बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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शौकतअली की तरह इन्होंने भी मुझसे गुप्त तरीके छोड़कर प्रकाश्य आन्दोलव में
काम करने का अनुरोध किया। मैंने अपनी नीति इनसे व्यक्त नहीं की।
श्री एस० एन० हालदार से विदित हुआ कि महात्माजी मुझसे अमुक दिन
रात को आठ बजे श्री सी० आर० दास के मकान पर मिलेंगे। उस समय देशबन्धु
का मकान खुफिया पुलिसवाले घेरे रहते थे। लेकिन मैं जानता था कि मुझे ये
पहचानते नहीं हैं। इनके रहते हुए भी मैं देशबन्धु के मकान पर ठीक समय पर
पहुँचा। हालदारजी से भेंट हुई। उन्होंने मुझे एक कमरे में बैठा दिया और कहा
कि जब तक मैं नहीं लौटता हूँ तुम यहीं पर ठहरो। यह एक मुनीम का कमरा
था। सम्भव है पुलिस वाले समझे हों कि मैं भी देशबन्धु के मुनीमों में से एक हूँ।
ठीक आठ बजे महात्माजी से मिलने की बात थी। कमरे में एक बड़ी घड़ी लगी
थी। इन्तजार करते-करते आठ से नौ, नौ से दस और दस से ग्यारह बजे लेकिन
हालदार साहेब वापस नहीं आए। एक तो वह स्थान पुलिस वालों से घिरा था
तिस पर मैं फरार हालत में घूम रहा था। इन्तजार करते-करते मेरे मन में नाना
प्रकार की दुश्चिन्ताएँ पैदा होने लगीं। मेरे मन में सन्देह होने लगा कि शायद
महात्माजी मेरे प्रस्ताव को उपेक्षा की दृष्टि से देख रहे हों, सम्भव है वह मुझसे
मिलना नहीं चाहते हो। मैंने अपने दिल में कुछ अपमान-सा अनुभव किया।
सम्भव है यह मेरे चरित्र की दुर्बलता हो, इसलिए जहाँ अपमान बोध नहीं होना
चाहिए था वहाँ भी अपमान बोध कर रहा था। मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि
मानो महात्माजी मेरी परवाह नहीं कर रहे हैं। यह मेरे परम दुर्भाग्य की बात है
कि आज भी बहुतेरे प्रयत्न करने के बाद भी मैं महात्माजी से नहीं मिल पाया।
हरीपुरा में भी मैंने महात्माजी से मिलने की बार-बार चेष्टा की और हर बार
मुझसे यही कहा गया कि आज महात्माजी की तबियत स्वस्थ नहीं है, आज
महात्माजी को अवकाश नहीं है, आज महात्माजी केवल दो-तीन मिनट ही दे
सकते है इत्यादि। एक दिन हरिपुरा में मैं सीधे महात्माजी के पास पहुँच गया तो
देखा कि महात्माजी श्री मंजरअली सोख्ता के साथ टहलते हुए बातचीत कर रहे
हैं। कुछ दूरी पर एक तरुणी खड़ी थी। उस तरुणी से संकोच के साथ मैंने पूछा,
क्या मैं महात्माजी के पास पहुँच सकता हूँ। उसने कहा कि हां चाहें तो आप जा
सकते हैं। मैं नि संकोच महात्माजी के पास पहुँच गया। उनके पाँव छूकर प्रणाम
किया और उनसे बातचीत करने के लिए कुछ समय की प्रार्थना की। महात्माजी
ने मेरे मुंह की तरफ कुछ एकाग्रता के साथ देखा। मैंने अपना नाम बताया लेकिन
इतने पर भी महात्माजी ने मुझे कोई समय नहीं दिया। यद्यपि वे श्री मंजरअली
सोख्ता के साथ बहुत देर तक टहलते हुए बातचीत करते रहे। सोख्ताजी से मुझे
बाद को मालूम हुआ कि उनसे उस समय महात्माजी की कोई विशेष आवश्यकीय
बातचीत नहीं हो रही थी। अब की जेल से छूटने के बाद मैंने महात्माजी को
एक पत्र भेजा था उसके उत्तर में उनके सेक्रेटरी ने मुझे यह लिखा था कि आप
बर्धा के पास सेगांव आइए, एक सप्ताह हम लोगों के पास रहिए और महात्माजी