बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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वाद-विवाद में ऐसा भी समय आया जब प्रश्न खड़ा हो गया कि मैं जो करने जा
रहा हूँ वह उचित है या अनुचित। रवीन्द्रनाथ के बताने पर कि मैं अनुचित मार्ग
पर जा रहा हूँ मैंने माताजी से पूछा, "क्यों माताजी क्या तुम भी ऐसा ही समझती
हो ।" माताजी ने मृदु-मृदु हँसते हुए यह कहा कि "नहीं मैं ऐसा नही समझती हूँ।
मैं यह नहीं कह सकती कि तुम गलत रास्ते पर जा रहे हो। मैं केवल इतना ही
कहना जानती हूँ कि अब मुझसे सहा नहीं जाता। आज भी मेरे सामने वह दृश्य
भयानक आतंक की सृष्टि करता है जो कि मजदूरिन ने आकर तुम्हारी पहली
गिरफ्तारी के दिन कहा था। कपड़े का खूँट तुम्हारे गले मे लिपटा है, हथकड़ी से
दोनों हाथ बँधे हुए हैं, एक वस्त्र लेकर थाने की हवालात को तुम जा रहे हो।"
यह सन् 1915 की बात थी। राजनैतिक षड्यन्त्र के मामले मे यह मेरी पहली
गिरफ्तारी थी। उस दृश्य का वर्णन करते-करते माताजी का सुन्दर मुखावयव
ऐसा गम्भीर और कोमल हो गया जैसे वर्षणोन्मुख घन-विन्यस्त बादल होते हैं।
अभी तक हमारी बातचीत में कुछ ऊष्मा थी, कुछ हास-उपहास, कुछ व्यंग्य, कुछ
छेड़-छाड़ थी। अब सबके चेहरों पर कुछ गम्भीरता आ गई। माताजी ने मेरा
नाम लेकर फिर पूछा, "क्या तुम्हें डर नहीं मालूम होता ? क्या वे कालेपानी के
दृश्य तुम्हें याद नहीं आते ?" मैंने सरलतापूर्वक कहा, "माताजी ! मुझे आज भी
वे दृश्य स्पष्ट और मर्मान्तक रूप से याद हैं, उनसे मैं विचलित भी हो जाता हूँ;
डर भी मालूम होता है। जेल का भोजन, जेल अधिकारियों के तिक्त और निष्ठुर
व्यवहार ये सब बातें स्मरण आते ही रोम खड़े हो जाते हैं। और जिस मार्ग पर
मैं चल रहा हूँ उसका अन्तिम परिणाम मेरे लिए कुछ अच्छा नहीं है यह भी सत्य
है। परन्तु यह सब जानते हुए भी मैं कर्तव्य-पथ से कैसे हट जाऊँ ? यदि भारत
को स्वाधीन होना है तो मेरे ऐसे शत-सहस्र युवकों को ऐसे निर्मम निर्यातन सहने
ही पड़ेंगे। जिस रास्ते पर मैं जा रहा हूँ केवल इसी रास्ते से ही भारत स्वाधीन
हो सकता है और दूसरा रास्ता नहीं है।"
मेरी इस बात ने और माताजी के हार्दिक व्यथापूर्ण मौन समर्थन ने विवाद
का अन्त कर दिया। माताजी की बात ने मानो हम सब भाइयों के मन को झक-
झोर डाला। वृष्टि से जो पहले ही भलीभाँति आर्द्र हो चुका हो ऐसे वृक्ष को
झकझोरने से जैसे उसके पत्तों से एकदम बूंदों की बौछार होने लगती है वैसे ही
हम चारों के नयनों से नीर की बौछार होने लगी। रोते-रोते अपूर्ण उच्चारण से
मैंने कह दिया कि मेरे निकल जाने की सब तैयारी हो चुकी है। मैं अब वृथा काल-
क्षेप न करके निकल पडूँगा। उस समय यह नहीं मालूम पड़ता था कि कौन किसे
सान्त्वना दे। घंटेभर की ऊष्मता बाष्पाकार में परिणत हो गई। अव्यक्त एवं
अवर्णनीय स्नेह ने आँसुओं का रूप ग्रहण कर लिया। मानो हम परस्पर के और
निकटवर्ती हो गए। पता नहीं मेरी तरुणी भार्या पर क्या बीत रही थी। गोद में
बच्चे को लिये हुए बेचारी सर्व क्षण एकाग्रचित्त होकर बैठी हमारी बातें सुन
रही थी। पता नहीं अपने भाग्य को कोसती थी या सराहती थी। अथवा अनिश्चित