बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
320 / बन्दी जीवन
हो गया। सम्भवतः वह जापानी देखना चाहता था कि हम भारतवासी कितने
गिरे हुए हैं। मेरे दिल में भावना बनी रही कि कही उसे जापान जाकर हम लोगों
की बुराई करने का मोका न मिले।
भोर होते ही ग्वालंद पहुँचे। इसके पहले मैं ग्वालंद कभी नही आया था।
वहाँ जो दृश्य मैंने देखा ऐसा दृश्य इसके पहले कभी नही देखा था। रेलवे लाइन
के लिए जितनी भूमि की आवश्यकता थी उसे छोड़कर चारों दिशाओं में पानी ही
पानी दिखाई दिया मानो एक समुद्र के बीच में आकर गाड़ी ठहर गई हो। जहाँ
पर गाड़ी आकर ठहरी उसके आसपास पानी में दो-चार झोपड़ियां इधर-उधर
दिखाई दी। एक टिकटघर है तो दूसरा मालगोदाम का दफ्तर, कही पानी अधिक
है कही कम। पछाहँ की ओर जैसे प्रत्येक बड़े स्टेशन पर गर्म पूड़ियां मिल सकती
हैं वैसे बंगाल में दो स्टेशनो को छोड़कर और कही नही मिल सकती। लेकिन
यहाँ के स्टेशनों पर बंगाली मिठाइयाँ मिल जाती हैं। ग्वालंद मे हम लोग स्टीमर
पर सवार हुए।
ढाका पहुँचकर जिस मकान मे आकर ठहरे वहाँ पर क्रान्तिकारी गण छिपे
हुए रहते थे एव जाली नोट बनाने के लिए नाना प्रकार के प्रयत्न कर रहे थे।
मुझे इस बात का पता था क्योकि अनुशीलन समिति के नेताओ के साथ इसके
पहले अर्थ-संग्रह के बारे मे मेरा बहुत-कुछ वाद-विवाद हो चुका था। मेरा कहना
था कि इस देश में रहकर जाली नोट बनाने मे हम लोग सफल नही हो सकते।
यदि नोट बनाना ही है तो विदेश मे जाकर आधुनिकतम वैज्ञानिक प्रणालियो द्वारा
बनाने की चेष्टा होनी चाहिए। मै किसी और उग्र कार्यक्रम पक्षपाती था। इस
मकान मे नोट बनाने के काम को देखकर कुछ आशा तो अवश्य उत्पन्न हुई और
उसके साथ मन मे कुछ ईर्ष्या का भी उद्रेक हुआ कि कही ये लोग बाजी न मार
ले जायें परन्तु नोट के एक-आध नमूने को देखकर मुझे यह भरोसा न हुआ कि ये
लोग नोट बनाने में कृतकार्य हो सकेंगे और अन्ततः यही बात हुई भी। नोट बने
लेकिन काम के नही थे।
अनुशीलन समिति के एक विशिष्ट नेता श्री त्रैलोक्य नाथ चक्रवर्ती से मेरी
खूब बातचीत हुई। मेरी शिकायतों का औचित्य उन्होने स्वीकार किया एव यह
वादा किया कि भविष्य मे ऐसी शिकायतो का अवसर आपको नही मिलेगा।
उनकी बातचीत से मुझे पूर्ण सन्तोष हुआ। ये बहुत सरल एवं सहज स्वभाव के
व्यक्ति हैं और जैसा कहते हैं वैसा ही करते हैं। अण्डमन मे रहते समय जिस
वीरता के साथ इन्होंने मेरा साथ दिया था अनुशीलन के और किसी व्यक्ति ने
ऐसा नही किया। अब मैं अनुशीलन समिति के साथ मिलकर काम करने को
तैयार हो गया।
अब यह तय हो गया कि मैं अनुशीलन समिति के साथ मिलकर काम करूँगा
और हमारे दोनों दलों के मिलने के बाद इसके नियन्त्रण मे मुझसे कुछ छिपाया न
जाएगा। त्रैलोक्य बाबू ने योगेश बाबू के लिए मेरे हाथ एक पत्र भेजा था और
अनुशीलन समिति का सहयोग / 321
उसमें यह लिखा गया था कि अब आगे तुम शचीन्द्र बाबू के नियन्त्रण में काम
करोगे। मैं चिट्ठी लेकर युक्तप्रान्त वापस चला आया। योगेशबाबू को जब मैंने
चिट्ठी दी तो वे बहुत प्रसन्न हुए। मैं भी एक अनुभवी कार्यकर्त्ता चाहता था।
इनको पाकर मैं भी बहुत प्रसन्न हुआ। इसके बाद उनके व्यवहार में मैंने कभी कोई
दोष नहीं पाया। सदा प्रफुल्लचित्त होकर वे मेरे कथनानुसार काम करने में तत्पर
रहते थे। उनके आचरण से मैंने यह कभी नहीं समझा कि वे अपने को किसी भिन्न
दल का समझते हों। अनुशीलन के दूसरे नेताओं से मतभेद होने पर भी योगेशबाबू
मेरे ही मत के अनुसार काम करते रहे। मैंने भी योगेशबाबू पर विश्वास करके
युक्तप्रान्त का कार्यभार उन पर ही छोड़ दिया था। स्वर्गीय राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी
योगेशबाबू से कहीं अधिक शिक्षित थे। योगेशबाबू से मिलने के बहुत पहले से ही
राजेन्द्रनाथ मेरे साथ काम कर रहे थे। वह मेरे विशेष मित्र भी थे। तथापि
पूर्ण रीति से अनुभवी न होने के कारण मैंने राजेन्द्रनाथ पर कार्य-भार न्यस्त न
करके योगेशबाबू पर न्यस्त करना ही उचित समझा। पंजाब का कार्यभार
अध्यापक जयचन्द्रजी पर न्यस्त था। योगेशबाबू से जयचन्द्रजी का अथवा किसी
अन्य व्यक्ति का परिचय मैंने नहीं कराया था। काम करने के सिलसिले में जो जो
व्यक्ति पंजाब से युक्तप्रान्त में आए थे। उन्ही से योगेशबाबू का परिचय हुआ था।
अनुशीलन के साथ सम्बन्ध स्थापित होने के बहुत पहले से ही सरदार भगतसिंह
युक्तप्रान्त में आ गए थे। त्रैलोक्यनाथ बाबू से चिट्ठी लाने के बाद मैंने यह
निर्णय किया कि योगेशबाबू बनारस छोड़कर कानपुर आकर ठहरें क्योंकि मैं यह
समझता था कि बनारस में राजेन्द्र लाहिड़ी हैं परन्तु कानपुर में मेरी अभिरुचि के
अनुसार कोई व्यक्ति न था। इसके पहले ही सरदार भगतसिंह को कानपुर में
ठहराया गया था। भगतसिंह भी बड़े योग्य व्यक्ति थे परन्तु अनुभवी न थे। इस
प्रकार जब योगेशबाबू एवं सरदार भगतसिंह दोनों व्यक्ति कानपुर में रहने लगे तो
ये एक-दूसरे से परिचित हो गए। अभी तक कानपुर में श्री राजकुमार, श्री विजय
कुमार तथा श्री बटुकेश्वर हमारे दल में सम्मिलित नहीं हुए थे। श्री सुरेशचन्द्र
भट्टाचार्य भी कानपुर में थे लेकिन सुरेशबाबू अनमने होकर हमारे दल का काम कर
रहे थे। योगेशबाबू के कानपुर आने पर ढंग से काम होने लगा। मैं था इलाहाबाद
में, राजेन्द्र लाहिड़ी थे बनारस में, और योगेशबाबू कानपुर में आ गए। लखनऊ में
हमारा कोई विश्वस्त और कार्यकुशल व्यक्ति न था। इलाहाबाद और कानपुर
वाले ही लखनऊ का काम भी संभाल रहे थे। धीरे-धीरे मैंने योगेशबाबू से युक्त-
प्रान्त के विभिन्न कार्यकर्ताओं का परिचय करा दिया। बनारस में योगेशबाबू के
दो-तीन मित्र थे यथा श्री मन्मथनाथ गुप्त, श्री शचीन्द्रनाथ बख्शी, श्री प्रणवेश
चटर्जी और स्वर्गीय चन्द्र शेखर आजाद।
योगेशबाबू के कानपुर चले जाने पर उनके बनारस के मित्रगण राजेन्द्रबाबू
के नियन्त्रण में काम करने लगे। मेरी गिरफ्तारी के पूर्व तक योगेशबाबू सरल
हृदय से मेरे साथ काम कर रहे थे। मेरे दिल में कभी भी यह सन्देह नहीं हुआ
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कि योगेशबाबू ने मुझसे कुछ भी छिपाया हो या हमारे दल में किसी प्रकार के भेद-
भाव की सृष्टि की हो। लेकिन उनके बनारस के अनुयायीगणों ने स्वर्गीय राजेन्द्र-
नाथ से सरल एवं उचित व्यवहार नहीं किया। इसका पता मुझे बहुत बाद को
चला था। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब तक हम दोनों गिरफ्तार नहीं हुए थे
हम लोग एक-दूसरे पर पूर्णतया निर्भर रहते थे। यह भी सत्य है कि आये दिन के
कार्यक्रम से योगेशबाबू को यह प्रतीत हो रहा था कि उत्तर भारत में हमारा कार्य-
क्रम बंगाल के कार्यक्रम से अधिक उपयोगी एवं अधिक फलप्रसू था। इतिहास के
पृष्ठों में यह बात आज प्रमाणित भी हो चुकी है कि क्रान्तिकारी आन्दोलन के
सम्पर्क में उत्तर भारत के दल की जितनी देन है उसकी तुलना में बंगाल की
अनुशीलन समिति की कुछ भी नहीं है। उत्तर भारत के कार्यक्रम से योगेशबाबू
इतने प्रभावित हुए थे कि वे बंगाल में जाकर अपने उद्योग से अर्थसंग्रह करके
युक्त प्रान्त में लाते थे। जहाँ तक मुझे स्मरण है बंगाल के नेताओं को इसका पता
न था। यदि पता होता तो वे भी अवश्य इसके हिस्सेदार बन जाते। योगेशबाबू
के आचरण से मैं कभी यह सन्देह नहीं कर पाया कि वे मुझे किसी अन्य दल का
नेता समझते थे और अपने को किसी दूसरे दल का अनुयायी। बात तो यह थी कि
बंगाल में भी अनुशीलन समिति के नेतागण सदा यही बताते थे कि सान्याल भी
अपने ही दल का आदमी है। उत्तर भारत के कार्यक्रम की बहुत-सी बातें मैं योगेश-
बाबू को बता दिया करता था जो कि मैंने बंगाल के नेताओं को नहीं बताई
थीं। इसका एक कारण था कि मैं योगेशबाबू से दिन-रात काम ले रहा था इस-
लिए उन्हें बहुत-सी बातों का बताना आवश्यक हो जाता था। दूसरा कारण यह
था कि बंगाल के नेताओं के साथ मिलने का अवसर मुझे कम प्राप्त होता था।
तीसरी बात यह थी कि हम लोगों में एक प्रतियोगिता की भावना रहती थी। चौथी
बात यह थी कि अनुशीलन के नेतागण अपनी सब बातें मुझे नहीं बताते थे। लेकिन
धीरे-धीरे हम एक-दूसरे को समझने लगे थे और क्रमशः हम लोगों में सहयोग
की भावना प्रबल हो रही थी।
मैं चाहता था कि पंजाब-शाखा की सहायता से काश्मीर और काबुल के
रास्ते से हम रूस और पश्चिम यूरोप तक पहुँचें, इन रास्तों से अस्त्र आदि के
मँगाने की व्यवस्था करें और विदेशस्थ भारतीय विप्लववादियों के साथ इन्ही
रास्तों से अपना योगसूत्र स्थापित करें। इस विषय की कोई बात न मैंने योगेश-
बाबू को बतलाई और न बंगाल के नेताओं को। इसी प्रकार युक्तप्रान्त के कार्य-
क्रम के बारे में भी सब बातें मैंने बंगाल के नेताओं को नहीं बताई थीं। आज
भी वे कार्यक्रम अपूर्ण रह गए हैं। इसलिए इन सब बातों का उल्लेख करना आज
उचित न होगा। इस स्थान पर तो मैं केवल इतना ही बताना चाहता हूँ कि उन
पिछले दिनों में योगेशबाबू के साथ मेरा क्या सम्बन्ध था।
मैं यह पहले ही बता चुका हूँ कि दिल्ली से लौटने के बाद मैं कानपुर गया।
कानपुर में पहला बोलशेविक कान्सप्रेसी (षड्यन्त्र) केस चल रहा था। इस
अनुशीलन समिति का सहयोग / 323
षड्यन्त्र के मामले में मैं भी गिरफ्तार होन वाला था यह भी मैं बता चुका हूँ ।
कानपुर में वोलशेविक केस चलने के पहले ही युक्तप्रान्त के एक मॉडरेट नेता ने
मुझे यह सूचना दे दी थी कि सम्भव है मैं भी इस मामले में गिरफ्तार हो जाऊँ ।
उस समय मैं बड़ी सावधानी से घूमता-फिरता था। अब तक मैं युक्तप्रान्त और
पंजाब में क्रान्तिकारी आन्दोलन की नींव डाल चुका था। युक्तप्रान्त के प्रायः
सभी बड़े शहरों में हम लोगों का संगठन हो चुका था। पंजाब में अच्छे कार्यकर्ता
मिल चुके थे । युक्तप्रान्त और पंजाब में भी मुझे क़रीब-क़रीब फ़रार हालत में
ही घूमना पड़ता था। मैं यह बहुत चाहता था कि मुझे एक अनुभवी कार्यकर्ता
मिल जाय तो मैं अपना घूमना-फिरना बन्द कर दूं। योगेशबाबू के मिलने पर
मुझे यह सन्तोष हो गया कि अब मैं एक स्थान पर निश्चित होकर जम सकता
हूँ और उस स्थान से बैठे-बैठे समस्त क्रान्तिकारी आन्दोलन का नियन्त्रण कर
सकता हूँ ।
देहली में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के बाद बंगाल में रेगुलेशन 3 के अन्त-
र्गत बहुत-से क्रान्तिकारी नेता बेकार होने लगे थे। इनमें पूर्वोक्त श्री सत्येन्द्रचन्द्र
मित्र एवं श्री सुभाषचन्द्र बोस भी थे । मैं इसके पहले से ही कुछ सावधान-सा हो
गया था। बंगाल की गिरफ्तारियों के बाद मैंने यह निश्चय कर लिया कि अब
मुझे बाकायदा फरार होना पड़ेगा वर्ना बच न सकूँगा ।
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गृह-त्याग
अण्डमन से लौटने के बाद मैने विवाह कर लिया था। यथा-रीति फरारहोने
के पहले मेरे दो संतानें हो चुकी थी । मेरे मामने यह विकट प्रश्न था कि मै अपनी
स्त्री और इन दो बच्चों को किसके पास छोड़कर फरार होऊँ । हम चार भाई थे
ओर मैं ही सबसे बड़ा था । मेरे दूसरे भाई भी ब्याह कर चुके थे ओर गोरखपुर
में सेण्टऐण्ड्र ूज कालेज में अध्यापक का काम कर रहे थे । बनारस षड्यन्त्र केस
के मामले में ये भी मेरे साथ गिरफ्तार हुए थे । न्यायालय से मुक्त होने पर भी
इन्हें गोरखपुर मे नज़रबन्द रक्खा गया था । मेरे तीसरे भाई ने उम समय तक
शादी नही की थी । वह इण्डियन प्रेस में काम कर रहे थे । मेरी माता उम समय
जीवित थी । मेरी मौसी भी माताजी के पाम रहती थी । मेरे सर्व कनिष्ठ भ्राता
कालेज में पढ़ रहे थे । मेरे मंझने भाई जो प्रोफेमर थे मुझसे अत्यन्त असंतुष्ट
थे । वे बिलकुल भी नही चाहते थे कि मैं राजनैतिक उलझनों में व्यर्थ के लिए
फँसा रहूँ, और फिर मेरी राजनीति भी साधारण राजनीति न थी । बुद्धिमान
व्यक्ति ऐसी राजनीति मे फँसा नही करते थे। मेरे मंझले भाई श्री रवीन्द्रनाथ
संत क्रोध के साथ कहा करते थे कि "तुम्हारी वजह से मेरी भी नौकरी जायगी ।
तुम मानते नही हो । क्या हम लोगों की कोई ज़मींदारी है ? आज हमारी और
जितेन्द्र की नौकरी चली जाय तो कल मकान का किराया भी न दे मकेंगे । तुम
तो अपनी धुन में मस्त हो । शादी कर ली, बाल-बच्चे हो चुके है । तुम्हें तनिक
भी परवाह नही है कि इन सबका क्या होगा । समय-समय पर माताजी भी मेरे
ऊपर बहुत नाराज होती थी । माताजी का भी अधिक दोष न था, बेचारी तीस-
बत्तीस वर्ष की अवस्था में ही विधवा हो गई थी । सांसारिक सुख शान्ति उन्हें
कुछ भी न मिली थी । अपनी बाईस वर्ष की अवस्था में मुझे कालेपानी जाना पड़ा
था। लौट आने के बाद भी मैंने साधारण गृहस्थ जीवन व्यतीत करना नही चाहा।
माताजी ने आशा की थी कि शादी कर लेने से मैं गृहस्थ बन जाऊँगा । माताजी
की यह आशा भी पूरी नही हुई । आशा-भंग की पीड़ा से एवं भविष्य की आशंका
से मेरी माता सदा दु खी रहती थी। एक दिन की बात हो, दो दिन की बात हो, तीन
दिन की बात हो, तो निबाह भी लें । लेकिन बारहौं माह, तीसों दिन इम पारिवारिक
अशान्ति के बीच जीवन व्यतीत करना कितना दुःखदायी है भुक्तभोगी को छोड़
गृह-त्याग / 325
यह बात दूसरे नहीं समझ सकते। ऐसी परिस्थिति में यदि मैं बच्चों को अपनी
माता और भाइयों के पास छोड़कर फरार हो जाता हूँ तो इन पर मैं एक भारी
बोझा डाले जाता हूँ। और इस प्रकार फरार होने से यह भी बात थी कि मुझे
सदा के लिए अपनी स्त्री तथा बाल-बच्चों से विच्छिन्न होना पड़ता। विभिन्न
देशों के क्रान्तिकारी आन्दोलन के इतिहास में यह प्रायः देखा गया है कि फरार
व्यक्ति लौट-फिर कर अपने परिवार में आकर पकड़े गए हैं। जब मैंने विवाह
किया था तो मैंने अपने भाइयों से यह आग्रह किया था कि मैं क्रान्तिकारी आन्दो-
लन में जीवन बिता दूँगा और आवश्यकता पड़ने पर मेरे परिवार का भार आप
लोग ग्रहण करेंगे। उनके लिए मानो यही देश सेवा है। मैं अपने जीवन को खतरे
में डालने के लिए प्रस्तुत हूँ तो क्या मेरे भाई मेरे परिवार का प्रतिपालन भी न
करेंगे। मेरे तीसरे भाई श्री जितेन्द्रनाथ सहर्ष यह कर्तव्य भार ग्रहण करने के
लिए प्रस्तुत हुए थे।
जब मुझे योगेशबाबू जैसे कार्यकर्त्ता मिल गए तो मैंने भी यथारीति फरार
होने का संकल्प कर लिया। युक्त प्रदेश में मुझे पुलिस वाले अच्छी तरह से पह-
चानते थे। पंजाब की पुलिस उतना नहीं पहचानती थी। अपनी स्त्री का मुंह देख-
कर मेरे दिल में यह भावना उत्पन्न होती थी कि पराई लड़की को मैं कहाँ
घसीट लाया। इसे छोड़कर यदि मैं सदा के लिए फरार हो जाता हूँ तो क्या
इसका जीवन व्यर्थ-सा नहीं हो जायगा। अपने लड़के का मुंह देखता था तो यह
सोचने लगता कि यह बेचारा भी अपने पितृस्नेह से सदा के लिए वंचित रह
जायगा। मैं इस 'सदा के लिए' की भावना से नितान्त विचलित हो जाता था।
माता और भाइयों के स्नेह, स्त्री और सन्तानों की प्रीति के बन्धन से सदा के
लिए विच्छिन्न हो जाना मेरे लिए असहनीय था। और यह बात भी थी कि युक्त
प्रदेश अथवा पंजाब में मेरे लिए बाल-बच्चों को साथ लेकर फरार होना न संभव
था न उचित। इसका एक कारण तो यह था कि इन प्रदेशों में मुझे पुलिस के
काफी आदमी अच्छी तरह पहचानते थे और यदि मैं बड़े-बड़े शहरों को छोड़कर
किसी छोटे नगर में जाकर बाल-बच्चों सहित रहता तो भी बंगाली होने के नाते
मैं बहुत शीघ्र ही सबकी दृष्टि को आकर्षित कर लेता। ऐसी दशा में मेरे लिए
यह संभव न था कि मैं अपने बाल-बच्चों को साथ लेकर पंजाब अथवा युक्त
प्रदेश में फरार हालत में रह सकता। मैंने यह भी निश्चय कर लिया था कि
फरार हालत में मैं अपने बाल-बच्चों को साथ ही रक्खूँगा। इन सब कारणों से
मैंने बंगाल में ही फरार होकर रहने का निश्चय कर लिया। लेकिन फरार
होकर जान बचाना ही तो मेरा उद्देश्य न था और यदि फरार हालत में रहकर
क्रान्तिकारी आन्दोलन का कार्य करता तो यथारीति संगठन शक्ति की सहायता
के बिना ऐसा संभव न था। यदि मैं फरार हालत में रहकर क्रान्तिकारी अथवा
राजनैतिक आन्दोलनों से अलग रहता और किसी प्रकार से अपनी जीविका
उपार्जन कर लेता तो विशेष चिन्ता की कोई बात न थी। लेकिन एक तरफ
326 / बन्दी जीवन
ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति के समस्त साधन मुझे खोज निकालने में लगे हों
दूसरी तरफ में संकटपूर्ण क्रान्तिकारी कार्य में लगा रहूँ तो परिस्थिति कुछ और
ही हो जाती है ।
इन सब कारणों से मेरे लिए यह आवश्यक था कि बाल-बच्चों को लेकर
फरार होने से पहले मैं अपने रहने का स्थान एवं आवश्यकतानुसार सहायता पाने
की सब व्यवस्था कर लेता । इसके लिए मैंने बंगाल में जाकर सब प्रकार की विधि-
व्यवस्था का आयोजन किया । मैंने सोचा कि यदि कलकत्ता के पास फ्रांसीसी राज्य
के अन्तर्गत चन्द्रनगर में बस जाता हूँ तो संभव है मेरे लिए कुछ सहूलियत हो
जाय । चन्द्रनगर के एक कार्यकर्त्ता से मैंने बातचीत कर ली ये सज्जन अनुशीलन
समिति के नही थे । आप बंगाल के एक साप्ताहिक पत्र 'आत्मशक्ति' के दफ्तर मे
काम करते थे । क्रान्तिकारी आन्दोलन के साथ भी इनका सम्पर्क था । यह तो सभी
को मालूम है कि बंगाल में विभिन्न दल क्रान्तिकारी आन्दोलन में काम करते थे ।
इन सभी विभिन्न दलों को एकत्रित करने के लिए मैंने बहुत प्रयत्न किए थे । इसी
सिलसिले में इन सज्जन से मेरा परिचय हुआ । इनका नाम था श्री नरेन्द्रनाथ
बनर्जी । इन्होंने बड़े उत्साह के साथ मेरे चन्द्रनगर में रहने के प्रस्ताव का समर्थन
किया । और अपने मकान में रहने के लिए मुझसे विशेष आग्रह किया था । इधर
माताजी से मैंने कहा कि पिताजी के छोड़े हुए धन से मुझे एक या दो हजार रुपया
दे दें ताकि कुछ दिनों के लिए मैं निश्चिन्त हो जाऊँ । माताजी ने कहा कि यह
रुपये लेकर तुम बरबाद कर दोगे मैं तुम्हें माहवार कुछ देती रहूँगी । मैने इस
प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और कहा कि उन्हें मुझको कम-से-कम पच्चीस
रुपया प्रति मास भेजना पड़ेगा । माताजी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया ।
लेकिन केवल पच्चीस रुपये में बाल-बच्चों को साथ लेकर फरार हालत मे रहना
बहुत कठिन बात थी । और क्रान्तिकारी दल की आर्थिक सहायता पर पूर्ण रूप से
निर्भर करना भी बहुत कठिन बात थी । ऐसी अनिश्चयात्मक स्थिति में मैं अपने
परिवार को लेकर अथाह समुद्र में कूद पड़ा ।
मैं अच्छी तरह जानता था कि आज हो, या कल हो मुझे घरबार छोड़ना ही
पड़ेगा । फरार होने का अर्थ होता है आत्मीयजनों से एक अनिर्दिष्ट समय के लिए
विच्छिन्न हो जाना एवं अन्ततः पुलिस के पंजे में पड़कर न जाने किस अनजान
पातालपुरी में जाकर खो जाना । इस आसन्न विच्छेद की भावना से मैं दिन-प्रति-
दिन अधिक से अधिक विचलित होता गया । हम सब भाइयों में अत्यन्त प्रीति का
सम्बन्ध था । मुझे स्मरण है जब मैं लगभग चार या पाँच वर्ष का था तो मेरे मंझले
भाई के गाल में एक फोड़ा हुआ था जिसके चीरे जाने की बात सुनकर मैं एकदम
चंचल हो उठा था और अपने माता-पिता से मैंने कहा था कि मैं इसे कभी नहीं
चीरने दूँगा । मुझे यह भी स्मरण है कि मेरी माता ने मुझे यह कहकर बहुत सम-
झाया कि तुम्हारे एक और भाई कलकत्ता में पढ़ते हैं जिन्हें चीर-फाड़ का काम
करना पड़ता है यह तो एक साधारण बात है इसके लिए तुम्हें इतना व्याकुल होने
गृह-त्याग / 327
की आवश्यकता नही। एक दिन की बात है कि मेरे पिता के एक मित्र ने मेरे
कनिष्ठ भ्राता को गोद में उठा लिया था। इनसे हम लोग परिचित न थे इसलिए
मेरे मंझले भ्राता ने चिल्लाना शुरू कर दिया और अपने नन्हे-नन्हे हाथ फैलाकर
अपने कनिष्ठ भ्राता को उनकी गोद से उतारने की व्यर्थ चेष्टा करने लगे। बाल्या-
वस्था की वह प्रीति आज चालीस वर्ष के बाद भी वैसी ही बनी है। घोर दुर्दिनों
के समय जब मैं असहाय दशा मे ब्रिटिश सरकार के कारागार में निर्जन कोठरी
में अनिर्दिष्ट काल के लिए बन्द पड़ा रहा तब मेरे इन परम स्नेहास्पदों ने ही मेरे
बाल-बच्चों का विषाद-युक्त हर्ष के साथ लालन-पालन किया था। एक-दो दिन
के लिए तो सभी दुःख झेल सकते है लेकिन लगातार बारह-तेरह वर्ष तक अपने
असहाय भ्राता के दुख दैन्य अपने कंधे पर उठाने के दृष्टान्त आजकल संसार
में विरले ही है। ऐसे भाइयों से सदा के लिए बिछुड़ने की दुश्चिन्ता से मैं विचलित
क्यों न होता। और अपनी स्नेह-मयी जननी की बात का क्या कहना। किसकी
जननी स्नेहमयी नही होती ? और किस संतान को अपनी जननी से प्रेम नही
होता ? सदा के लिए ऐसी माँ और भाइयों से अलग होने की संभावना से मैं सदा
दुखी रहता था। अंत मे घर से अलग होना ही पड़ेगा यह मैं जानता था तथापि
स्नेह-बन्धन के कारण मैं उस अलग होने के दिन को सदा टालता रहता था। मैं
नित्य यह सोचता था कि अब अलग होना पड़ेगा और फिर अलग होने के दिन
को मैं टाल देता था। अपने बाल-बच्चों को तो मैंने साथ लेने का संकल्प कर ही
लिया था लेकिन अपनी दुखिनी विधवा जननी को मैं किस प्रकार छोड़ जाता।
यदि मैं इन स्नेह बन्धनों को नही तोड़ सकता हूँ तो मुझे राजनीति से अलग होना
पड़ता है।
माताजी के चार पुत्र थे। उनमें से एक चला जायगा। तीन तो माताजी के
पास रह जाएँगे। मुझे इतना ही संतोष रह गया था। एक दिन की बात है माताजी
प्रयाग में अर्धकुंभी के अवसर पर कल्पवास कर रही थीं। गंगा के तट पर साधु-
सन्तों का जमघट था। नग्न, अर्धनग्न, चन्दन सुशोभित तरह-तरह के वस्त्र पहने,
गौर, श्याम आदि सभी वर्ण के, उच्च कोटि, मध्य कोटि, अथवा निम्नस्तर के
नाना प्रकार के सहस्रों साधुओं के दर्शन के लिए जिज्ञासु अथवा कौतूहली सैकड़ों
व्यक्ति प्रातःकाल से संध्या तक वहाँ घूमा करते थे। मैं भी इन भटकते हुए
व्यक्तियों में से एक था। मेरी माताजी भी स्वतंत्र रूप से अपनी टोली के साथ
साधु-सन्तों का दर्शन करती थीं। एक गौरवर्ण सौम्य मूर्ति संन्यासी के पास मैं
प्रायः जाया करता था। कुछ न कहने पर भी मेरे मन के प्रश्न को योंही समझकर
इन महात्माजी ने मुझे बहुत-सी बातें बताईं। उनका उल्लेख करने की यहाँ आव-
श्यकता नहीं है। योग की शक्ति पर जिनका विश्वास नहीं है इन संन्यासीजी के
पास जाने से उनके संदेह का भंजन हो सकता है। क्योंकि यह साधु अद्या भी
जीवित हैं। इनका नाम है परमहंस श्रीमन्स्वामी जयेन्द्रपुरीजी। आजकल आप
बनारस के पास शिवपुर में अपने आश्रम में रहते हैं। मेरी माताजी भी मेरे पहले
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ही इन महात्माजी के पास पहुँची थी और उनमे उन्होने अपना दुखडा सुनाया था
कि मेरा लड़का निषिद्ध मार्ग पर चलकर देशसेवा करना चाहता है, हजार कहती
हूँ वह मानता ही नही। जाने क्या धुन सवार है। एक बार आजन्म कालेपानी
की सजा हो गई थी लेकिन परमात्मा की कृपा से चार-पाँच साल मे ही छुटकारा
मिल गया था। फिर वही काम करना चाहता है। मैने उसे किसी तरह भी समझा
नही पाया। आप महात्मा है यदि आप दो शब्द कह देगे तो लड़का अवश्य ही
मान जायगा। मै बहुत दु खी हूँ एक घडी के लिए भी मेरे मन मे शान्ति नही है।
मैं विधवा हूँ मेरा लड़का ही मेरा सहारा है।" यह सब बातें सुनकर सन्यासीजी
ने माताजी से कहा कि तुम अपने लडके को मेरे पास लेती आना। माताजी जानती
थी कि मैं भी साधु-सन्तो के पास आया-जाया करता हूँ। साधु-सन्तो से मेरी
अत्यन्त प्रीति है। एक दिन माताजी ने मुझसे कहा कि चलो तुम्हे एक पहुँचे हुए
महात्मा के पास ले चलती हूँ। मैं भी बडी उत्सुकता के साथ साधु-दर्शन के लिए
चल पड़ा तो देखता हूँ कि जिस महात्मा के पास मै जाया करता था उसी के पास
माताजी भी मुझे ले आईं। इनके पास आकर मुझे बडी प्रस-नता हुई। मेरे साथ मेरी
माता, मेरी पत्नी और मेरा डेढ साल का लड़का था। माता ने मेरी तरफ इशाग
करने के बाद कहा कि "यही मेरे पुत्र है जिनके सम्बन्ध मे आपसे पहले कह चुकी हूँ।"
महात्माजी ने माताजी को बताया कि यह तो मेरे पास पहले ही से आता है। और
मुझसे कहा आओ पास बैठो। कुछ बातचीत होने पर संन्यासीजी ने माताजी से
कहा कि "बेटी ! तुम्हारे जब चार लडके है, तब तो तुम्हे एक लडके को धर्मार्थ
देना ही पडेगा। चार मे से जब तीन तुम्हारे पास रहने है और एक धर्मार्थ
जीवन व्यतीत करना चाहता है तो उस पर तुम्हारा कोई अधिकार नही रह
सकता।" माताजी के दोनो नयन आंसुओ से भर आए लेकिन माताजी फिर भी
हँस रही थी क्योकि वे अच्छी तरह जानती थी कि मेरा मार्ग धर्म का मार्ग था।
मैं कोई बुरा काम करने नही जा रहा था। माताजी तो स्नेह की पीडा से
जर्जरित हो रही थी फिर भी उनकी धर्म की बुद्धि जागृत थी। एक विशिष्ट साधु
के मुख से उपर्युक्त वचनो को सुनकर मेरी माताजी को युगपद दुःख, स्नेह, गौरव
इत्यादि की भावनाओ के सम्मिश्रण ने एक साथ हर्ष और विषाद की अनुभूति
हुई। अश्रुपूर्ण नयनो से मेरी तरफ देखकर जब माताजी हँसने लगी तो मैं भी
हर्षोत्फुल्ल नयनो से विजयोल्लास की क्षणिक अनुभूति की दीप्ति से व्यक्त कर
रहा था और सौम्य मूर्ति गौरवर्ण उक्त महापुरुष की तरफ देखकर विस्मयपूर्ण
चकित दृष्टि मे कृतज्ञता एवं आत्म-समर्पण की भावना को दीनता के साथ व्यक्त
कर रहा था। इतने मे सन्यासीजी मुझसे यह कहने लगे कि "देखो बेटा ! हिन्दू
शास्त्र के अनुसार तुम्हारा यह परम कर्तव्य है कि जब तुमने विवाह कर लिया है
तो अपनी पत्नी की अनुमति की उपेक्षा करके तुम कोई धर्म कार्य नही कर
सकते।" यह बात मैं पहले ही से जानता था। मैं यह जानता था कि आर्य धर्म
के अनुसार यदि कोई सन्यासी भी होना चाहता है तो उसे न केवल अपने माता-
गृह-त्याग / 329
पिता की वरन् अपनी सहधर्मिणी और दूसरे आत्मीय जनों तथा प्रतिवेशियों से
भी अनुमति लेने की आवश्यकता है। इस पर मैंने महात्माजी से कहा कि "जिस
दिन सर्वप्रथम मुझे अपनी पत्नी से बातचीत करने का अवसर प्राप्त हुआ था,
मैने उसी दिन अपनी सहधर्मिणी से अपना अभीष्ट कार्य करने की अनुमति ले ली
थी। मैं आज भी इस बात के लिए प्रस्तुत हूँ कि यदि मेरी पत्नी मेरे अभीष्ट कार्य
के लिए मुझे अनुमति नहीं देती है तो मैं उस काम को नहीं करूँगा। आप भी
पूछ सकते हैं।" स्वामीजी ने मेरी पत्नी से पूछा, "क्यो बेटी, तुम अपने पति को
इस काम के लिए अनुमति देती हो !" उस बेचारी तरुणी ने कम्पायमान देहा-
वयव के इंगित से विकसित कुसुम की नाईं हँसते हुए मुख को हिलाकर अपनी अनु-
मति प्रकट की लेकिन नयन पल्लवों के द्रुत संचालन के साथ आँखों से दो-चार
आँसुओं की बूंदें टपक ही पड़ीं। बालव्रह्मचारी परमहंस परिव्राजक संन्यासी भी
एक बार विचलित हो गए और बार-बार सिर हिलाकर हँसते हुए मुझसे कहने
लगे, "नही बेटा ! यह लड़की अभी बहुत छोटी है। रोते हुए जो अनुमति इसने
दी है यह स्वीकार्य नहीं है।" मैंने कहा कि मैं फिर पूछ लूंगा और यह वचन देता
हूँ कि यदि इसने यथार्थ में अनुमति नहीं दी तो मैं इस काम को नहीं करूँगा।"
अतीत काल की ये सब बातें लिखते हुए आज भी मेरा हृदय हर्ष, अभिमान
और गुमान से भर आता है। आज भी हमारे देश में ऐसे साधु-सन्त हैं जिन्हें मेरे
ऐसे विद्रोही के अग्निमय कर्म-पथ से आन्तरिक प्रीति है। और हम अपनी सामा-
जिक व्यवस्था की निगूढ बातों के प्रति ध्यान देने से आज भी फूले नहीं समाते।
कर्तव्य कर्म चाहे कितना ही संकटपूर्ण और अग्निगर्भ क्यों न हो हमारे समाज के
शीर्षस्थानीय संन्यासी आज भी उससे विचलित नही होते और मेरे ऐसे विद्रोहियों
के कठोर कार्यों का वे हृदय से समर्थन करते थे। फिर पत्नी का स्थान हमारे
समाज में कितना ऊँचा है। पत्नी की अनुमति बिना कोई काम करना उचित नहीं
है। पत्नी हमारे भोग की सामग्री नहीं है सहधर्मिणी है, सहधर्मिणी को छोड़कर
हिन्दू समाज में, आर्य संस्कृति में, मनुष्य अपूर्ण रह जाता है। पत्नी को पाकर ही
समाज में मनुष्य स्वधर्मानुष्ठान के अधिकार को प्राप्त करता है अन्यथा नहीं।
हिन्दू समाज में पत्नी को छोड़कर कोई शुभ कार्य सम्पन्न नहीं हो सकता। जिस
समाज में बिना पत्नी की अनुमति पति को संन्यास लेने का भी अधिकार नहीं उस
समाज में स्त्री का स्थान कितना ऊँचा होना आवश्यक है इसे आज हम भूल रहे
हैं। आज पाश्चात्य समाज में स्त्री-अधिकार के प्रश्न पर कितना शोरगुल मचा
हुआ है मानो स्त्री के अधिकार पुरुष से एवं पुरुष के अधिकार स्त्री से स्वतन्त्र हैं।
हमारे सामाजिक आदर्श में पुरुष और स्त्री के मिलने से ही पति-पत्नी के रूप में
एक परिवार के रूप में एक परिपूर्ण स्वतन्त्र अस्तित्व बनता है। इसीलिए हमारे
समाज में पुरुष और स्त्री के अधिकार अलग-अलग नहीं होते। कामरेड शब्द से
भी सहधर्मिणी शब्द अधिक व्यापक एवं अर्थगर्भित है। सहधर्मिणी शब्द के अनुसार
बुरे कार्य में स्त्री पति की साथिन नहीं हो सकती, कामरेड शब्द के अनुसार हो
330 / बन्दी जीवन
सकती है। हिन्दू समाज में माता-पुत्र के सम्बन्ध पाश्चात्य समाज से अधिक घनिष्ठ
हैं। पाश्चात्य समाज में विवाह के बाद लड़का अलग रहने लगता है। हिन्दू समाज
में पिता, माता, भाई, भगिनी, पत्नी और सन्तान एक साथ ही मिलकर रहते हैं
और इस प्रकार से जो परिवार बनता है हिन्दू समाज में वही इकाई का स्थान
ग्रहण करता है। हिन्दू समाज में पुरुष और स्त्री के लिए अलग-अलग रूप से उनके
स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया गया है। इस स्थान पर समाज विज्ञान
की चर्चा करने की न तो इच्छा ही है, और न स्थान ही। अतीत काल की एक
मधुमय स्मृति का उल्लेख करते समय जो बातें अनिवार्य रूप से उमड़ पड़ीं उन्हें
व्यक्त किए बिना मैं रह नहीं सका। इस बात के लिए पाठकगण मुझे क्षमा करेंगे।
सन् 1924 के फरवरी माह में प्रयाग में कुम्भ का मेला लगा हुआ था। मैं जून
महीने में इलाहाबाद से फरार हुआ था। इस समय मेरे मकान में मेरे सब निकट
आत्मीय उपस्थित थे। मेरे मामा थे, मेरी मौसी, मौसी की एक पालित कन्या, मेरे
तीनों भाई, मेरे मंझले भाई की पत्नी तथा मेरी पत्नी। कालेज में छुट्टी रहने के
कारण मेरे मंझले भाई श्री रवीन्द्रनाथ सपरिवार इलाहाबाद आये हुए थे। जब
हम सब भाई एकत्र होते थे तो पहला सप्ताह घोर वाद-विवाद में व्यतीत होता
था। भोजन के लिए माताजी चिल्लाया करती थी और हम वाद-विवाद में मग्न
रहते थे। सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं की मीमांसा किए बिना खाने
कौन जाय। मेरे मंझले भाई रवीन्द्रनाथ मामाजिक विषयों में घोर परिवर्त्तन् के
पक्षपाती थे और मैं प्राचीन प्रथाओं का समर्थक था। रवीन्द्रनाथ चाहते थे कि
पुरुष और स्त्रियों के अबाध मिलन में कोई बाधा न रहे। मैं ऐसे अबाध मिलन
का घोर विरोधी था और अब भी हूँ। रवीन्द्रनाथ पुरुष-स्त्री के एक साथ शिक्षा
पाने के पक्ष में थे और मैं इसे कभी भी पसन्द नहीं करता। परन्तु मजे की बात
यह थी कि राजनीतिक क्षेत्र में मैं घोर विप्लव का पक्षपाती था और रवीन्द्रनाथ
सुधार के। ऐसी दशा में आपस में घोर द्वन्द्व क्यों न हो ? एक सप्ताह के घोर द्वन्द्व
के बाद हम एक-दूसरे की उपेक्षा करने लगते, समझ लेते थे कि इसके आगे बढ़ने
से वाद-विवाद आरम्भ हो जाएगा। लेकिन दूसरे वर्ष जब हम लोग फिर मिलते
तो वाद-विवाद पुनः आरम्भ हो जाता और एक सप्ताह के पूर्व शान्ति स्थापित
नहीं होती थी। वाद-विवाद के समय पड़ोस के आदमी समझते थे कि हम आपस
में लड़ रहे हैं।
रवीन्द्रनाथ जानते थे कि मैं निषिद्ध मार्ग पर, संकटपूर्ण रास्ते से, राजनीतिक
क्षेत्र में अग्रसर हो रहा था। एक दिन रवीन्द्रनाथ से फिर वही पुरानी बहस शुरू
हो गई। एक बड़े कमरे में हम पांच व्यक्ति उपस्थित थे। रवीन्द्रनाथ को छोड़कर
मेरे मामा और मेरी माताजी भी बहस में भाग ले रही थी। मेरी पत्नी कुछ दूरी
पर बैठी हुई हम लोगों की बातें बड़े ध्यान से सुन रही थी। जैसा हुआ करता है
बातचीत यों ही शुरू हुई और धीरे-धीरे उसने गम्भीर रूप धारण कर लिया।
मेरी माताजी एक पढ़ी-लिखी और समझदार स्त्री थीं। राजनीतिक और सामाजिक
गृह-त्याग / 331
बातों में भी उनके विचार बहुत स्वच्छ एवं निर्भीक थे। माताजी से स्नेहावरण के
कारण सत्यता नहीं छिपती थी। रवीन्द्रनाथ ने यद्यपि इतिहास में एम० ए० पास
किया था तथापि राजनीतिक मामलों में उनके विचार माताजी की नाईं स्वच्छ
एवं निष्पक्ष नहीं थे। रवीन्द्रनाथ स्नेहावेश में आकर सत्य की मर्यादा का उल्लंघन
करते थे। मेरे मामाजी भी परम स्नेहवश रवीन्द्रनाथ के ही पक्ष का समर्थन कर
रहे थे। मेरी माताजी मामाजी एवं रवीन्द्रनाथ मुझे विद्रोही के कठोर अग्निमय
विनाशकारी मार्ग में जाने से रोकते थे। लेकिन विचार की क्षुरधार के सामने
रवीन्द्रनाथ आदि नहीं टिक पाते थे। तथापि विचार-बुद्धि ही तो मनुष्य का सब-
कुछ नहीं है। संसार में विचारपूर्वक ही सब काम नहीं होते। मनुष्यों की भावना,
उनके पूर्व संस्कार, उनकी शिक्षा-दीक्षा, उनके परिवेष्टन इत्यादि इन सबके मिलने
से मनुष्यों की कर्म प्रेरणा बनती है। मैंने जो विद्रोही का मार्ग ग्रहण किया था
वह भी तो केवल विचार बुद्धि ही की प्रेरणा से नहीं किया था। अपनी प्रवृत्ति के
अनुसार अभिरुचि या अभिलाषा बनती है और तब विचार बुद्धि की सहायता से
उस अभिरुचि, उस अभिलाषा का हम समर्थन करते हैं। विचार बुद्धि हमारा यन्त्र-
मात्र है। यह यन्त्र किस काम में लाया जाएगा इसका निर्णय युक्ति मार्ग से नहीं
हो सकता। अपनी-अपनी प्रवृत्ति के अनुसार हम अपने कर्तव्य का निश्चय करते
हैं। यह प्रवृत्ति कहाँ से आती है और क्योंकर आती है इसका निश्चयात्मक निर्णय
आज तक नहीं हो पाया है। यदि वातावरण के ही कारण प्रवृत्ति की उत्पत्ति होती
है तो वातावरण की सृष्टि और उसमें परिवर्तन कैसे और क्यों होता है इसका
निर्णय कौन करेगा? वातावरण के विरुद्ध आकर भी तो शक्तिशाली व्यक्तियों
ने परिस्थितियों को बदल दिया है। टॉल्सटाय के दृष्टान्त का अनुसरण करके
महात्माजी ने भारत के राजनीतिक वातावरण को बहुत कुछ बदल दिया है।
महात्माजी ने रूस के निहिलिस्ट अनारकिस्ट अथवा वोलशेविकों के दृष्टान्तों का
अनुसरण न करके टॉल्सटाय के ही दृष्टान्त का अनुसरण क्यों किया? भारत के
तथा संसार के क्रान्तिकारियों के दृष्टान्त रहते हुए भी पं० जवाहरलालजी ने
उनका अनुसरण न करके महात्माजी का ही अनुसरण क्यों किया? इसका उत्तर
कौन देगा? क्या इसके मूल में व्यक्तिगत रुचि-अभिरुचि, राग-द्वेष, परिणाम की
भावना और दुर्भावना इत्यादि के संस्कार प्रबल रूप में सक्रिय नहीं हैं? एक ही
वातावरण में रहते हुए भारत के कम्यूनिस्ट, सोशलिस्ट, गांधीवादीगण, मुस्लिम-
लीगी, हिन्दू महासभा वाले और क्रान्तिकारी कांग्रेसी तथा अन्य भारतवासी इतने
विभिन्न मार्गों पर क्यों चलना चाहते हैं। इन सब गूढ़ ऐतिहासिक प्रश्नों की
मीमांसा सहज नहीं है।
क्या मेरे भाई रवीन्द्रनाथ नहीं जानते थे कि मैंने युग युगान्तर से आचरित
सर्वमान्य विद्रोहियों के ऐतिहासिक मार्ग को ग्रहण किया था? लेकिन जिस अत्य-
न्तिक आग्रह के साथ रवीन्द्रनाथ मेरे साथ तर्क-वितर्क कर रहे थे उससे यह संदेह
होता था कि सचमुच रवीन्द्रनाथ जी मेरे रास्ते को ठीक नहीं समझ रहे थे। इस
332 / बन्दी जीवन
वाद-विवाद में ऐसा भी समय आया जब प्रश्न खड़ा हो गया कि मैं जो करने जा
रहा हूँ वह उचित है या अनुचित। रवीन्द्रनाथ के बताने पर कि मैं अनुचित मार्ग
पर जा रहा हूँ मैंने माताजी से पूछा, "क्यों माताजी क्या तुम भी ऐसा ही समझती
हो ।" माताजी ने मृदु-मृदु हँसते हुए यह कहा कि "नहीं मैं ऐसा नही समझती हूँ।
मैं यह नहीं कह सकती कि तुम गलत रास्ते पर जा रहे हो। मैं केवल इतना ही
कहना जानती हूँ कि अब मुझसे सहा नहीं जाता। आज भी मेरे सामने वह दृश्य
भयानक आतंक की सृष्टि करता है जो कि मजदूरिन ने आकर तुम्हारी पहली
गिरफ्तारी के दिन कहा था। कपड़े का खूँट तुम्हारे गले मे लिपटा है, हथकड़ी से
दोनों हाथ बँधे हुए हैं, एक वस्त्र लेकर थाने की हवालात को तुम जा रहे हो।"
यह सन् 1915 की बात थी। राजनैतिक षड्यन्त्र के मामले मे यह मेरी पहली
गिरफ्तारी थी। उस दृश्य का वर्णन करते-करते माताजी का सुन्दर मुखावयव
ऐसा गम्भीर और कोमल हो गया जैसे वर्षणोन्मुख घन-विन्यस्त बादल होते हैं।
अभी तक हमारी बातचीत में कुछ ऊष्मा थी, कुछ हास-उपहास, कुछ व्यंग्य, कुछ
छेड़-छाड़ थी। अब सबके चेहरों पर कुछ गम्भीरता आ गई। माताजी ने मेरा
नाम लेकर फिर पूछा, "क्या तुम्हें डर नहीं मालूम होता ? क्या वे कालेपानी के
दृश्य तुम्हें याद नहीं आते ?" मैंने सरलतापूर्वक कहा, "माताजी ! मुझे आज भी
वे दृश्य स्पष्ट और मर्मान्तक रूप से याद हैं, उनसे मैं विचलित भी हो जाता हूँ;
डर भी मालूम होता है। जेल का भोजन, जेल अधिकारियों के तिक्त और निष्ठुर
व्यवहार ये सब बातें स्मरण आते ही रोम खड़े हो जाते हैं। और जिस मार्ग पर
मैं चल रहा हूँ उसका अन्तिम परिणाम मेरे लिए कुछ अच्छा नहीं है यह भी सत्य
है। परन्तु यह सब जानते हुए भी मैं कर्तव्य-पथ से कैसे हट जाऊँ ? यदि भारत
को स्वाधीन होना है तो मेरे ऐसे शत-सहस्र युवकों को ऐसे निर्मम निर्यातन सहने
ही पड़ेंगे। जिस रास्ते पर मैं जा रहा हूँ केवल इसी रास्ते से ही भारत स्वाधीन
हो सकता है और दूसरा रास्ता नहीं है।"
मेरी इस बात ने और माताजी के हार्दिक व्यथापूर्ण मौन समर्थन ने विवाद
का अन्त कर दिया। माताजी की बात ने मानो हम सब भाइयों के मन को झक-
झोर डाला। वृष्टि से जो पहले ही भलीभाँति आर्द्र हो चुका हो ऐसे वृक्ष को
झकझोरने से जैसे उसके पत्तों से एकदम बूंदों की बौछार होने लगती है वैसे ही
हम चारों के नयनों से नीर की बौछार होने लगी। रोते-रोते अपूर्ण उच्चारण से
मैंने कह दिया कि मेरे निकल जाने की सब तैयारी हो चुकी है। मैं अब वृथा काल-
क्षेप न करके निकल पडूँगा। उस समय यह नहीं मालूम पड़ता था कि कौन किसे
सान्त्वना दे। घंटेभर की ऊष्मता बाष्पाकार में परिणत हो गई। अव्यक्त एवं
अवर्णनीय स्नेह ने आँसुओं का रूप ग्रहण कर लिया। मानो हम परस्पर के और
निकटवर्ती हो गए। पता नहीं मेरी तरुणी भार्या पर क्या बीत रही थी। गोद में
बच्चे को लिये हुए बेचारी सर्व क्षण एकाग्रचित्त होकर बैठी हमारी बातें सुन
रही थी। पता नहीं अपने भाग्य को कोसती थी या सराहती थी। अथवा अनिश्चित
गृह-त्याग / 333
विपद् की आशंका से भय-विह्वल हो रही थी। ज्ञात-अज्ञात, निश्चित-अनिश्चित
मार्ग पर अनन्त दिशा की ओर पुत्र-कलत्रादि को साथ लेते हुए असहाय, संपदहीन
होकर चल पड़ने का दिन आ गया। न जाने किस देश में किस स्थिति में रहना
पड़ेगा। कहावत है 'पथे नारी विवर्जिता' और मैंने दो नन्हे-नन्हे बच्चों और
तरुणी भार्या को साथ लेकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए फरार
होने का साहस किया। अज्ञात दिशा में जाना था, इसलिए मौसी की पालित
कन्या से प्रार्थना की कि थोड़े दिनों के लिए तो आप मेरे साथ हो लीजिए। घर के
सब लोगों ने इस बात को स्वीकार कर लिया। नूटू दीदी मेरे साथ चलने को
तैयार हो गईं।
पुलिस की दृष्टि से बचना था। बाल-बच्चे असबाब बिस्तरे लेकर पुलिस की
निगाह बचाकर रेलवे स्टेशन से चलना है। स्टेशन पर पुलिस की सख्त निगरानी
है। इलाहाबाद में पुलिस मुझसे ज्यादा और किसे पहचानती थी ?
मेरे भाई मेरे बच्चों को लेकर स्टेशन के लिए रवाना होने लगे। मैं उस समय
घर में था। माताजी की सहन-शक्ति अन्तिम सीमा तक आ पहुंची थी। जितना
रोती थी उससे कहीं अधिक उनकी देह दुःखावेश में हिल रही थी। ओठ कांप रहे
थे, ठोड़ी संकुचित विकुचित हो रही थी। भोहें कुंचित थी, आंसू अविराम टपक
रहे थे। द्वार तक आकर जब माताजी मेरे बच्चे को लेकर गाड़ी पर चढ़ने लगीं
तो वह बहुत रोने लगी । मेरा दो साल का बच्चा झुक-झुककर बार-बार माता
जी का मुंह देख रहा था। बुद्धदेव को महाभिनिष्क्रमण के समय ऐसा दृश्य देखना
नहीं पड़ा था।
मैं सीधा स्टेशन नहीं गया। मेरे मामाजी और भ्राताओं ने मेरे बाल-बच्चों
को गाड़ी पर सवार करा दिया। गाड़ी छूटने के समय से एक-आध मिनट पहले
किसी दूसरे रास्ते से मैं अपने बाल-बच्चों मे आकर सम्मिलित हो गया। जहाँ
तक याद है यह दिन के क़रीब दस बजे का समय था।
प्रिय जन के विच्छेद के दुःख के अतिरिक्त मेरे मन में और कोई ग्लानि नहीं
थी। फरार जीवन मेरे लिए दुस्सहनीय न था। बहुतों ने मुझसे कहा है कि फरार
जीवन की अनिश्चयता ने उन पर इतना अधिक बोझा डाला था कि उससे पिसकर
उन्होंने सेंत में पुलिस के हाथों में आत्मसमर्पण कर दिया था। मैंने कभी भी ऐसे
बोझ का अनुभव नहीं किया। जब गाड़ी पर सवार हो गया तो मैंने एक अपूर्व
स्फूर्ति का अनुभव किया। पुलिस के सब प्रयत्नों को विफल करते हुए जब उनकी
आँखों में धूल झोंक दी तो मैंने एक छोटी-सी विजय की आत्म-तुष्टि का अनुभव
किया। पाठक यह न समझें कि पुलिसवालों के साथ हम लोगों का यह निरा आँख-
मिचौनी का खेल था। पकड़े जाने पर हम लोगों को जीवन से हाथ धोना पड़ता
था। देशवासी आज भी क्रान्तिकारियों के कार्यों को खिलवाड़ समझते हैं। लेकिन
ब्रिटिश सरकार की दृष्टि से हम लोगों के कार्यों का इतना गुरुत्व था कि हम लोगों
के पीछे सरकार ने लाखों रुपए खर्च कर दिए। केवल संदेहमात्र से ही किसी
334 / बन्दी जीवन
अज्ञात कुलशील युवक का पीछा करने मे सरकार ने हज़ार रुपए खर्च कर दिए
ऐसे दृष्टान्त बहुत हैं। क्रान्तिकारियों की सबसे बडी कमी यह थी कि वे अपने
प्रयत्नों में असफल रहे, नही तो आज उनके छिद्रान्वेषीगण लज्जावन्त मुख होकर
नीरव बैठे रहते । आज भी हमारे देशवासीं स्वतन्त्रता के प्रेमी नही बने है। आज
भी उनमें वह तीव्र अभिलाषा उत्पन्न नही हुई है जिसके कारण भारत की
स्वाधीनता-प्राप्ति के लिए वे अधीर हो जाते । अस्तु, मै प्रसन्नचित्त होकर दुर्दम-
नीय अभिलाषा के साथ द्विधाहीन होकर, विप्लव कार्य मे आगे बढ चला ।
15
फिर बंगाल में
मिर्जापुर पहुँचकर मैंने चन्द्रनगर मे श्री नरेन्द्रनाथ बनर्जी के पास एक तार
भेज दिया । मेरे आने की सूचना उनको थी । केवल इतना ही वे नहीं जानते
थे कि कब और किस दिन मैं उनके पास पहुँचूँगा । यदि मैं इलाहाबाद से तार
भेजता तो संभव था कि पुलिस की दृष्ट आकर्षित हो जाती । मिर्जापुर स्टेशन
से यदि कोई पथिक तार करे तो पुलिस की दृष्टि आकर्षित होने की सबसे
कम संभावना थी। लेकिन 'जहाँ कबीर माठा का जाएँ, पडिया भेंस दोनो मर
जाएँ' मैने सोचा था कुछ, हो गया कुछ और । लोग भाग्य को मानते नही । परन्तु
यह बहुधा देखा गया है कि हजारों प्रयत्न करने पर भी किसी मनुष्य के लिए
कभी भी सरल रूप मे शुभ परिणाम नहीं निकलते । मैं उन अभागों मे से एक था
और अब भी मेरे अदृष्ट मे कुछ अन्तर हुआ है ऐसा नही मालूम पड़ता । रास्ते
मे तो कोई विपत्ति नहीं आई। लेकिन चन्द्रनगर पहुँचकर मेरी विडम्बना की
सीमा न थी । मेरा टिकट तो कलकत्ते तक का था । इसका भी कुछ रहस्य था ।
चन्द्रनगर मे हमारी गाड़ी बहुत थोड़ी देर रुकी । मेरे पास सामान यथेष्ठ था ।
चन्द्रनगर के स्टेशन पर मै बहुत उदग्रीव होकर देख रहा था कि नरेन्द्रनाथ आए
हैं या नहीं। नरेन्द्रनाथ को स्टेशन पर न देखकर मेरी उत्कण्ठा की सीमा न रही ।
परन्तु मुझे उतरना तो था ही। सहयात्रियों की सहायता से मैंने अपना सामान
उतार लिया और प्लेटफार्म पर असहाय की तरह इधर-उधर देखता और सोचता
रहा कि किसका सहारा लूं । घर-बार छोड़कर आया हूँ रहने का ठिकाना नहीं ।
नरेन्द्रनाथ जी का पता नही । इन्हीं के यहाँ ठहरने की बात थी । पहले से तय था
इन्हीं के मकान पर ठहरूँगा और सहायता के रूप मे मासिक कुछ दे दिया करूँगा ।
इनका मकान मैंने पहले से देख लिया था। कुलियों से सामान उठवा रहा था
और संदेहाकुल नयनों से इधर-उधर ताक रहा था । मन में भय था कहीं पुलिस-
वालों की दृष्टि मेरी ओर आकर्षित न हो जाय । इतने में स्टेशन से सब यात्री
चले गए थे, केवल दो-तीन व्यक्ति किसी के इन्तज़ार में प्लेटफार्म पर ठहर गए
थे, यह मेरी तरफ आए । मैं भी उनकी तरफ आगे बढ़ा । उन्होंने पूछा आप कहाँ
से आ रहे हैं, कहाँ जाएँगे । मैने उन्हें बताया कि मैं अपने एक मित्र श्री नरेन्द्रनाथ
बनर्जी के यहाँ जा रहा हूँ । उनके मुहल्ले का नाम बताया, पूछे जाने पर मैंने
336 / बन्दी जीवन
अपना नाम भी बताया। सब बातें सुनकर उन्होंने बहुत कौतुक अनुभव किया
और हँसकर बताया कि "आपका तार हम लोगों को मिला था। हमारे भी एक
आदमी का नाम शचीन्द्रनाथ है। वे भी मिर्ज़ापुर में ही रहते हैं और नरेन्द्रनाथ
भी हम लोगों में से इनका नाम है। चन्दनगर में एक ही मुहल्ले में दो नरेन्द्रनाथ
हैं। हम लोग समझ रहे थे कि हमारे आत्मीय शचीन्द्रनाथ आ रहे हैं। इसीलिए
स्टेशन पर आये थे। आपके मित्र को तो पता भी नहीं कि आप आ रहे हैं। अच्छा
हम अभी जाते हैं और उन्हें सूचित करते हैं कि आप आ गए हैं। आप लोग गाड़ी
पर आइए हम लोग सायकिल से चलते हैं।" कुछ तसल्ली हुई। आशा का उदय
हुआ। फिर हिम्मत बाँधी। नरेन्द्रनाथ का मुहल्ला बहुत दूर था। करीब घंटे-
भर चलने के बाद रास्ते में देखता हूँ कि नरेन्द्रनाथ अपने मकान से काफ़ी दूर पर
रास्ते में हम लोगों का इन्तजार कर रहे थे। हमें देखकर उन्हें कुछ प्रसन्नता नहीं
हुई। मैं मन-ही मन विचलित हो उठा। मेरा भय सच्चा साबित हुआ। अत्यन्त
घबड़ाहट के साथ नरेन्द्रनाथ जी ने कहा कि "आप लोगों का मेरे मकान मे रहना
संभव नहीं है। ब्रिटिश सरकार के एजेण्टों ने चन्दनगर के अधिकारी पुरुषों से कुछ
समझौता कर लिया है। अब फरार व्यक्ति का चन्दनगर में रहना आसान नहीं
है। बाहर से किसी आगन्तुक के आने पर हमें पुलिस को इत्तला देनी पड़ेगी।
ऐसी अवस्था में मेरे घरवाले आपको अपने यहाँ ठहराने के लिए प्रस्तुत नहीं है।"
मेग मुंह सूख गया। मुझमें इतना भी साहस बाकी नही रह गया कि मैं अपने स्त्री
और बच्चों की तरफ देखूं। तथापि अपने मन की व्यथा और विक्षोभ को मैंने
नहीं व्यक्त होने दिया। मैंने अपने मित्र से कुछ अनुनय विनय की और कहा कि
कम-से-कम दो-चार दिन तो ठहरने की व्यवस्था कर दो। उनके भय विह्वल
हृदय ने मेरी एक न मानी। मेरे पाम अधिक देर तक ठहरना भी उनके लिए दुःसह
हो गया। उनकी इस मानसिक स्थिति और आचरण को देखकर मेरे मन में
अत्यन्त क्रोध, घृणा एवं वितृष्णा की उत्पत्ति हुई। नरेन्द्रनाथ की तरफ लौटकर
देखने को दिल नहीं चाहा। गाड़ी वाले से कह दिया लोटो। अब किधर जाता।
मेरी पत्नी मुझ पर अत्यन्त अप्रसन्न हो गईं और कहने लगी, "इन्हीं आदमियों के
सहारे तुम इतना बड़ा काम करने जा रहे हो?" मैं इसका क्या उत्तर देता ! मैं
उनके चेहरे को एकाग्र दृष्टि से देख रहा था और अनुमान कर रहा था कि उनके
क्रोध और अप्रसन्नता की सीमा कहाँ तक पहुँची है। एक अपराधी व्यक्ति की
नाईं अपनी स्त्री की तरफ देखते हुए मैंने कहा, "कोई परवाह नहीं है अभी दूसरा
बन्दोबस्त हुआ जाता है।" मुंह से तो कह दिया लेकिन मन में डरता रहा। सन्
1914 के क्रान्तिकारीगण चन्दनगर में उपस्थित थे। पुलिस की दृष्टि से बचने के
लिए उन लोगों के यहाँ मैं नहीं गया था। चन्दनगर की राजनीतिक स्थिति से
मैं सुपरिचित था। नरेन्द्रनाथ जी ने मुझे कोई नई बात नहीं बताई थी। उनके
यह मेरे रहने के प्रस्ताव स्वीकार करने के पहले ही उन्हें सब बातें सोच लेनी
उचित थीं। इस प्रकार अकस्मात् मुझे विपत्ति के सागर में डाल देना उनका
फिर बंगाल में / 337
कितना बड़ा अपराध था पाठकगण स्वयं सोच सकते हैं।
नरेन्द्र के मुहल्ले से मेरे पुराने क्रान्तिकारी साथियों का मुहल्ला बहुत दूर
था। स्टेशन से नरेन्द्रनाथ के पास आने में घंटाभर लग गया था। अब फिर दूसरे
मुहल्ले जाने में एक घंटा लगा। साथ मे तीन महीने की एक शिशु कन्या और दो
साल का एक शिशु बालक भूख से व्याकुल हो रहे थे। पास दूध नही था। माता
के पयोधर से शिशु कन्या का निर्वाह हो चुका था। केवल दो-साल का बालक
क्षुधा से व्याकुल होकर अविरत रो रहा था। मेरी स्त्री ने फिर कहा, "तुम्हारे
काम में साथिन होने से और कोई आपत्ति थोड़े ही है, इन बच्चो के मुंह की तरफ
देखकर मुझसे सहा नही जाता। देखो अब इन बच्चो को क्या दूं, दो घंटे हो गए
अभी ठहरने का ठिकाना नही। तुम्हारे ऐसे साथी हैं कि तुम्हारे बाल-बच्चो को
सकट मे डालने मे उन्हे तनिक भी सकोच नही होता। ऐसे-ऐसे साथियो को लेकर
तुम काम करने चले हो। तुम्हे तजुर्वा तो कुछ है नही। हम लोगो को साथ
घसीटकर जाने कहां ले चले हो।" एक ओर ब्रिटिश सरकार से दुर्भावना की सीमा
नही है, दूमरी ओर नरेन्द्रनाथ जैसे साथियो के विश्वासघात से पीडित हो रहे है,
तिस पर अपनी प्रिया के मुख से यह सब अति मधुर वचन सुनकर मेरी अन्त-
रात्मा पर क्या बीत रही होगी पाठकगण इसका अनुमान कर सकते है। कितना
धैर्य, आत्मविश्वास, आदर्श निष्ठा, कितना अदम्य उत्साह एव आशावादी होने से
इतनी प्रतिकूलता के होते हुए भी क्रान्तिकारी अपना काम कर सकते है इसका
अनुमान पाठकगण स्वयं कर लेगे।
मै एक बडे पुराने लोक प्रसिद्ध क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस के एक आत्मीय
श्री श्रीशचन्द्र घोष के मकान को चलने लगा। रास्ते मे बच्चा बहुत रो रहा
था। और कोई उपाय न देखकर माताजी के दिए रसगुल्ले लडके को खाने को
दिए। क्षुधा की यन्त्रण से बालक के मुंह से इस समय एक या दो शब्द निकलते
थे 'दूध दाओ', बगला मे 'दो' को 'दाओ' कहते हैं। जीवन मे सर्वप्रथम मेरे बालक
ने इन्ही दो शब्दो का उच्चारण किया था। बेचारे के मुंह से 'दूध दाओ,' 'दूध
दाओ' के शब्द सुनकर अन्त मे हम लोगो ने उसे खाने को रसगुल्ले दिए। पूरा
रसगुल्ला खा जाने मे उसे कुछ भी समय न लगा। हमे डर था कि रसगुल्ला खाने
से कही बच्चे के पेट मे फोडा न हो जाए। एक रसगुल्ला और थोडा-सा रस खा-
पीकर बच्चा कुछ शान्त हुआ। हम लोगों को भी थोडी देर के लिए तसल्ली हो
गई। श्रीश बाबू को देखकर और भी तसल्ली हुई। बडी प्रसन्नता एव उत्सुकता
के साथ उन्होने मेरा स्वागत किया। मरुभूमि के बीच जलाशय को देखकर जैसे
पथिक सुखी होता है वैसे ही श्रीश बाबू को देखकर मुझे बेहद खुशी हुई।
बाबू श्रीशचन्द्र घोष के बारे मे दो-चार बाते यहाँ कह देना उचित होगा।
भारतवर्ष मे सबसे पहला जो बम षड्यन्त्र केस हुआ था जिसमे सर्वश्री अरविन्द
घोष, वारीन्द्रकुमार घोष, उपेन्द्रनाथ बनर्जी, हेमचन्द्रदास इत्यादि पकड़े गए थे
और भारत के इतिहास मे जिसने अलीपुर बम षड्यन्त्र केस के नाम से प्रसिद्धि
338 / बन्दी जीवन
लाभ की है बाबू श्रीशचन्द्र घोष इसी से सम्बन्धित दल के बचे-बचाए क्रान्तिकारी
थे। अलीपुर बम षड्यन्त्र केस सन् 1908 मे चला था। इसके बाद श्री मोतीलाल
राय और श्री श्रीशचन्द्र घोष ने इस दल के काम को जारी रक्खा था। श्री रास-
बिहारी बोस, जो आजकल जापान मे बस गए है और भारत में आने से जिन्हें
आज भी फांसी के तख्ते पर लटकना पडेगा, श्री श्रीशचन्द्र घोष के आत्मीय हैं,
गत महायुद्ध के समय श्रीश बाबू को लगातार कई वर्षों तक जेल में नजरबन्द
रहना पड़ा था। लडाई के अन्त मे जब दूसरे सब नजरबन्द छोड़ दिये गए थे
उसी अवसर पर श्रीश बाबू ने भी मुक्ति पाई थी। मुक्ति पाने के पहले श्रीश
बाबू ने पुलिस वालों की कुछ शर्तों को स्वीकार कर लिया था। श्रीश बाबू ने यह
स्वीकार कर लिया था कि भविष्य मे वे फिर किसी क्रान्तिकारी आन्दोलन मे
भाग नही लेंगे।
अण्डमन से लौटने के बाद श्रीश बाबू से मेरी बातचीत हो चुकी थी इसका
उल्लेख मै पहले ही कर चुका हूँ। मेरे मन में यह डर था कि शायद मुझे सहायता
देने मे उन्हें कुछ हिचकिचाहट हो। लेकिन फरार हालत मे चन्द्रनगर मे भेट होने
पर मुझे सहायता देने मे वे सहर्ष आगे बढे।
श्रीश बाबू अविवाहित थे। परन्तु उनके घर मे उनकी भावज, उनकी मौसी
इत्यादि स्त्रियाँ थी। अपने बाल-बच्चो को साथ लेकर मैं फरार हुआ था, यह
देखकर श्रीश बाबू घबडाए नही। बडी प्रसन्नता एव संयमपूर्ण आवेश के साथ
मेरे बाल-बच्चो को उन्होने स्त्रियों के पास भिजवा दिया। दरिया मे तैरते-तैरते
जब थके हुए मनुष्य का पैर किसी ठोस वस्तु को स्पर्श करता है उस समय उसकी
जो अनुभूति होती है अपने बाल-बच्चो को श्रीश बाबू के घर की स्त्रियो के पास
भेजकर मुझे भी वैसी ही तसल्ली हुई। बच्चो को दूध और मुझे साँस लेने का
समय मिला।
चन्द्रनगर कहने के लिए फ्रांसीसी है परन्तु यहाँ के गवर्नर को ब्रिटिश सरकार
अपने वश मे रखती है। तथापि क्रान्तिकारियों के लिए यहाँ कुछ सुविधा अवश्य
मिल जाती है। ब्रिटिश पुलिस सीधे आकर यहाँ पर धरपकड नही कर सकती।
फ्रांसीसी पुलिस की सहायता लिए बिना वह कुछ नहीं कर सकती। ब्रिटिश सर-
कार के गुप्तचर चन्द्रनगर में भी धड़ल्ले से घूमते हैं लेकिन किसी को गिरफ्तार
करने के लिए उन्हें फ्रांसीसी कोतवाली में जाना पड़ता है। इतने में क्रान्ति-
कारियों को अवसर मिल जाता है। ब्रिटिश सरकार के दबाव से चन्द्रनगर में भी
ये नियम बन गए हैं कि किसी भी परिवार में आगन्तुक के आने पर उन्हें थाने पर
सूचना देनी पड़ेगी। इसी प्रकार मकानदारों को भी नवागत के बारे में पुलिस
को सूचित करना पडेगा। ये सब बातें मुझे मालूम थीं। श्रीश बाबू ने मुझसे ये
सब बातें दोहराईं। अभी तक ब्रिटिश सरकार की तरफ से मुझ पर कोई अभियोग
नहीं लगा था। इसलिए सब बातें सोचकर मैंने निश्चय किया कि पुलिस को यदि
सूचना मिल भी जाय तो कोई हानि नहीं। मैं चन्द्रनगर में ही रहूँगा। पुलिस को
फिर बंगाल में / 339'
पता मिलने पर मेरे लिए चन्द्रनगर के बाहर जाना प्रायः असम्भव हो जाएगा
यह मैं जानता था, तथापि यह तो था कि एक भौगोलिक सीमा के अन्दर तो मैं
निरापद एवं निश्चित रूप से रह सकता हूँ। श्रीश बाबू के साथ मकान ढूंढ़ने के
लिए निकल पड़े। पहले एक होटल मे गए। इस होटल की मालकिन एक ऐंग्लो
इण्डियन बुड्ढी थी। उस स्थान का वातावरण और होटल का चार्ज सुनकर वहाँ
रहना उचित न समझा। उस स्थान का दृश्य तो मनोहर था। होटल के सामने
से एक चौड़ा रास्ता गंगाजी के किनारे-किनारे निकल गया था। फ्रांसीसियों ने
चन्द्रनगर एवं पाण्डीचेरी मे समुद्र एवं नदी के किनारे बड़े सुदृश्य और चौड़े
रास्ते बनाए थे। ऐसे दृश्य भारत के अन्य स्थानों मे विरले हैं। गंगा एवं समुद्र
के तटस्थल की भूमि पर ईंट की पक्की दीवारें खड़ी कर दी गई हैं एवं उनके
ऊपर से रास्ते निकाले गए हैं पानी मे जाने के लिए जगह-जगह सीढ़ियाँ निकाली
गई है। काशीजी मे भी गंगा का किनारा बहुत सुदृश्य है लेकिन पता नहीं क्यों
वहाँ इतनी अव्यवस्था है। किसी सुनिश्चित प्रणाली के अनुसार वहाँ पर न मकान
बनाये गए हैं और न कोई सड़क ही निकाली गई है। वहाँ की सीढ़ियो की दुर्दशा
की भी आज सीमा नहीं है। काशीजी के गंगा तट-सा सुन्दर स्थान सम्भव है।
भारतवर्ष में कोई दूसरा न हो तथापि ऐसे सौन्दर्य के निकेतन को भी आज अव-
हेलना की तुच्छता ने अशोभनीय बना रक्खा है।
उपर्युक्त होटल मे शनीचर और इतवार को कलकत्ता से शौकीन एवं धनी
व्यक्तियो का आगमन होता है। सुरादेवी की आराधना यहाँ पर खूब आसानी से
एवं आडम्बर के साथ होती है कारण यह कि दक्षिणा यहाँ पर कलकत्ता से बहुत
कम देनी पड़ती है। परिवार सहित ऐसे स्थान पर रहना कैसे संभव हो सकता
था। जब हम लोगों ने होटल की मालकिन से कहा कि कल-परसों तक अपना
निश्चय बता देंगे तो मालकिन ने आग्रह किया कि जब आप लोग होटल मे पधारे
हैं तो कुछ दक्षिणा तो अवश्य चढ़ानी पड़ेगी कुछ नही तो एक-एक गिलास
लेमनेड तो अवश्य ही पी लीजिए। लज्जावश एक बोतल लेमनेड तो पीना ही
पड़ा लेकिन जब बिल देखा तो प्राण सूख गए, आँखें उलट गईं। एक बोतल पानी
का दाम आठ आने लगाये गए थे। क्या करता देना ही पड़ा। जिस स्थान पर
क़दम रखते ही यूं आठ आने देने पड़े उस स्थान को मैंने फिर लौटकर न देखा।
भोजन-स्नान आदि के बाद मकान की तलाश मे फिर निकले। चन्द्रनगर
नितान्त छोटी जगह नहीं है। दूर-दूर तक पहुँचे, मकानात भी मिले, लेकिन
पसन्द न आए। विभिन्न स्थानों को देखकर पहले का भय और दृढ़ हो गया
कि इस स्थान पर रहने से मलेरिया से हम लोगों को जर्जरित होना पड़ेगा।
श्री श्रीश बाबू के यहाँ रहना उचित नही समझा और उनके यहाँ स्थान भी न
था। चित्त व्याकुल हो उठा क्या करें और क्या न करें कुछ ठीक न कर पाए।
चन्द्रनगर के पास एक छोटी-सी लेकिन मशहूर जगह श्रीरामपुर के नाम से
प्रसिद्ध है। यहाँ पर बंगाल के कुछ बड़े-बड़े ज़मींदार बसे हैं। मेरे मामा की