम्भव हो जाएगा
यह मैं जानता था, तथापि यह तो था कि एक भौगोलिक सीमा के अन्दर तो मैं
निरापद एवं निश्चित रूप से रह सकता हूँ। श्रीश बाबू के साथ मकान ढूंढ़ने के
लिए निकल पड़े। पहले एक होटल मे गए। इस होटल की मालकिन एक ऐंग्लो
इण्डियन बुड्ढी थी। उस स्थान का वातावरण और होटल का चार्ज सुनकर वहाँ
रहना उचित न समझा। उस स्थान का दृश्य तो मनोहर था। होटल के सामने
से एक चौड़ा रास्ता गंगाजी के किनारे-किनारे निकल गया था। फ्रांसीसियों ने
चन्द्रनगर एवं पाण्डीचेरी मे समुद्र एवं नदी के किनारे बड़े सुदृश्य और चौड़े
रास्ते बनाए थे। ऐसे दृश्य भारत के अन्य स्थानों मे विरले हैं। गंगा एवं समुद्र
के तटस्थल की भूमि पर ईंट की पक्की दीवारें खड़ी कर दी गई हैं एवं उनके
ऊपर से रास्ते निकाले गए हैं पानी मे जाने के लिए जगह-जगह सीढ़ियाँ निकाली
गई है। काशीजी मे भी गंगा का किनारा बहुत सुदृश्य है लेकिन पता नहीं क्यों
वहाँ इतनी अव्यवस्था है। किसी सुनिश्चित प्रणाली के अनुसार वहाँ पर न मकान
बनाये गए हैं और न कोई सड़क ही निकाली गई है। वहाँ की सीढ़ियो की दुर्दशा
की भी आज सीमा नहीं है। काशीजी के गंगा तट-सा सुन्दर स्थान सम्भव है।
भारतवर्ष में कोई दूसरा न हो तथापि ऐसे सौन्दर्य के निकेतन को भी आज अव-
हेलना की तुच्छता ने अशोभनीय बना रक्खा है।
उपर्युक्त होटल मे शनीचर और इतवार को कलकत्ता से शौकीन एवं धनी
व्यक्तियो का आगमन होता है। सुरादेवी की आराधना यहाँ पर खूब आसानी से
एवं आडम्बर के साथ होती है कारण यह कि दक्षिणा यहाँ पर कलकत्ता से बहुत
कम देनी पड़ती है। परिवार सहित ऐसे स्थान पर रहना कैसे संभव हो सकता
था। जब हम लोगों ने होटल की मालकिन से कहा कि कल-परसों तक अपना
निश्चय बता देंगे तो मालकिन ने आग्रह किया कि जब आप लोग होटल मे पधारे
हैं तो कुछ दक्षिणा तो अवश्य चढ़ानी पड़ेगी कुछ नही तो एक-एक गिलास
लेमनेड तो अवश्य ही पी लीजिए। लज्जावश एक बोतल लेमनेड तो पीना ही
पड़ा लेकिन जब बिल देखा तो प्राण सूख गए, आँखें उलट गईं। एक बोतल पानी
का दाम आठ आने लगाये गए थे। क्या करता देना ही पड़ा। जिस स्थान पर
क़दम रखते ही यूं आठ आने देने पड़े उस स्थान को मैंने फिर लौटकर न देखा।
भोजन-स्नान आदि के बाद मकान की तलाश मे फिर निकले। चन्द्रनगर
नितान्त छोटी जगह नहीं है। दूर-दूर तक पहुँचे, मकानात भी मिले, लेकिन
पसन्द न आए। विभिन्न स्थानों को देखकर पहले का भय और दृढ़ हो गया
कि इस स्थान पर रहने से मलेरिया से हम लोगों को जर्जरित होना पड़ेगा।
श्री श्रीश बाबू के यहाँ रहना उचित नही समझा और उनके यहाँ स्थान भी न
था। चित्त व्याकुल हो उठा क्या करें और क्या न करें कुछ ठीक न कर पाए।
चन्द्रनगर के पास एक छोटी-सी लेकिन मशहूर जगह श्रीरामपुर के नाम से
प्रसिद्ध है। यहाँ पर बंगाल के कुछ बड़े-बड़े ज़मींदार बसे हैं। मेरे मामा की

340 / बन्दी जीवन
शादी श्रीरामपुर के एक जमींदार के घर में हुई थी। जिस समय का मैं उल्लेख
कर रहा हूँ मेरे मामा के लड़के श्रीरामपुर में अपनी नानी के यहाँ रहते थे। मेरे
मामा के लड़के श्री भवानीशंकर राय से मेरी यथेष्ठ मित्रता थी। यह मैं
अवश्य जानता था कि भवानीशंकर की नानी अपने यहाँ मेरा आना-जाना अधिक
पसन्द नहीं करती थीं तथापि अपनी स्थिति को देखते हुए दो-चार-दस दिन के
लिए भवानीशंकर के यहाँ ठहरना ही मैंने उचित समझा। मेरा अभिप्राय यह था
कि श्रीरामपुर में अपने बाल-बच्चों को रखकर फिर कहीं रहने के उपयुक्त स्थान
की खोज कर लूं। जहाँ तक मुझे स्मरण है मैंने पहले अकेले श्रीरामपुर जाकर
भवानी भैया से सब बातचीत कर ली। बाद को बाल-बच्चों सहित श्रीरामपुर
पहुँचा। भवानी भैया की नानी के व्यवहार से यह नहीं मालूम पड़ता था कि वे
लोग हमसे किसी प्रकार से भी असन्तुष्ट रहे हों। इसी बात के लिए मेरे मन में
अत्यन्त दुर्भावना थी। अब एक दुर्भावना का तो अन्त हुआ।
भवानी भैया और मैंने मिलकर चन्द्रनगर से लेकर हावड़ा तक गंगा जी के
किनारे-किनारे जितनी बस्तियाँ और कस्बे थे सब पैदल छान डाले। श्रीरामपुर
से हावड़ा रेलवे लाइन से बारह-तेरह मील है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक कस्बे में,
मोहल्ले-मोहल्ले में कहाँ पर मकान खाली है, पड़ोसी कैसे हैं, कलकत्ता से आने-
जाने के लिए क्या-क्या सुविधाएं एवं असुविधाएं हैं, कहाँ पर क्या खर्च पड़ेगा, इन
सबके प्रति दृष्टि रखते हुए सुबह से शाम तक चक्कर काटते रहे। आज मैं बहुत
कृतज्ञता के साथ भवानी भैया की सहायता का स्मरण कर रहा हूँ। अनुशीलन
समिति के किसी सदस्य को मैंने अपने बंगाल आने की बात इसलिए नहीं बताई
थी कि ऐसा करने से बात फैल जाने की संभावना थी। और यह भी मैं चाहता
था कि उन लोगों की सहायता बिना लिये ही मैं अपनी सब व्यवस्था स्वतंत्र रूप से
कर लूँ। एक तरफ पुलिस मुझे गिरफ्तार करना चाहती है, दूसरी तरफ़ मैं वास-
स्थान के लिए भटकता फिर रहा हूँ। कहीं पर रहने का ठिकाना नहीं है। बाल-
बच्चे भी मेरे साथ मेरी तरह भटकते फिर रहे हैं। इन सब घटनाओं के बहुत
दिन बाद जब सन् 1930 ई० में मैंने नैनी सेण्ट्रल जेल में ट्राट्स्की की आत्म-कहानी
पढ़ी एवं सन् 1934 में लखनऊ सेण्ट्रल जेल में रहते समय साइबेरिया स्थित रूस
के क्रान्तिकारी पुरुष और स्त्रियों की जीवन-कथा पढ़ी थी तब मैंने अनुभव किया
कि मेरा भटकना उन लोगों की तुलना में कुछ भी नहीं था। इन सब निदारुण
दुःखों का सामना करना पड़ता है, इसीलिए ही तो क्रान्तिकारियों के मार्ग पर
चलने के लिए कोई सहज में तैयार नहीं होता है। यह बात केवल भारतवर्ष
ही के लिए ही सत्य हो ऐसा नहीं है, संसार-भर के क्रान्तिकारियों का इतिहास
पढ़ने से सभी को इस बात की सत्यता पर विश्वास हो जायगा। समग्र इतिहास
में यह बात पाई गई है कि सफलता प्राप्त करने के पूर्व प्रत्येक देश के क्रान्ति-
कारियों को बुद्धिमान व्यक्तियों ने अदूरदर्शी, अव्यावहारिक, पथभ्रान्त भावुक
बताया है। संसार के अधिकांश तथाकथित बुद्धिमान व्यक्तियों ने क्रान्तिकारी

मार्ग को ग्रहण नहीं किया। आज भी हमारे देश के लब्धप्रतिष्ठ गण्यमान्य
बुद्धिमान नेतागण क्रान्तिकारी मार्ग को बालकोचित समझते हैं। जो हो, भवानी-
शंकर और मैंने मिलकर बाली नामक एक कस्बे में काम चलाने लायक एक
मकान ढूंढ निकाला। किस ग्वाले से दूध लेंगे, कौन बर्तन मिलेगा, बाजार
कितनी दूर है, स्टेशन कितनी दूर है, रेलवे स्टेशन तथा स्टीमर घाट कितनी
दूर है इन सब बातों को दृष्टि में रखते हुए और सब बातों की उपयुक्त व्यवस्था
करके तीन-चार दिन के कठोर परिश्रम के बाद वह मकान ले लिया गया। रहने
की सुव्यवस्था हो जाने के बाद विप्लव कार्य में ध्यान देने का अवसर मिला।
एक तो बरसात के दिनों में यों ही बीमारियां हुआ करती है। फिर पश्चिम
में रहते-रहते ऐसा हो गया था कि अब बंगाल की जलवायु हम लोग बर्दाश्त नहीं
कर पाते थे। बाली के जलवायु के कारण लड़के को ब्रांगकाइटिस हो गया। इस
अपरिचित ग्राम मे असहाय, संपदहीन अवस्था मे मैं अत्यन्त चिन्तित हो गया।
और कोई अच्छा उपाय न रहने के कारण अन्त मे मैंने कलकत्ता जाने का ही
निश्चय किया। लेकिन रहने लायक एक उपयुक्त स्थान खोज निकालने के पहले
बाल-बच्चों को कलकत्ता में अपने चचेरे भाई के मकान मे लाकर रक्खा। वहीं
पर रहकर लड़के का इलाज हुआ। इसके बाद कलकत्ता में ही एक दूसरे मकान
मे हम लोग रहने लगे। मेरे आत्मीय स्वजनों को यह पता नही था कि मैं कहाँ
रहता हूँ। बहुतों से मैंने कह दिया कि मैं फ्रांसीसी चन्द्रनगर मे रहता हूँ। अपने
दो-एक विशेष मित्रों को छोड़कर क्रान्तिकारी दल के भी किसी को पता न था
कि मैं कहाँ रहता हूँ।
मैंने सदा इस बात के प्रति ध्यान रक्खा कि देश के गण्यमान्य प्रकाश्य नेताओं
से अवश्य मिलूं एव उन्हें क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रति महानुभूति सम्पन्न एवं
सहायक बनाने के लिए यथासाध्य प्रयत्न करूँ।
इस नीति के अनुसार देशबन्धु चित्तरंजनदास के साथ मिलना मैंने अपना
प्रथम कर्त्तव्य समझा। इनका कुछ परिचय मैंने पहले ही दे दिया है। देशबन्धु
सी० आर० दास के साले के साथ हम लोगों का बहुत पुराना और घनिष्ठ सम्बन्ध
था। इनकी सहायता से मैंने महात्मा गांधी से भी मिलने का प्रयत्न किया था।
महात्माजी जानते थे कि मैं फरार हालत में हूँ। देशबन्धु के साले श्री एस० एन०
हालदार महात्माजी के पास मेरा सन्देश लेकर गए थे। महात्माजी कांग्रेस के
कार्य से देशबन्धुदास के यहाँ आये हुए थे। पता नही कांग्रेस कार्य समिति की
बैठक थी अथवा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की। इसी अवसर पर श्री हेमंत-
कुमार सरकार की मार्फत मुझे यह संदेशा मिला कि मौलाना मुहम्मदअली साहब
मुझसे मिलना चाहते हैं। बनारस षड्यन्त्र के मामले में कालेपानी जाने के पहले
मौलाना मुहम्मदअली के साथ हम लोगों का सम्बन्ध हुआ था। कालेपानी से
लौटने के बाद उनसे मेरी मुलाकात नहीं हुई थी। इसलिए मैं भी इनसे मिलने
के लिए उत्सुक था। देशबन्धु के मकान में ही उनसे मुलाकात हुई। मौलाना

342 / बन्दी जीवन

शौकतअली की तरह इन्होंने भी मुझसे गुप्त तरीके छोड़कर प्रकाश्य आन्दोलव में
काम करने का अनुरोध किया। मैंने अपनी नीति इनसे व्यक्त नहीं की।
श्री एस० एन० हालदार से विदित हुआ कि महात्माजी मुझसे अमुक दिन
रात को आठ बजे श्री सी० आर० दास के मकान पर मिलेंगे। उस समय देशबन्धु
का मकान खुफिया पुलिसवाले घेरे रहते थे। लेकिन मैं जानता था कि मुझे ये
पहचानते नहीं हैं। इनके रहते हुए भी मैं देशबन्धु के मकान पर ठीक समय पर
पहुँचा। हालदारजी से भेंट हुई। उन्होंने मुझे एक कमरे में बैठा दिया और कहा
कि जब तक मैं नहीं लौटता हूँ तुम यहीं पर ठहरो। यह एक मुनीम का कमरा
था। सम्भव है पुलिस वाले समझे हों कि मैं भी देशबन्धु के मुनीमों में से एक हूँ।
ठीक आठ बजे महात्माजी से मिलने की बात थी। कमरे में एक बड़ी घड़ी लगी
थी। इन्तजार करते-करते आठ से नौ, नौ से दस और दस से ग्यारह बजे लेकिन
हालदार साहेब वापस नहीं आए। एक तो वह स्थान पुलिस वालों से घिरा था
तिस पर मैं फरार हालत में घूम रहा था। इन्तजार करते-करते मेरे मन में नाना
प्रकार की दुश्चिन्ताएँ पैदा होने लगीं। मेरे मन में सन्देह होने लगा कि शायद
महात्माजी मेरे प्रस्ताव को उपेक्षा की दृष्टि से देख रहे हों, सम्भव है वह मुझसे
मिलना नहीं चाहते हो। मैंने अपने दिल में कुछ अपमान-सा अनुभव किया।
सम्भव है यह मेरे चरित्र की दुर्बलता हो, इसलिए जहाँ अपमान बोध नहीं होना
चाहिए था वहाँ भी अपमान बोध कर रहा था। मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि
मानो महात्माजी मेरी परवाह नहीं कर रहे हैं। यह मेरे परम दुर्भाग्य की बात है
कि आज भी बहुतेरे प्रयत्न करने के बाद भी मैं महात्माजी से नहीं मिल पाया।
हरीपुरा में भी मैंने महात्माजी से मिलने की बार-बार चेष्टा की और हर बार
मुझसे यही कहा गया कि आज महात्माजी की तबियत स्वस्थ नहीं है, आज
महात्माजी को अवकाश नहीं है, आज महात्माजी केवल दो-तीन मिनट ही दे
सकते है इत्यादि। एक दिन हरिपुरा में मैं सीधे महात्माजी के पास पहुँच गया तो
देखा कि महात्माजी श्री मंजरअली सोख्ता के साथ टहलते हुए बातचीत कर रहे
हैं। कुछ दूरी पर एक तरुणी खड़ी थी। उस तरुणी से संकोच के साथ मैंने पूछा,
क्या मैं महात्माजी के पास पहुँच सकता हूँ। उसने कहा कि हां चाहें तो आप जा
सकते हैं। मैं नि संकोच महात्माजी के पास पहुँच गया। उनके पाँव छूकर प्रणाम
किया और उनसे बातचीत करने के लिए कुछ समय की प्रार्थना की। महात्माजी
ने मेरे मुंह की तरफ कुछ एकाग्रता के साथ देखा। मैंने अपना नाम बताया लेकिन
इतने पर भी महात्माजी ने मुझे कोई समय नहीं दिया। यद्यपि वे श्री मंजरअली
सोख्ता के साथ बहुत देर तक टहलते हुए बातचीत करते रहे। सोख्ताजी से मुझे
बाद को मालूम हुआ कि उनसे उस समय महात्माजी की कोई विशेष आवश्यकीय
बातचीत नहीं हो रही थी। अब की जेल से छूटने के बाद मैंने महात्माजी को
एक पत्र भेजा था उसके उत्तर में उनके सेक्रेटरी ने मुझे यह लिखा था कि आप
बर्धा के पास सेगांव आइए, एक सप्ताह हम लोगों के पास रहिए और महात्माजी

फिर बंगाल में / 343
के पास शान्ति से बातचीत भी हो सकेगी। हरिपुरा में पुनः श्री महाबीर देसाई ने
मुझसे वही बातें फिर कहीं लेकिन मेरे पास इतना पैसा न था कि मैं सेगांव जाकर
महात्माजी से मिलता। देहली में जब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक
हुई थी उस समय भी मैंने महात्माजी से मिलने का प्रयत्न किया था। लेकिन इस
बार भी विफल रहा।
मैं रात के ग्यारह बजे देशबन्धु के मकान से चल पड़ा। कुछ अपमान और
कुछ रोष से मैं मन-ही-मन चंचल हो रहा था। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि
मैने अपने व्यक्तित्व को ऐसे ऊंचे स्थान पर नही पहुँचाया है जिसके कारण
महात्माजी ऐसे व्यक्ति मुझसे मिलने के लिए उत्सुक होते। ऐसी मनोवृत्ति को
पाश्चात्य मनोविज्ञान के अनुसार Inferiority Complex (छोटेपन का भाव)
कह सकते है। मै इस हीनता के बोध को लेकर देशबन्धु के मकान-से लोटा। इस
हीनता बोध से आज भी मैं मुक्त नही हूँ।
इस घटना के बाद जब पुनः हालदारजी से मेरी मुलाकात हुई तो पता चला
कि महात्माजी मुझसे मिलने के लिए यथार्थ मे उत्सुक थे। उनकी इच्छा थी कि
कांग्रेस के अन्य व्यक्तियो के इधर-उधर चले जाने पर महात्माजी मुझे साथ
लेकर मोटर मे कही दूर निकल जाते और कार मे ही बैठे-बैठे सब बाते होती।
लेकिन दुख का विषय है कि हालदार साहब ने आकर मुझे सब बाते नही बताई।

मुक्ति, हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का पुनर्गठन एवं बन्दी जीवन उपसंहार

16
आदर्शों का संघर्ष
कामरेड एम० एन० राय के जो व्यक्ति देहली में मुझसे मिले थे उनसे मैं
कलकत्ते में फिर मिला। श्री कुतुबुद्दीन अहमद का नाम मैं पहले ही बता चुका हूँ।
कलकत्ता में उनके मकानात थे। मैं यह आशा करता था कि उनसे मुझे पैसे की
सहायता मिलेगी। इनकी सहायता से मैं चाहता था कि विदेश में मैं अपना आदमी
और अपना सन्देश भेजूँ। सन् 1914 के क्रान्तिकारी आन्दोलन की अभिज्ञता से
मुझे मालूम था कि बड़े पैमाने में अस्त्र-शस्त्र आदि के मँगाने की व्यवस्था किए
बिना क्रान्तिकारी आन्दोलन सफल नहीं हो सकता। एवं यह भी मैंने देखा था कि
पिछले आन्दोलन में हम लोगों ने विदेश में स्थित क्रान्तिकारी दलों के साथ कोई
सम्बन्ध स्थापित न करने से बहुत धोखा खाया। इन सब पिछली त्रुटियों को
दृष्टिकोण में रखते हुए अबकी बार विदेश में आदमी भेजने की मैंने यथेष्ठ चेष्टा
की, लेकिन कुतुबुद्दीनजी की सहायता से कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई।
जिस रीति से क्रान्तिकारी दल के आदमी विदेश आया-जाया करते थे वह
आज पुलिस को मालूम हो गई है। उस रीति का अवलम्बन करके विदेश आना-
जाना बहुत कठिन हो गया है। जो बात पुलिस को मालूम है उसे जनता के सामने
रखने में कोई हानि नहीं है।
श्री कुतुबुद्दीन से पता चला कि वे अपने आदमी खलासी अथवा जहाज़ के
अन्य कर्मचारियों के रूप में भर्ती कराते थे, और विदेश आकर ये व्यक्ति जहाज़ से
उतरकर लापता हो जाते थे। मैंने भी सन् 1911 में एक बार अमेरिका भाग जाने
की निष्फल चेष्टा की थी।
सन् 1924 ई० के प्रारम्भ में थोड़े-से व्यक्ति रेगुलेशन 3 में नज़रबन्द कर
दिये गए थे। लेकिन मेरे कलकत्ता पहुँचने के बाद सरकार ने एक नये क़ानून के
अनुसार बड़ी संख्या में नौजवानों को गिरफ्तार कर लिया और अदालत में बिना
पेश किये ही उन्हें जेल में बन्द कर दिया। इसी सिलसिले में सुभाषबाबू भी
गिरफ्तार हो गए।
इसके पहले ही मैं देशबन्धुजी से मिल चुका था। उन्होंने हम लोगों को निय-
मित रूप से सहायता देने का वचन भी दिया था लेकिन अत्यन्त दुर्भाग्यवश यह
सहायता मिलने के पहले ही दासजी मुझसे अत्यन्त असन्तुष्ट हो गए थे। देश-

[Header] आदर्शों का संघर्ष / 345

वासियों से निवेदन नामक मेरे नाम से प्रकाशित एक पर्चे में देशबन्धुदास के क्रान्ति-
कारी-विरोधी सिद्धान्त का मैंने स्पष्ट शब्दों में युक्तिपूर्ण रीति से खंडन किया था।
इसी बात से वे मुझसे अत्यन्त रुष्ट हो गए थे। इस पर्चे के प्रकाशित होने के बाद
जब मैं उनसे मिलने के लिए उनके मकान पर गया तो उन्होंने मुझसे मिलने से
इनकार कर दिया। मैं समझ गया कि राजनीतिक-चालों से मैं नितान्त अनभिज्ञ
हूँ। कांग्रेसी नेतागण जब जी चाहे प्रकाश्य रूप से वक्तृता-मंच पर अथवा संवाद-
पत्रों में क्रान्तिकारी आन्दोलन की यथेष्ठ निन्दा करते हैं। उन्हें यह भलीभाँति
मालूम है कि क्रान्तिकारियों के लिए प्रकाश्य रूप में अपने पक्ष का समर्थन करने
का कांग्रेस नेताओं की तरह अवसर अथवा सुयोग प्राप्त नहीं है।
देशबन्धु सी० आर० दासजी ने गया कांग्रेस के सभापति के आसन से क्रान्ति-
कारी आन्दोलन के प्रति कुछ कटाक्ष किए थे। उन्होंने यह कहा था कि क्रान्तिकारी
आन्दोलन सफल नही हो सकता, इसलिए मैं क्रान्तिकारी आन्दोलन में योगदान नहीं
करता हूँ। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि मेरी समझ में यह बात आ जाय कि
क्रान्तिकारी आन्दोलन सफल होगा तो मैं उसी क्षण इस आन्दोलन में शामिल हो
जाऊंगा। लेकिन उन्होंने अहिंसा नीति के आधार पर क्रान्तिकारी आन्दोलन का
विरोध नही किया। इसके प्रत्युत्तर में मैंने लिखा था कि जिस दिन सबको यह
प्रतीत हो जाएगा कि क्रान्तिकारी आन्दोलन सफल होने जा रहा है उस दिन तो
लाखो की संख्या में मनुष्य इस आन्दोलन में भाग लेने लगेंगे। उस दिन देशबन्धु
जैसे व्यक्ति इस आन्दोलन में भाग लेंगे या नही इसका विशेष महत्त्व नही रह
जाएगा। जिस देश मे विदेशी सरकार जब जैसा चाहे वैसा ही क़ानून बना सकती
है उस देश मे क़ानूनी लड़ाई लड़ना अथवा जिस देश में विदेशी सरकार पाशविक
बल से शासन करती है उस देश में बल का प्रयोग न करके स्वाधीनता के लिए
लड़ाई करना बातुलतामात्र है ऐसा मैंने उस पर्चे में लिखा था। मैंने यह भी बताने
की चेष्टा की थी कि क्रान्तिकारी आन्दोलन आतंकवाद नही है कारण यह कि
भारत मे किसी भी क्रान्तिकारी का यह विश्वास नहीं है कि केवल आतंकवाद से
ही स्वाधीनता प्राप्त हो सकती है। यदि सरकारी अत्याचारों के विरुद्ध इक्का-
दुक्का व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल का प्रयोग भी करते हैं तो उसका अर्थ नही हुआ
कि क्रान्तिकारीगण निरे आतंकवाद से ही स्वाधीनता की लड़ाई लड़ना चाहते हैं।
इसी प्रकार क्रान्तिकारी आन्दोलन के विरुद्ध आक्षेपों का उत्तर इस लेख में था।
मैंने अपने नाम से इस 'देशवासी के प्रति निवेदन' शीर्षक के पर्चे को छपवाया
था। कलकत्ता में प्रकाश्य सभाओं के अवसरों पर ये पर्चे बंटवाए थे। इस पर्चे ने
कलकत्ता में बड़ी खलबली मचा दी थी। यह पहला अवसर था कि भारतवर्ष में
किसी क्रान्तिकारी ने अपने नाम से प्रकाश्य गण्यमान्य नेता के विरुद्ध आन्दोलन के
समर्थन में आवाज़ उठाई थी।
इस पर्चे के कारण अनुशीलन समिति के दूसरे नेतागण मुझसे असन्तुष्ट हो
गए थे। मेरा अपना यह विश्वास था और अब भी है कि यदि क्रान्तिकारीगण

346 / बन्दी जीवन
जन-साधारण के सामने अपने मनोभावों को व्यक्त करते रहें, और देश की विभिन्न
परिस्थितियों में अपने स्वतन्त्र विचारों को दृढ़तापूर्वक जनता के सामने रखें तो
यह सम्भव हो सकता है कि क्रान्तिकारीगण भी जनता के हृदय पर अधिकार
स्थापन कर लें। अनुशीलन समिति के नेताओं में यह प्रवृत्ति नहीं थी।
मैं अनुशीलन समिति के जितने नेताओं के संस्पर्श में आया उससे मेरे मन
में यह धारणा हो गई थी कि उनके मानसिक उत्कर्ष उस प्रकार के न थे जिस
प्रकार यूरोप के क्रान्तिकारी नेताओं में पाये जाते हैं। लेकिन उनके अनुयायियों
में से ऐसे बहुत-से प्रतिभाशाली युवक थे जिनमें उपर्युक्त नेतृत्व गुणों का उन्मेष
था, किन्तु अनुशीलन समिति की कार्य-प्रणाली के कारण इन प्रतिभाशाली युवकों
को अपनी प्रतिभा के प्रयोग का अवसर नहीं मिल रहा है। क्रान्तिकारी आन्दोलन
की प्रथम अवस्था में थोड़ी आयु के बहुत-से नवयुवकों ने स्कूल कालेजों से पड़ना
छोड़कर योगदान किया था। रूस, आयरलैण्ड अथवा इटली में भी ऐसा ही
हुआ था। लेकिन उन देशों में एवं विशेष रूप से रूस देश में क्रान्तिकारियों ने अपनी
कार्य-प्रणाली, उद्यम एवं अध्यवसाय से अद्भुत मानसिक उत्कर्ष को प्राप्त कर
लिया था। रूस के क्रान्तिकारीगण जब तक पकड़े नहीं जाते थे तब तक राज-
नीतिक कार्यों में प्रचंड रूप से लगे रहते थे। उस समय उन्हें अपना मानसिक
उत्कर्ष प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलता था। लेकिन पकड़े जाने पर जेलों में
उन्होंने अपने समय का अपने मानसिक उत्कर्ष साधन में अच्छा सदुपयोग किया।
हमारे देश में भी ऐसा ही हुआ है।
अनुशीलन समिति की कार्य-प्रणाली से बहुत-से उग्र मत वाले सदस्य असन्तुष्ट
थे। ये सदस्यगण ऐसे कार्यक्रम के पक्षपाती थे जिसमे जनता पर क्रान्तिकारी
आन्दोलन का यथेष्ट प्रभाव पड़े। इन लोगों ने अनुशीलन समिति के पुराने नेतृत्व
के विरुद्ध विद्रोह करके एक अलग कार्यक्रम बना लिया था। ये केवल गुप्त रीति
से षड्यन्त्र करके ही तृप्त नहीं होते थे। वे ऐसा काम करना चाहते थे जिससे
जनता मे क्रान्तिकारी भावना तीव्र रूप मे फैल जाए और उसे प्रतीत हो जाय कि
क्रान्तिकारी मार्ग से भारत को स्वतन्त्र करना सम्भव है। चिटागाँव के स्वर्गीय
सूर्यकान्त सेन इस दल के अग्रणी थे। चिटागाँव अथवा चटगांव में इनका पूरा
अधिकार था। परन्तु दूसरे बहुत-से जिलो मे भी इनके पक्ष के आदमी कई थे।
मैं भी अनुशीलन समिति के नेताओं की नीति से सन्तुष्ट नहीं था। पिछले
क्रान्तिकारी आन्दोलन के अनुभव से मैं यह समझ गया कि किसी आन्दोलन की
सहायता के लिए पर्याप्त रूप से उसके पक्ष में उपयुक्त साहित्य की सृष्टि करना
अत्यन्त आवश्यक है। हम लोगों ने क्रान्तिकारी आन्दोलन के पक्ष में साहित्य की
सृष्टि कहने योग्य कुछ भी नहीं की थी। इसके अतिरिक्त हमारी कार्य-प्रणाली
ऐसी नहीं होती थी कि जिससे जनसाधारण को हम क्रान्तिकारी मार्ग पर चलने
के लिए प्रोत्साहित कर सकते। गुप्त रीति से दो-चार पिस्तौल इकट्ठे किये या
कुछ बम बना लिए तो केवल इसी से देश को कैसे स्वाधीन किया जा सकता है !

आदर्शों का संघर्ष | 347
इटली के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी नेता जोसेफ मेजिनी ने एक स्थान पर ऐसा भी कहा
है कि सैकड़ों सभाएँ अथवा पर्चे बाँटने की अपेक्षा एक क्रान्तिकारी बलवे से हज़ारों
गुना अधिक काम होता है। सम्भव है अंग्रेज़ी शब्दों के आधार पर जो उद्धरण
ऊपर दिया गया है उसमें मूल से कुछ थोड़ा-बहुत अन्तर हो, लेकिन उसके तात्पर्य
में कोई अन्तर नही है। इसके साथ-साथ यह भी निश्चित है कि मेजिनी 'यंग-
इटली' नामक जो पर्चा निकाला करते थे उसका साहित्यिक एवं क्रान्तिकारी
प्रभाव इटली के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा है। दूसरे देशों से ये पर्चे इटली
में आते थे। विदेशों में रहकर ही मेजिनी 'यंग इटली' का सम्पादन कार्य करते
थे। इटली में किसी व्यक्ति के पास इस पर्चे से निकलने पर उसे फाँसी का दण्ड
दिया जाता था। 'यंग इटली' के लेखों का संग्रह करके ग्रथित आज भी अंग्रेज़ी में
एक ग्रन्थ उपलब्ध है और उसे प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति बड़े उत्साह के साथ पढ़ता
है और उससे लाभ उठाता है। उसकी नैतिक एवं साहित्यिक मर्यादा आज भी
पूर्ववत अक्षुण्ण है। इसकी तुलना में भारतवर्ष में राष्ट्रीय आन्दोलन या क्रान्ति-
कारी आन्दोलन के सम्पर्क में हम कुछ भी नहीं दिखला सकते। रूस के क्रान्तिकारी
आन्दोलन के प्रति दृष्टिपात करने पर भी हमें विदित हो जाएगा कि उपयुक्त
साहित्य की सृष्टि की दृष्टि से हमारा आन्दोलन कितना पिछड़ा हुआ था और अब
भी है। चीन में भी राष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन के सम्पर्क में लाखों की संख्या
में पर्चे एवं पुस्तिकाएँ बाँटी गई हैं। उस देश में भी नवीन आन्दोलन के सम्पर्क में
एक नवीन साहित्य की सृष्टि हुई है। केवल इतना ही नहीं, अपितु डाक्टर सन-
यातसेन आदि प्रमुख नेताओं ने चीन के दार्शनिक विचारों में भी महान् परिवर्तन
लाने की चेष्टा की थी। इसी प्रकार रूस के विप्लवी नेताओं ने भी विचार जगत्
में विप्लव मचा दिया था। भारत में भी श्री अरविन्द एवं स्वर्गीय स्वामी
विवेकानन्द, रामतीर्थ, दयानन्द, लोकमान्य तिलक जैसे महानुभाव नेताओं ने
दार्शनिक दृष्टिकोण से तीव्र जागृति पैदा की थी, एक नवीन दार्शनिक आन्दोलन
प्रबल रूप से प्रारम्भ कर दिया था।
इस स्थान पर मेरे कहने का इतना ही तात्पर्य है कि अनुशीलन समिति के
नेताओं में मैंने आधुनिक युगपयोगी मानसिक उत्कर्षता को नहीं पाया था।
और उनकी कार्य-प्रणाली मुझे पसन्द न थी, इसलिए उनके माथ मेरी पटती नहीं
थी।
उत्तर भारत में मैंने जो अपना कार्यक्रम और नियमावली छपवाई थी अनु-
शीलन समिति के नेताओं ने उसको कोई महत्त्व नहीं दिया। वे सब ऐसे कागज़ी
नियम क़ानून को देखकर हँसा करते थे। उन नेताओं में से अधिकांश आधुनिक
विचारधारा से नितान्त अनभिज्ञ थे। मैंने उन्हें बहुत समझाना चाहा कि मान
लीजिए पण्डित जवाहरलाल जैसे विचारवान व्यक्ति के पास हमें अपना कार्यक्रम
लेकर जाना पड़े तो हमारे पास युक्ति एवं शृंखलाबद्ध ऐसा कौन-सा कार्यक्रम है
जिसको लेकर हम उनके सामने सगौरव खड़े हो सकते हैं। 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन

348 / बन्दी जीवन
एसोसिएशन' ऐसा ही एक युक्तियुक्त प्रोग्राम है जिसे हम किसी भी चिन्तनशील
व्यक्ति के सामने सगौरव रख सकते हैं। लेकिन अनुशीलन समिति के नेताओं ने
उपेक्षा की हंसी हंसकर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की नियमावली एवं
कार्यक्रम को एक तरफ उठाकर रख दिया। मैंने समझ लिया कि उनकी समझ
उक्त एसोसिएशन के आदर्श तक नहीं पहुंच पाई है।
इसके अतिरिक्त उन नेताओं के पास जनता के सामने रखने योग्य कोई
कार्यक्रम नहीं था। मैं चाहता था कि अब की बार इस प्रकार से कार्य किया जाय
जिससे जन-साधारण पर क्रान्तिकारी आन्दोलन का अमोघ प्रभाव परिलक्षित
हो। अनुशीलन समिति के नेतागण विरोधी थे। वे ऐसा कोई काम नहीं करना
चाहते थे जिससे जनता की दृष्टि क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रति आकृष्ट होती।
इसका कारण यह था कि वे पुलिस की दृष्टि को बचाना चाहते थे। वे ऐसा
समझते थे कि अभी ऐसा कोई काम करना उचित नहीं है जिससे पुलिस की
दृष्टि क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रति आकृष्ट हो जाय। वे चाहते थे कि तैरना
भी सीख जाएं और पानी भी न छूना पड़े। वे भूल गए थे कि राजनीतिक क्षेत्र
में ऐसा सम्भव नहीं है।
जैसाकि मैं पहले उल्लेख कर चुका हूँ देशबन्धुदासजी से मेरी बातचीत के
परिणामतः उन्हें यह प्रतीत हो गया था कि क्रान्तिकारी आन्दोलन समग्र उत्तर
भारत में प्रबल और विस्तृत रूप से बढ़ रहा है। और उसी समय एक भाषण में
दासजी ने सरकार को यह चेतावनी दी थी कि भारतवासियों की मांग को
अविलम्ब पूरा न करने से भारत में एक भीषण परिस्थिति उत्पन्न होगी क्योंकि
कांग्रेस के अतिरिक्त भारत के क्रान्तिकारीगण भी भीषण रूप से काम कर रहे
हैं। यदि गवर्नमेंट यह सोचती है कि क्रान्तिकारी आन्दोलन दब गया है तो यह
उसकी भारी भूल है। भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन दबा नहीं है। सरकार
को पता नहीं है कि यह आन्दोलन कितना उग्र रूप धारण करने जा रहा है।
यह भी मैं पहले ही बतला चुका हूँ कि इस व्याख्यान के बाद सरकार की ओर से
खुफिया विभाग के सुपरिटेण्डेण्ट श्री भूपेन्द्र चटर्जी को दासजी के पास भेजा गया
था। इस घटना के बाद दासजी से मेरी बातचीत हुई थी । दासजी के व्याख्यान
से सरकार को यह शंका हो गई थी कि कहीं महायुद्ध के समय की तरह फिर
क्रान्तिकारी आन्दोलन उग्र रूप धारण न कर ले। भूपेन्द्र चटर्जी दासजी से
यह जानना चाहते थे कि क्या उनकी धारणा में शीघ्र ही विप्लव मच सकता है।
दासजी क्यों ऐसा समझते हैं कि भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन उग्र रूप धारण
कर रहा है ? क्रान्तिकारियों के साथ दासजी का क्या और कहाँ तक सम्बन्ध है ?
दासजी के इस व्याख्यान से अनुशीलन समिति के नेतागण मुझसे असन्तुष्ट
हो गए थे। उनकी धारणा थी कि इस व्याख्यान से क्रान्तिकारी आन्दोलन को
विशेष धक्का पहुंचेगा। मैं समझता था कि इस व्याख्यान से क्रान्तिकारी भावनाओं
का खूब प्रचार होगा, इससे क्रान्तिकारी मार्ग पर कार्य करने के लिए विशेष

आदर्शों का संघर्ष / 345
सुविधा हो जाएगी ।
इस व्याख्यान के बहुत पहले ही देहली में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के
ठीक बाद ही कुछ व्यक्तियों को बंगाल में रेगुलेशन 3 के अनुसार गिरफ्तार कर
लिया गया था। मैं अपने साथियों से, अर्थात् अनुशीलन समिति के नेताओं से,
यही कहा करता था कि आप लोग सब यों ही विशेष क़ानून के अनुसार गिरफ्तार
हो जाएँगे काम कुछ होगा नही, मुफ्त में जेल काटेंगे और क्रान्तिकारी आन्दोलन
कम-से-कम कुछ दिनों के लिए तो दब ही जाएगा। इससे बेहतर है कि कुछ ऐसा
काम किया जाय जिससे जनता के सामने यह सिद्ध हो जाय कि अंग्रेजों की सामरिक
शक्ति के मुकाबले मे जनता में भी शक्ति-संचय करने की योग्यता है और
इससे भी बढ़कर एक और काम यह करना है कि जिससे भारतवासियों की विचार-
धारा में घोर क्रान्ति मच जाय । काग्रेस के नेतागण दिन-रात यही प्रचार किया
करते थे कि क्रान्ति के मार्ग से भारत को स्वाधीन करना सम्भव नही है । भारत
की जनता भी समझती है कि ब्रिटिश सरकार की सामरिक शक्ति के सामने
उसके पास कोई शक्ति नही है। यदि यह भावना सत्य है तो इसका अर्थ होत
है कि भारतवर्ष कभी भी अंग्रेजों की अधीनता से मुक्त नहीं हो सकता। इस
मानसिक अवस्था के रहते हुए क्रान्ति कैसे सम्भव है ? इस मानसिक दुर्बलता को
मिटाने के लिए हम लोगों को सर्वप्रथम आन्तरिक प्रयत्न करना पड़ेगा। ये सब
काम हम लोग करते नही । केवल गुप्त रीति से षड्यन्त्र करने से क्या बनेगा ।
लेकिन अनुशीलन समिति के नेतागणों को यह बात पसन्द नही थी। वे चाहते
थे संगठन फैल जाय, गुप्त रीति से बाहर से अस्त्र-शस्त्र मँगवाये जाएँ तब जाकर
दूसरे कामो में हाथ लगाया जाय । परन्तु संगठन का काम जारी रखना सरल
काम न था। स्थूल दृष्टि से किसी काम का सहारा न लेकर संगठन का कार्य
चलाना सम्भव नही है। सस्था के प्रत्येक व्यक्ति के लिए कुछ-न-कुछ काम होना
विशेष आवश्यक है। यदि किसी संस्था की ओर से प्रत्येक सदस्य के लिए उप-
युक्त काम नहीं दिया जा सकता तो वह संस्था उन्नति नहीं कर सकती। प्रत्येक
संस्था के यथारीति संचालन के लिए धन की विशेष आवश्यकता होती है। भारत
में क्रान्तिकारी संस्थाओं के लिए धन-संग्रह करना एक अत्यन्त कठिन समस्या थी
और बिना धन के कोई काम होना सम्भव न था। क्रान्ति के कार्य में पूर्ण समय
देनेवाले गृह-त्यागी सब प्रकार से निस्वार्थी एवं साहसी कार्यकर्ताओं के अलावा
दूसरों से विप्लव-कार्य चलाना सम्भव नही है। लेकिन प्रश्न यह है कि ऐसे
कार्यकर्ताओं का निर्वाह कैसे हो। फिर समग्र भारतवर्ष के प्रत्येक प्रान्त में ऐसे
कार्यकर्ताओं के सदा घूमते रहने का भी तो खर्च है। क्रान्तिकारी साहित्य का
प्रचार करना, पर्चे बाँटना, सामयिक पत्रादि का चलाना इन सब कामों के लिए
भी तो पैसे की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त भारत के बाहर भी आना-जाना
है, विदेश से बडे पैमाने में अस्त्र-शस्त्र भी तो मँगाना है। इतना पैसा कहाँ से
आए ?

350 / बन्दी जीवन
कांग्रेस अथवा अन्य संस्थाओं के लिए तो रास्ता खुला है, उनके लिए प्रकाश्य
रूप से अर्थ मांगा जा सकता है। उन संस्थाओं के लिए पैसा देने में भी कोई भय
की बात नही है। क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए तो एक पैसा देना भी खतरे
की बात है। इस संकट मे पडने के लिए भारतवासी आज भी प्रस्तुत नही है।
ऐसी परिस्थिति मे क्रान्तिकारी आन्दोलन को कैसे सफल किया जाय।
दूसरे देश के क्रान्तिकारी आन्दोलन के विस्तृत इतिहास को पढ़ने पर भी
ठीक प्रकार से यह पता नही चला कि उन देशों मे उक्त समस्या का समाधान
वहां के क्रान्तिकारी कैसे करते थे। मैट्सिनी के जीवन मे ऐसा भी समय आया
था कि प्रत्येक इटैलियन से एक-एक रुपया माँगने पर भी मैट्सिनी को कुछ भी
नही मिला था। रूस की बोल्शेविक पार्टी की नीति के अनुसार डाका डालकर
अर्थ संग्रह क रना उचित नही समझा गया था तथापि लेनिन की अनुमति एव
अनुमोदन से स्टालिन के दल को डकैती द्वारा अर्थ-संग्रह करना पड़ा था। लेकिन
यह भी बात सत्य है कि आयरलैंड मे शीनफीन पार्टी के लिए प्रत्येक सदस्य चन्दा
दिया करता था। प्रधानतया इसी चन्दे मे दल का काम चलता था।
यदि हम लोग किसान और मजदूर आन्दोलन मे यथारीति भाग लिए होते
तो सम्भव था कि कुछ सीमा तक हमारा आर्थिक संकट निवारित हो जाता लेकिन
मजदूर अथवा किसान आन्दोलन के लिए जैसे व्यक्तियो की आवश्यकता होती है
वैसे हमारे पास अधिक सख्या मे न थे। मामूली कार्यकर्ता तो हमारे पास बहुत
थे परन्तु जिनमे उपयुक्त सगठन शक्ति हो जिनमे कुछ नियन्त्रण शक्ति हो
ऐसे व्यक्ति हमारे पास अधिक न थे। जितने व्यक्ति थे भी उन्हें हम लोगो ने
क्रान्तिकारी सगठन मे कार्य मे लगा रक्खा था। यदि मै फरार हालत मे न होता
तो मै यथा-रीति मजदूर आन्दोलन मे काम कर सकता था जैसा कि मैने जमशेदपुर
मे प्रारम्भ किया था। लेकिन फरार हालत मे ऐसा करना सम्भव न था। इन
सब बातो के होते हुए भी मजदूरो मे काम करने के लिए मैने अपने आदमी भेजना
प्रारम्भ कर दिया था। श्री एम० एन० राय के दल के आदमी उन व्यक्ति-विशेष
की सहायता से जिनसे देहली मे मेरा परिचय हुआ था। मैने अपने आदमी
कलकत्ते के आस-पास के मिलो मे भेजना प्रारम्भ कर दिया था। यदि मै कुछ
दिन और न पकड़ा जाता तो सम्भव था थोडे ही दिनो मे हमारे आदमी
मजदूर-आन्दोलन मे भी भली प्रकार से काम करने लगते और क्रान्तिकारी
आन्दोलन के साथ-साथ मजदूर आन्दोलन मे भी हमारा दल निपुण और योग्य
हो जाता। कलकत्ते से काँचडा पाडा इत्यादि स्थानो के आने-जाने का खर्च
श्री एम० एन० राय के साथी श्री कुतुबुद्दीन अहमद दिया करते थे। उन लोगो
ने मजदूरो मे जागृति फैलाने के लिए एक साप्ताहिक पत्र भी निकाला था। हमारे
आदमी इन पत्रो को मजदूरो मे बेचने के लिए मिलो और कारखानो मे ले जाते
थे। लेकिन क्रान्तिकारी आन्दोलन के कार्य मे सहायता देने के लिए कुतुबुद्दीन
साहब तैयार न थे।

आदर्शों का संघर्ष / 351
क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए अर्थ-संग्रह करना एक अत्यन्त कठिन समस्या
थी। अनुशीलन समिति के नेतागण इस बार डाका डालकर अर्थ-संग्रह करने के
अत्यन्त विरोधी थे। कारण यह कि ऐसा करने से वे समझते थे कि क्रान्तिकारी
आन्दोलन को धक्का लगेगा, पुलिस सचेत हो जाएगी, और इस प्रकार संगठन-
कार्य पूरा होने के पहले ही इतनी बाधाएं उपस्थित होंगी कि शान्ति से काम
करना कठिन हो जाएगा। उस समय मैं इन लोगों की राय से सहमत नही हो
सका। मैं यह समझता था कि बलपूर्वक अर्थ सग्रह करने की नीति के कारण हम
लोगो मे छापामार युद्ध (गोरीलावार) चलाने की शक्ति उत्पन्न होती जाएगी
और अर्थ का सग्रह भी होगा तथा सगठित रूप से सकटपूर्ण कार्यं में हाथ बटाने
का अभ्यास भी होता जाएगा। अपने आदमियों मे कौन साहसी है, किसमें
कितनी त्याग की भावना है, सकट का सामना करने के लिए कितने व्यक्ति प्रस्तुत
हैं इन सब बातो का ठीक-ठीक पता चलता रहेगा। परन्तु मैं ग्रामीणों के घर मे
डाका डालने का पक्षपाती न था। अनुशीलन समिति के नेतागणों की नीति को
न मानकर मैं कलकत्ता के निकटस्थ बड़े-बड़े अंग्रेज़ मिल मालिको के रुपयों पर
हाथ डालने का प्रबन्ध करने लगा था। उनको भी यह बात मालूम थी। इसी
समय मै बम्बई और पजाब मेल ट्रेन के डाक के डिब्बे पर छापा मारने की तैयारी
कर रहा था। इसके अतिरिक्त क्रान्तिकारी नीति पर भी मैं एक लेख लिख रहा
था। मैं चाहता था कि अपने दल की ओर से जनता की जानकारी के लिए
क्रान्तिकारी आन्दोलन के कार्यक्रम को स्पष्ट शब्दों में खोलकर रख दिया जाय।
यदि प्रकाश्य रूप से कोई सामयिक पत्र चलाने का अवसर हमे प्राप्त नहीं है तो
कम-से-कम गुप्त रीति से पर्चे बँटवाने की व्यवस्था तो हमें अवश्य ही करनी
चाहिए। अनुशीलन समिति के नेतागण मेरी इन नीतियों के घोर विरोधी थे।
कलकत्ता मे आकर अनुशीलन समिति की सहायता न लेते हुए स्वतन्त्र रूप
मे मैं लोकसग्रह के कार्य मे जुट गया था। इसी प्रकार मैंने कुछ लोग इकट्ठे किए
जो कि यूनिवर्सिटी ट्रेनिंगकोर मे सामरिक शिक्षा पा रहे थे। ये सब कालेजों के
लड़के थे। इनमे दो एक इंजीनियरिंग कालेज के लड़के भी थे। इन लोगों की
सहायता से श्री सुशीलकुमार बैनर्जी नामक एक अच्छे कार्यकर्ता से मेरा परिचय
हो गया। ये पहले ही अनुशीलन समिति के सदस्य बन चुके थे। एक दिन मैंने
श्री सुशीलकुमार के साथ रास्ते पर चलते हुए कुछ नौजवानो को कांग्रेस-कार्य
करने मे तत्पर देखा। इनमे से एक के प्रति मेरी दृष्टि विशेष रूप से आकृष्ट,
हुई। ये साँवले रंग के थे। आयु लगभग बीस वर्ष की होगी। मैंने सुशील बाबू से
कहा कि मैं इस युवक से परिचित होना चाहता हूँ। सुशील बाबू ने कहा कि मेरी
भी निगाह इस पर लगी हुई है परन्तु इसके कुछ ऐसे मित्र है जो हमारी समिति
में नही है। मैने कहा कि अब देर करने की आवश्यकता नहीं है। सुशील बाबू कुछ
देर करना चाहते थे लेकिन मैंने कहा कि मैं आज ही उनसे मिलना चाहता हूँ।
उस दिन तो नही, परन्तु दो-एक दिन के अन्दर ही उनसे मेरा परिचय हो गया।