सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 342, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 342

340 / बन्दी जीवन
शादी श्रीरामपुर के एक जमींदार के घर में हुई थी। जिस समय का मैं उल्लेख
कर रहा हूँ मेरे मामा के लड़के श्रीरामपुर में अपनी नानी के यहाँ रहते थे। मेरे
मामा के लड़के श्री भवानीशंकर राय से मेरी यथेष्ठ मित्रता थी। यह मैं
अवश्य जानता था कि भवानीशंकर की नानी अपने यहाँ मेरा आना-जाना अधिक
पसन्द नहीं करती थीं तथापि अपनी स्थिति को देखते हुए दो-चार-दस दिन के
लिए भवानीशंकर के यहाँ ठहरना ही मैंने उचित समझा। मेरा अभिप्राय यह था
कि श्रीरामपुर में अपने बाल-बच्चों को रखकर फिर कहीं रहने के उपयुक्त स्थान
की खोज कर लूं। जहाँ तक मुझे स्मरण है मैंने पहले अकेले श्रीरामपुर जाकर
भवानी भैया से सब बातचीत कर ली। बाद को बाल-बच्चों सहित श्रीरामपुर
पहुँचा। भवानी भैया की नानी के व्यवहार से यह नहीं मालूम पड़ता था कि वे
लोग हमसे किसी प्रकार से भी असन्तुष्ट रहे हों। इसी बात के लिए मेरे मन में
अत्यन्त दुर्भावना थी। अब एक दुर्भावना का तो अन्त हुआ।
भवानी भैया और मैंने मिलकर चन्द्रनगर से लेकर हावड़ा तक गंगा जी के
किनारे-किनारे जितनी बस्तियाँ और कस्बे थे सब पैदल छान डाले। श्रीरामपुर
से हावड़ा रेलवे लाइन से बारह-तेरह मील है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक कस्बे में,
मोहल्ले-मोहल्ले में कहाँ पर मकान खाली है, पड़ोसी कैसे हैं, कलकत्ता से आने-
जाने के लिए क्या-क्या सुविधाएं एवं असुविधाएं हैं, कहाँ पर क्या खर्च पड़ेगा, इन
सबके प्रति दृष्टि रखते हुए सुबह से शाम तक चक्कर काटते रहे। आज मैं बहुत
कृतज्ञता के साथ भवानी भैया की सहायता का स्मरण कर रहा हूँ। अनुशीलन
समिति के किसी सदस्य को मैंने अपने बंगाल आने की बात इसलिए नहीं बताई
थी कि ऐसा करने से बात फैल जाने की संभावना थी। और यह भी मैं चाहता
था कि उन लोगों की सहायता बिना लिये ही मैं अपनी सब व्यवस्था स्वतंत्र रूप से
कर लूँ। एक तरफ पुलिस मुझे गिरफ्तार करना चाहती है, दूसरी तरफ़ मैं वास-
स्थान के लिए भटकता फिर रहा हूँ। कहीं पर रहने का ठिकाना नहीं है। बाल-
बच्चे भी मेरे साथ मेरी तरह भटकते फिर रहे हैं। इन सब घटनाओं के बहुत
दिन बाद जब सन् 1930 ई० में मैंने नैनी सेण्ट्रल जेल में ट्राट्स्की की आत्म-कहानी
पढ़ी एवं सन् 1934 में लखनऊ सेण्ट्रल जेल में रहते समय साइबेरिया स्थित रूस
के क्रान्तिकारी पुरुष और स्त्रियों की जीवन-कथा पढ़ी थी तब मैंने अनुभव किया
कि मेरा भटकना उन लोगों की तुलना में कुछ भी नहीं था। इन सब निदारुण
दुःखों का सामना करना पड़ता है, इसीलिए ही तो क्रान्तिकारियों के मार्ग पर
चलने के लिए कोई सहज में तैयार नहीं होता है। यह बात केवल भारतवर्ष
ही के लिए ही सत्य हो ऐसा नहीं है, संसार-भर के क्रान्तिकारियों का इतिहास
पढ़ने से सभी को इस बात की सत्यता पर विश्वास हो जायगा। समग्र इतिहास
में यह बात पाई गई है कि सफलता प्राप्त करने के पूर्व प्रत्येक देश के क्रान्ति-
कारियों को बुद्धिमान व्यक्तियों ने अदूरदर्शी, अव्यावहारिक, पथभ्रान्त भावुक
बताया है। संसार के अधिकांश तथाकथित बुद्धिमान व्यक्तियों ने क्रान्तिकारी