बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगृह-त्याग / 333
विपद् की आशंका से भय-विह्वल हो रही थी। ज्ञात-अज्ञात, निश्चित-अनिश्चित
मार्ग पर अनन्त दिशा की ओर पुत्र-कलत्रादि को साथ लेते हुए असहाय, संपदहीन
होकर चल पड़ने का दिन आ गया। न जाने किस देश में किस स्थिति में रहना
पड़ेगा। कहावत है 'पथे नारी विवर्जिता' और मैंने दो नन्हे-नन्हे बच्चों और
तरुणी भार्या को साथ लेकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए फरार
होने का साहस किया। अज्ञात दिशा में जाना था, इसलिए मौसी की पालित
कन्या से प्रार्थना की कि थोड़े दिनों के लिए तो आप मेरे साथ हो लीजिए। घर के
सब लोगों ने इस बात को स्वीकार कर लिया। नूटू दीदी मेरे साथ चलने को
तैयार हो गईं।
पुलिस की दृष्टि से बचना था। बाल-बच्चे असबाब बिस्तरे लेकर पुलिस की
निगाह बचाकर रेलवे स्टेशन से चलना है। स्टेशन पर पुलिस की सख्त निगरानी
है। इलाहाबाद में पुलिस मुझसे ज्यादा और किसे पहचानती थी ?
मेरे भाई मेरे बच्चों को लेकर स्टेशन के लिए रवाना होने लगे। मैं उस समय
घर में था। माताजी की सहन-शक्ति अन्तिम सीमा तक आ पहुंची थी। जितना
रोती थी उससे कहीं अधिक उनकी देह दुःखावेश में हिल रही थी। ओठ कांप रहे
थे, ठोड़ी संकुचित विकुचित हो रही थी। भोहें कुंचित थी, आंसू अविराम टपक
रहे थे। द्वार तक आकर जब माताजी मेरे बच्चे को लेकर गाड़ी पर चढ़ने लगीं
तो वह बहुत रोने लगी । मेरा दो साल का बच्चा झुक-झुककर बार-बार माता
जी का मुंह देख रहा था। बुद्धदेव को महाभिनिष्क्रमण के समय ऐसा दृश्य देखना
नहीं पड़ा था।
मैं सीधा स्टेशन नहीं गया। मेरे मामाजी और भ्राताओं ने मेरे बाल-बच्चों
को गाड़ी पर सवार करा दिया। गाड़ी छूटने के समय से एक-आध मिनट पहले
किसी दूसरे रास्ते से मैं अपने बाल-बच्चों मे आकर सम्मिलित हो गया। जहाँ
तक याद है यह दिन के क़रीब दस बजे का समय था।
प्रिय जन के विच्छेद के दुःख के अतिरिक्त मेरे मन में और कोई ग्लानि नहीं
थी। फरार जीवन मेरे लिए दुस्सहनीय न था। बहुतों ने मुझसे कहा है कि फरार
जीवन की अनिश्चयता ने उन पर इतना अधिक बोझा डाला था कि उससे पिसकर
उन्होंने सेंत में पुलिस के हाथों में आत्मसमर्पण कर दिया था। मैंने कभी भी ऐसे
बोझ का अनुभव नहीं किया। जब गाड़ी पर सवार हो गया तो मैंने एक अपूर्व
स्फूर्ति का अनुभव किया। पुलिस के सब प्रयत्नों को विफल करते हुए जब उनकी
आँखों में धूल झोंक दी तो मैंने एक छोटी-सी विजय की आत्म-तुष्टि का अनुभव
किया। पाठक यह न समझें कि पुलिसवालों के साथ हम लोगों का यह निरा आँख-
मिचौनी का खेल था। पकड़े जाने पर हम लोगों को जीवन से हाथ धोना पड़ता
था। देशवासी आज भी क्रान्तिकारियों के कार्यों को खिलवाड़ समझते हैं। लेकिन
ब्रिटिश सरकार की दृष्टि से हम लोगों के कार्यों का इतना गुरुत्व था कि हम लोगों
के पीछे सरकार ने लाखों रुपए खर्च कर दिए। केवल संदेहमात्र से ही किसी