बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
पृष्ठ 332, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ें330 / बन्दी जीवन
सकती है। हिन्दू समाज में माता-पुत्र के सम्बन्ध पाश्चात्य समाज से अधिक घनिष्ठ
हैं। पाश्चात्य समाज में विवाह के बाद लड़का अलग रहने लगता है। हिन्दू समाज
में पिता, माता, भाई, भगिनी, पत्नी और सन्तान एक साथ ही मिलकर रहते हैं
और इस प्रकार से जो परिवार बनता है हिन्दू समाज में वही इकाई का स्थान
ग्रहण करता है। हिन्दू समाज में पुरुष और स्त्री के लिए अलग-अलग रूप से उनके
स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया गया है। इस स्थान पर समाज विज्ञान
की चर्चा करने की न तो इच्छा ही है, और न स्थान ही। अतीत काल की एक
मधुमय स्मृति का उल्लेख करते समय जो बातें अनिवार्य रूप से उमड़ पड़ीं उन्हें
व्यक्त किए बिना मैं रह नहीं सका। इस बात के लिए पाठकगण मुझे क्षमा करेंगे।
सन् 1924 के फरवरी माह में प्रयाग में कुम्भ का मेला लगा हुआ था। मैं जून
महीने में इलाहाबाद से फरार हुआ था। इस समय मेरे मकान में मेरे सब निकट
आत्मीय उपस्थित थे। मेरे मामा थे, मेरी मौसी, मौसी की एक पालित कन्या, मेरे
तीनों भाई, मेरे मंझले भाई की पत्नी तथा मेरी पत्नी। कालेज में छुट्टी रहने के
कारण मेरे मंझले भाई श्री रवीन्द्रनाथ सपरिवार इलाहाबाद आये हुए थे। जब
हम सब भाई एकत्र होते थे तो पहला सप्ताह घोर वाद-विवाद में व्यतीत होता
था। भोजन के लिए माताजी चिल्लाया करती थी और हम वाद-विवाद में मग्न
रहते थे। सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं की मीमांसा किए बिना खाने
कौन जाय। मेरे मंझले भाई रवीन्द्रनाथ मामाजिक विषयों में घोर परिवर्त्तन् के
पक्षपाती थे और मैं प्राचीन प्रथाओं का समर्थक था। रवीन्द्रनाथ चाहते थे कि
पुरुष और स्त्रियों के अबाध मिलन में कोई बाधा न रहे। मैं ऐसे अबाध मिलन
का घोर विरोधी था और अब भी हूँ। रवीन्द्रनाथ पुरुष-स्त्री के एक साथ शिक्षा
पाने के पक्ष में थे और मैं इसे कभी भी पसन्द नहीं करता। परन्तु मजे की बात
यह थी कि राजनीतिक क्षेत्र में मैं घोर विप्लव का पक्षपाती था और रवीन्द्रनाथ
सुधार के। ऐसी दशा में आपस में घोर द्वन्द्व क्यों न हो ? एक सप्ताह के घोर द्वन्द्व
के बाद हम एक-दूसरे की उपेक्षा करने लगते, समझ लेते थे कि इसके आगे बढ़ने
से वाद-विवाद आरम्भ हो जाएगा। लेकिन दूसरे वर्ष जब हम लोग फिर मिलते
तो वाद-विवाद पुनः आरम्भ हो जाता और एक सप्ताह के पूर्व शान्ति स्थापित
नहीं होती थी। वाद-विवाद के समय पड़ोस के आदमी समझते थे कि हम आपस
में लड़ रहे हैं।
रवीन्द्रनाथ जानते थे कि मैं निषिद्ध मार्ग पर, संकटपूर्ण रास्ते से, राजनीतिक
क्षेत्र में अग्रसर हो रहा था। एक दिन रवीन्द्रनाथ से फिर वही पुरानी बहस शुरू
हो गई। एक बड़े कमरे में हम पांच व्यक्ति उपस्थित थे। रवीन्द्रनाथ को छोड़कर
मेरे मामा और मेरी माताजी भी बहस में भाग ले रही थी। मेरी पत्नी कुछ दूरी
पर बैठी हुई हम लोगों की बातें बड़े ध्यान से सुन रही थी। जैसा हुआ करता है
बातचीत यों ही शुरू हुई और धीरे-धीरे उसने गम्भीर रूप धारण कर लिया।
मेरी माताजी एक पढ़ी-लिखी और समझदार स्त्री थीं। राजनीतिक और सामाजिक