सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 326, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 326

14
गृह-त्याग
अण्डमन से लौटने के बाद मैने विवाह कर लिया था। यथा-रीति फरारहोने
के पहले मेरे दो संतानें हो चुकी थी । मेरे मामने यह विकट प्रश्न था कि मै अपनी
स्त्री और इन दो बच्चों को किसके पास छोड़कर फरार होऊँ । हम चार भाई थे
ओर मैं ही सबसे बड़ा था । मेरे दूसरे भाई भी ब्याह कर चुके थे ओर गोरखपुर
में सेण्टऐण्ड्र ूज कालेज में अध्यापक का काम कर रहे थे । बनारस षड्यन्त्र केस
के मामले में ये भी मेरे साथ गिरफ्तार हुए थे । न्यायालय से मुक्त होने पर भी
इन्हें गोरखपुर मे नज़रबन्द रक्खा गया था । मेरे तीसरे भाई ने उम समय तक
शादी नही की थी । वह इण्डियन प्रेस में काम कर रहे थे । मेरी माता उम समय
जीवित थी । मेरी मौसी भी माताजी के पाम रहती थी । मेरे सर्व कनिष्ठ भ्राता
कालेज में पढ़ रहे थे । मेरे मंझने भाई जो प्रोफेमर थे मुझसे अत्यन्त असंतुष्ट
थे । वे बिलकुल भी नही चाहते थे कि मैं राजनैतिक उलझनों में व्यर्थ के लिए
फँसा रहूँ, और फिर मेरी राजनीति भी साधारण राजनीति न थी । बुद्धिमान
व्यक्ति ऐसी राजनीति मे फँसा नही करते थे। मेरे मंझले भाई श्री रवीन्द्रनाथ
संत क्रोध के साथ कहा करते थे कि "तुम्हारी वजह से मेरी भी नौकरी जायगी ।
तुम मानते नही हो । क्या हम लोगों की कोई ज़मींदारी है ? आज हमारी और
जितेन्द्र की नौकरी चली जाय तो कल मकान का किराया भी न दे मकेंगे । तुम
तो अपनी धुन में मस्त हो । शादी कर ली, बाल-बच्चे हो चुके है । तुम्हें तनिक
भी परवाह नही है कि इन सबका क्या होगा । समय-समय पर माताजी भी मेरे
ऊपर बहुत नाराज होती थी । माताजी का भी अधिक दोष न था, बेचारी तीस-
बत्तीस वर्ष की अवस्था में ही विधवा हो गई थी । सांसारिक सुख शान्ति उन्हें
कुछ भी न मिली थी । अपनी बाईस वर्ष की अवस्था में मुझे कालेपानी जाना पड़ा
था। लौट आने के बाद भी मैंने साधारण गृहस्थ जीवन व्यतीत करना नही चाहा।
माताजी ने आशा की थी कि शादी कर लेने से मैं गृहस्थ बन जाऊँगा । माताजी
की यह आशा भी पूरी नही हुई । आशा-भंग की पीड़ा से एवं भविष्य की आशंका
से मेरी माता सदा दु खी रहती थी। एक दिन की बात हो, दो दिन की बात हो, तीन
दिन की बात हो, तो निबाह भी लें । लेकिन बारहौं माह, तीसों दिन इम पारिवारिक
अशान्ति के बीच जीवन व्यतीत करना कितना दुःखदायी है भुक्तभोगी को छोड़

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित) · पृष्ठ 326, कुल 408 में से · SarvaKosh