बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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अपना नाम भी बताया। सब बातें सुनकर उन्होंने बहुत कौतुक अनुभव किया
और हँसकर बताया कि "आपका तार हम लोगों को मिला था। हमारे भी एक
आदमी का नाम शचीन्द्रनाथ है। वे भी मिर्ज़ापुर में ही रहते हैं और नरेन्द्रनाथ
भी हम लोगों में से इनका नाम है। चन्दनगर में एक ही मुहल्ले में दो नरेन्द्रनाथ
हैं। हम लोग समझ रहे थे कि हमारे आत्मीय शचीन्द्रनाथ आ रहे हैं। इसीलिए
स्टेशन पर आये थे। आपके मित्र को तो पता भी नहीं कि आप आ रहे हैं। अच्छा
हम अभी जाते हैं और उन्हें सूचित करते हैं कि आप आ गए हैं। आप लोग गाड़ी
पर आइए हम लोग सायकिल से चलते हैं।" कुछ तसल्ली हुई। आशा का उदय
हुआ। फिर हिम्मत बाँधी। नरेन्द्रनाथ का मुहल्ला बहुत दूर था। करीब घंटे-
भर चलने के बाद रास्ते में देखता हूँ कि नरेन्द्रनाथ अपने मकान से काफ़ी दूर पर
रास्ते में हम लोगों का इन्तजार कर रहे थे। हमें देखकर उन्हें कुछ प्रसन्नता नहीं
हुई। मैं मन-ही मन विचलित हो उठा। मेरा भय सच्चा साबित हुआ। अत्यन्त
घबड़ाहट के साथ नरेन्द्रनाथ जी ने कहा कि "आप लोगों का मेरे मकान मे रहना
संभव नहीं है। ब्रिटिश सरकार के एजेण्टों ने चन्दनगर के अधिकारी पुरुषों से कुछ
समझौता कर लिया है। अब फरार व्यक्ति का चन्दनगर में रहना आसान नहीं
है। बाहर से किसी आगन्तुक के आने पर हमें पुलिस को इत्तला देनी पड़ेगी।
ऐसी अवस्था में मेरे घरवाले आपको अपने यहाँ ठहराने के लिए प्रस्तुत नहीं है।"
मेग मुंह सूख गया। मुझमें इतना भी साहस बाकी नही रह गया कि मैं अपने स्त्री
और बच्चों की तरफ देखूं। तथापि अपने मन की व्यथा और विक्षोभ को मैंने
नहीं व्यक्त होने दिया। मैंने अपने मित्र से कुछ अनुनय विनय की और कहा कि
कम-से-कम दो-चार दिन तो ठहरने की व्यवस्था कर दो। उनके भय विह्वल
हृदय ने मेरी एक न मानी। मेरे पाम अधिक देर तक ठहरना भी उनके लिए दुःसह
हो गया। उनकी इस मानसिक स्थिति और आचरण को देखकर मेरे मन में
अत्यन्त क्रोध, घृणा एवं वितृष्णा की उत्पत्ति हुई। नरेन्द्रनाथ की तरफ लौटकर
देखने को दिल नहीं चाहा। गाड़ी वाले से कह दिया लोटो। अब किधर जाता।
मेरी पत्नी मुझ पर अत्यन्त अप्रसन्न हो गईं और कहने लगी, "इन्हीं आदमियों के
सहारे तुम इतना बड़ा काम करने जा रहे हो?" मैं इसका क्या उत्तर देता ! मैं
उनके चेहरे को एकाग्र दृष्टि से देख रहा था और अनुमान कर रहा था कि उनके
क्रोध और अप्रसन्नता की सीमा कहाँ तक पहुँची है। एक अपराधी व्यक्ति की
नाईं अपनी स्त्री की तरफ देखते हुए मैंने कहा, "कोई परवाह नहीं है अभी दूसरा
बन्दोबस्त हुआ जाता है।" मुंह से तो कह दिया लेकिन मन में डरता रहा। सन्
1914 के क्रान्तिकारीगण चन्दनगर में उपस्थित थे। पुलिस की दृष्टि से बचने के
लिए उन लोगों के यहाँ मैं नहीं गया था। चन्दनगर की राजनीतिक स्थिति से
मैं सुपरिचित था। नरेन्द्रनाथ जी ने मुझे कोई नई बात नहीं बताई थी। उनके
यह मेरे रहने के प्रस्ताव स्वीकार करने के पहले ही उन्हें सब बातें सोच लेनी
उचित थीं। इस प्रकार अकस्मात् मुझे विपत्ति के सागर में डाल देना उनका