बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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के पास शान्ति से बातचीत भी हो सकेगी। हरिपुरा में पुनः श्री महाबीर देसाई ने
मुझसे वही बातें फिर कहीं लेकिन मेरे पास इतना पैसा न था कि मैं सेगांव जाकर
महात्माजी से मिलता। देहली में जब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक
हुई थी उस समय भी मैंने महात्माजी से मिलने का प्रयत्न किया था। लेकिन इस
बार भी विफल रहा।
मैं रात के ग्यारह बजे देशबन्धु के मकान से चल पड़ा। कुछ अपमान और
कुछ रोष से मैं मन-ही-मन चंचल हो रहा था। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि
मैने अपने व्यक्तित्व को ऐसे ऊंचे स्थान पर नही पहुँचाया है जिसके कारण
महात्माजी ऐसे व्यक्ति मुझसे मिलने के लिए उत्सुक होते। ऐसी मनोवृत्ति को
पाश्चात्य मनोविज्ञान के अनुसार Inferiority Complex (छोटेपन का भाव)
कह सकते है। मै इस हीनता के बोध को लेकर देशबन्धु के मकान-से लोटा। इस
हीनता बोध से आज भी मैं मुक्त नही हूँ।
इस घटना के बाद जब पुनः हालदारजी से मेरी मुलाकात हुई तो पता चला
कि महात्माजी मुझसे मिलने के लिए यथार्थ मे उत्सुक थे। उनकी इच्छा थी कि
कांग्रेस के अन्य व्यक्तियो के इधर-उधर चले जाने पर महात्माजी मुझे साथ
लेकर मोटर मे कही दूर निकल जाते और कार मे ही बैठे-बैठे सब बाते होती।
लेकिन दुख का विषय है कि हालदार साहब ने आकर मुझे सब बाते नही बताई।