बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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कि योगेशबाबू ने मुझसे कुछ भी छिपाया हो या हमारे दल में किसी प्रकार के भेद-
भाव की सृष्टि की हो। लेकिन उनके बनारस के अनुयायीगणों ने स्वर्गीय राजेन्द्र-
नाथ से सरल एवं उचित व्यवहार नहीं किया। इसका पता मुझे बहुत बाद को
चला था। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब तक हम दोनों गिरफ्तार नहीं हुए थे
हम लोग एक-दूसरे पर पूर्णतया निर्भर रहते थे। यह भी सत्य है कि आये दिन के
कार्यक्रम से योगेशबाबू को यह प्रतीत हो रहा था कि उत्तर भारत में हमारा कार्य-
क्रम बंगाल के कार्यक्रम से अधिक उपयोगी एवं अधिक फलप्रसू था। इतिहास के
पृष्ठों में यह बात आज प्रमाणित भी हो चुकी है कि क्रान्तिकारी आन्दोलन के
सम्पर्क में उत्तर भारत के दल की जितनी देन है उसकी तुलना में बंगाल की
अनुशीलन समिति की कुछ भी नहीं है। उत्तर भारत के कार्यक्रम से योगेशबाबू
इतने प्रभावित हुए थे कि वे बंगाल में जाकर अपने उद्योग से अर्थसंग्रह करके
युक्त प्रान्त में लाते थे। जहाँ तक मुझे स्मरण है बंगाल के नेताओं को इसका पता
न था। यदि पता होता तो वे भी अवश्य इसके हिस्सेदार बन जाते। योगेशबाबू
के आचरण से मैं कभी यह सन्देह नहीं कर पाया कि वे मुझे किसी अन्य दल का
नेता समझते थे और अपने को किसी दूसरे दल का अनुयायी। बात तो यह थी कि
बंगाल में भी अनुशीलन समिति के नेतागण सदा यही बताते थे कि सान्याल भी
अपने ही दल का आदमी है। उत्तर भारत के कार्यक्रम की बहुत-सी बातें मैं योगेश-
बाबू को बता दिया करता था जो कि मैंने बंगाल के नेताओं को नहीं बताई
थीं। इसका एक कारण था कि मैं योगेशबाबू से दिन-रात काम ले रहा था इस-
लिए उन्हें बहुत-सी बातों का बताना आवश्यक हो जाता था। दूसरा कारण यह
था कि बंगाल के नेताओं के साथ मिलने का अवसर मुझे कम प्राप्त होता था।
तीसरी बात यह थी कि हम लोगों में एक प्रतियोगिता की भावना रहती थी। चौथी
बात यह थी कि अनुशीलन के नेतागण अपनी सब बातें मुझे नहीं बताते थे। लेकिन
धीरे-धीरे हम एक-दूसरे को समझने लगे थे और क्रमशः हम लोगों में सहयोग
की भावना प्रबल हो रही थी।
मैं चाहता था कि पंजाब-शाखा की सहायता से काश्मीर और काबुल के
रास्ते से हम रूस और पश्चिम यूरोप तक पहुँचें, इन रास्तों से अस्त्र आदि के
मँगाने की व्यवस्था करें और विदेशस्थ भारतीय विप्लववादियों के साथ इन्ही
रास्तों से अपना योगसूत्र स्थापित करें। इस विषय की कोई बात न मैंने योगेश-
बाबू को बतलाई और न बंगाल के नेताओं को। इसी प्रकार युक्तप्रान्त के कार्य-
क्रम के बारे में भी सब बातें मैंने बंगाल के नेताओं को नहीं बताई थीं। आज
भी वे कार्यक्रम अपूर्ण रह गए हैं। इसलिए इन सब बातों का उल्लेख करना आज
उचित न होगा। इस स्थान पर तो मैं केवल इतना ही बताना चाहता हूँ कि उन
पिछले दिनों में योगेशबाबू के साथ मेरा क्या सम्बन्ध था।
मैं यह पहले ही बता चुका हूँ कि दिल्ली से लौटने के बाद मैं कानपुर गया।
कानपुर में पहला बोलशेविक कान्सप्रेसी (षड्यन्त्र) केस चल रहा था। इस