बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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पता मिलने पर मेरे लिए चन्द्रनगर के बाहर जाना प्रायः असम्भव हो जाएगा
यह मैं जानता था, तथापि यह तो था कि एक भौगोलिक सीमा के अन्दर तो मैं
निरापद एवं निश्चित रूप से रह सकता हूँ। श्रीश बाबू के साथ मकान ढूंढ़ने के
लिए निकल पड़े। पहले एक होटल मे गए। इस होटल की मालकिन एक ऐंग्लो
इण्डियन बुड्ढी थी। उस स्थान का वातावरण और होटल का चार्ज सुनकर वहाँ
रहना उचित न समझा। उस स्थान का दृश्य तो मनोहर था। होटल के सामने
से एक चौड़ा रास्ता गंगाजी के किनारे-किनारे निकल गया था। फ्रांसीसियों ने
चन्द्रनगर एवं पाण्डीचेरी मे समुद्र एवं नदी के किनारे बड़े सुदृश्य और चौड़े
रास्ते बनाए थे। ऐसे दृश्य भारत के अन्य स्थानों मे विरले हैं। गंगा एवं समुद्र
के तटस्थल की भूमि पर ईंट की पक्की दीवारें खड़ी कर दी गई हैं एवं उनके
ऊपर से रास्ते निकाले गए हैं पानी मे जाने के लिए जगह-जगह सीढ़ियाँ निकाली
गई है। काशीजी मे भी गंगा का किनारा बहुत सुदृश्य है लेकिन पता नहीं क्यों
वहाँ इतनी अव्यवस्था है। किसी सुनिश्चित प्रणाली के अनुसार वहाँ पर न मकान
बनाये गए हैं और न कोई सड़क ही निकाली गई है। वहाँ की सीढ़ियो की दुर्दशा
की भी आज सीमा नहीं है। काशीजी के गंगा तट-सा सुन्दर स्थान सम्भव है।
भारतवर्ष में कोई दूसरा न हो तथापि ऐसे सौन्दर्य के निकेतन को भी आज अव-
हेलना की तुच्छता ने अशोभनीय बना रक्खा है।
उपर्युक्त होटल मे शनीचर और इतवार को कलकत्ता से शौकीन एवं धनी
व्यक्तियो का आगमन होता है। सुरादेवी की आराधना यहाँ पर खूब आसानी से
एवं आडम्बर के साथ होती है कारण यह कि दक्षिणा यहाँ पर कलकत्ता से बहुत
कम देनी पड़ती है। परिवार सहित ऐसे स्थान पर रहना कैसे संभव हो सकता
था। जब हम लोगों ने होटल की मालकिन से कहा कि कल-परसों तक अपना
निश्चय बता देंगे तो मालकिन ने आग्रह किया कि जब आप लोग होटल मे पधारे
हैं तो कुछ दक्षिणा तो अवश्य चढ़ानी पड़ेगी कुछ नही तो एक-एक गिलास
लेमनेड तो अवश्य ही पी लीजिए। लज्जावश एक बोतल लेमनेड तो पीना ही
पड़ा लेकिन जब बिल देखा तो प्राण सूख गए, आँखें उलट गईं। एक बोतल पानी
का दाम आठ आने लगाये गए थे। क्या करता देना ही पड़ा। जिस स्थान पर
क़दम रखते ही यूं आठ आने देने पड़े उस स्थान को मैंने फिर लौटकर न देखा।
भोजन-स्नान आदि के बाद मकान की तलाश मे फिर निकले। चन्द्रनगर
नितान्त छोटी जगह नहीं है। दूर-दूर तक पहुँचे, मकानात भी मिले, लेकिन
पसन्द न आए। विभिन्न स्थानों को देखकर पहले का भय और दृढ़ हो गया
कि इस स्थान पर रहने से मलेरिया से हम लोगों को जर्जरित होना पड़ेगा।
श्री श्रीश बाबू के यहाँ रहना उचित नही समझा और उनके यहाँ स्थान भी न
था। चित्त व्याकुल हो उठा क्या करें और क्या न करें कुछ ठीक न कर पाए।
चन्द्रनगर के पास एक छोटी-सी लेकिन मशहूर जगह श्रीरामपुर के नाम से
प्रसिद्ध है। यहाँ पर बंगाल के कुछ बड़े-बड़े ज़मींदार बसे हैं। मेरे मामा की