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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 408 में से

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पृष्ठ 343

मार्ग को ग्रहण नहीं किया। आज भी हमारे देश के लब्धप्रतिष्ठ गण्यमान्य
बुद्धिमान नेतागण क्रान्तिकारी मार्ग को बालकोचित समझते हैं। जो हो, भवानी-
शंकर और मैंने मिलकर बाली नामक एक कस्बे में काम चलाने लायक एक
मकान ढूंढ निकाला। किस ग्वाले से दूध लेंगे, कौन बर्तन मिलेगा, बाजार
कितनी दूर है, स्टेशन कितनी दूर है, रेलवे स्टेशन तथा स्टीमर घाट कितनी
दूर है इन सब बातों को दृष्टि में रखते हुए और सब बातों की उपयुक्त व्यवस्था
करके तीन-चार दिन के कठोर परिश्रम के बाद वह मकान ले लिया गया। रहने
की सुव्यवस्था हो जाने के बाद विप्लव कार्य में ध्यान देने का अवसर मिला।
एक तो बरसात के दिनों में यों ही बीमारियां हुआ करती है। फिर पश्चिम
में रहते-रहते ऐसा हो गया था कि अब बंगाल की जलवायु हम लोग बर्दाश्त नहीं
कर पाते थे। बाली के जलवायु के कारण लड़के को ब्रांगकाइटिस हो गया। इस
अपरिचित ग्राम मे असहाय, संपदहीन अवस्था मे मैं अत्यन्त चिन्तित हो गया।
और कोई अच्छा उपाय न रहने के कारण अन्त मे मैंने कलकत्ता जाने का ही
निश्चय किया। लेकिन रहने लायक एक उपयुक्त स्थान खोज निकालने के पहले
बाल-बच्चों को कलकत्ता में अपने चचेरे भाई के मकान मे लाकर रक्खा। वहीं
पर रहकर लड़के का इलाज हुआ। इसके बाद कलकत्ता में ही एक दूसरे मकान
मे हम लोग रहने लगे। मेरे आत्मीय स्वजनों को यह पता नही था कि मैं कहाँ
रहता हूँ। बहुतों से मैंने कह दिया कि मैं फ्रांसीसी चन्द्रनगर मे रहता हूँ। अपने
दो-एक विशेष मित्रों को छोड़कर क्रान्तिकारी दल के भी किसी को पता न था
कि मैं कहाँ रहता हूँ।
मैंने सदा इस बात के प्रति ध्यान रक्खा कि देश के गण्यमान्य प्रकाश्य नेताओं
से अवश्य मिलूं एव उन्हें क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रति महानुभूति सम्पन्न एवं
सहायक बनाने के लिए यथासाध्य प्रयत्न करूँ।
इस नीति के अनुसार देशबन्धु चित्तरंजनदास के साथ मिलना मैंने अपना
प्रथम कर्त्तव्य समझा। इनका कुछ परिचय मैंने पहले ही दे दिया है। देशबन्धु
सी० आर० दास के साले के साथ हम लोगों का बहुत पुराना और घनिष्ठ सम्बन्ध
था। इनकी सहायता से मैंने महात्मा गांधी से भी मिलने का प्रयत्न किया था।
महात्माजी जानते थे कि मैं फरार हालत में हूँ। देशबन्धु के साले श्री एस० एन०
हालदार महात्माजी के पास मेरा सन्देश लेकर गए थे। महात्माजी कांग्रेस के
कार्य से देशबन्धुदास के यहाँ आये हुए थे। पता नही कांग्रेस कार्य समिति की
बैठक थी अथवा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की। इसी अवसर पर श्री हेमंत-
कुमार सरकार की मार्फत मुझे यह संदेशा मिला कि मौलाना मुहम्मदअली साहब
मुझसे मिलना चाहते हैं। बनारस षड्यन्त्र के मामले में कालेपानी जाने के पहले
मौलाना मुहम्मदअली के साथ हम लोगों का सम्बन्ध हुआ था। कालेपानी से
लौटने के बाद उनसे मेरी मुलाकात नहीं हुई थी। इसलिए मैं भी इनसे मिलने
के लिए उत्सुक था। देशबन्धु के मकान में ही उनसे मुलाकात हुई। मौलाना