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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 339, कुल 408 में से

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पृष्ठ 339

फिर बंगाल में / 337
कितना बड़ा अपराध था पाठकगण स्वयं सोच सकते हैं।
नरेन्द्र के मुहल्ले से मेरे पुराने क्रान्तिकारी साथियों का मुहल्ला बहुत दूर
था। स्टेशन से नरेन्द्रनाथ के पास आने में घंटाभर लग गया था। अब फिर दूसरे
मुहल्ले जाने में एक घंटा लगा। साथ मे तीन महीने की एक शिशु कन्या और दो
साल का एक शिशु बालक भूख से व्याकुल हो रहे थे। पास दूध नही था। माता
के पयोधर से शिशु कन्या का निर्वाह हो चुका था। केवल दो-साल का बालक
क्षुधा से व्याकुल होकर अविरत रो रहा था। मेरी स्त्री ने फिर कहा, "तुम्हारे
काम में साथिन होने से और कोई आपत्ति थोड़े ही है, इन बच्चो के मुंह की तरफ
देखकर मुझसे सहा नही जाता। देखो अब इन बच्चो को क्या दूं, दो घंटे हो गए
अभी ठहरने का ठिकाना नही। तुम्हारे ऐसे साथी हैं कि तुम्हारे बाल-बच्चो को
सकट मे डालने मे उन्हे तनिक भी सकोच नही होता। ऐसे-ऐसे साथियो को लेकर
तुम काम करने चले हो। तुम्हे तजुर्वा तो कुछ है नही। हम लोगो को साथ
घसीटकर जाने कहां ले चले हो।" एक ओर ब्रिटिश सरकार से दुर्भावना की सीमा
नही है, दूमरी ओर नरेन्द्रनाथ जैसे साथियो के विश्वासघात से पीडित हो रहे है,
तिस पर अपनी प्रिया के मुख से यह सब अति मधुर वचन सुनकर मेरी अन्त-
रात्मा पर क्या बीत रही होगी पाठकगण इसका अनुमान कर सकते है। कितना
धैर्य, आत्मविश्वास, आदर्श निष्ठा, कितना अदम्य उत्साह एव आशावादी होने से
इतनी प्रतिकूलता के होते हुए भी क्रान्तिकारी अपना काम कर सकते है इसका
अनुमान पाठकगण स्वयं कर लेगे।
मै एक बडे पुराने लोक प्रसिद्ध क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस के एक आत्मीय
श्री श्रीशचन्द्र घोष के मकान को चलने लगा। रास्ते मे बच्चा बहुत रो रहा
था। और कोई उपाय न देखकर माताजी के दिए रसगुल्ले लडके को खाने को
दिए। क्षुधा की यन्त्रण से बालक के मुंह से इस समय एक या दो शब्द निकलते
थे 'दूध दाओ', बगला मे 'दो' को 'दाओ' कहते हैं। जीवन मे सर्वप्रथम मेरे बालक
ने इन्ही दो शब्दो का उच्चारण किया था। बेचारे के मुंह से 'दूध दाओ,' 'दूध
दाओ' के शब्द सुनकर अन्त मे हम लोगो ने उसे खाने को रसगुल्ले दिए। पूरा
रसगुल्ला खा जाने मे उसे कुछ भी समय न लगा। हमे डर था कि रसगुल्ला खाने
से कही बच्चे के पेट मे फोडा न हो जाए। एक रसगुल्ला और थोडा-सा रस खा-
पीकर बच्चा कुछ शान्त हुआ। हम लोगों को भी थोडी देर के लिए तसल्ली हो
गई। श्रीश बाबू को देखकर और भी तसल्ली हुई। बडी प्रसन्नता एव उत्सुकता
के साथ उन्होने मेरा स्वागत किया। मरुभूमि के बीच जलाशय को देखकर जैसे
पथिक सुखी होता है वैसे ही श्रीश बाबू को देखकर मुझे बेहद खुशी हुई।
बाबू श्रीशचन्द्र घोष के बारे मे दो-चार बाते यहाँ कह देना उचित होगा।
भारतवर्ष मे सबसे पहला जो बम षड्यन्त्र केस हुआ था जिसमे सर्वश्री अरविन्द
घोष, वारीन्द्रकुमार घोष, उपेन्द्रनाथ बनर्जी, हेमचन्द्रदास इत्यादि पकड़े गए थे
और भारत के इतिहास मे जिसने अलीपुर बम षड्यन्त्र केस के नाम से प्रसिद्धि