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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 331, कुल 408 में से

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पृष्ठ 331

गृह-त्याग / 329
पिता की वरन् अपनी सहधर्मिणी और दूसरे आत्मीय जनों तथा प्रतिवेशियों से
भी अनुमति लेने की आवश्यकता है। इस पर मैंने महात्माजी से कहा कि "जिस
दिन सर्वप्रथम मुझे अपनी पत्नी से बातचीत करने का अवसर प्राप्त हुआ था,
मैने उसी दिन अपनी सहधर्मिणी से अपना अभीष्ट कार्य करने की अनुमति ले ली
थी। मैं आज भी इस बात के लिए प्रस्तुत हूँ कि यदि मेरी पत्नी मेरे अभीष्ट कार्य
के लिए मुझे अनुमति नहीं देती है तो मैं उस काम को नहीं करूँगा। आप भी
पूछ सकते हैं।" स्वामीजी ने मेरी पत्नी से पूछा, "क्यो बेटी, तुम अपने पति को
इस काम के लिए अनुमति देती हो !" उस बेचारी तरुणी ने कम्पायमान देहा-
वयव के इंगित से विकसित कुसुम की नाईं हँसते हुए मुख को हिलाकर अपनी अनु-
मति प्रकट की लेकिन नयन पल्लवों के द्रुत संचालन के साथ आँखों से दो-चार
आँसुओं की बूंदें टपक ही पड़ीं। बालव्रह्मचारी परमहंस परिव्राजक संन्यासी भी
एक बार विचलित हो गए और बार-बार सिर हिलाकर हँसते हुए मुझसे कहने
लगे, "नही बेटा ! यह लड़की अभी बहुत छोटी है। रोते हुए जो अनुमति इसने
दी है यह स्वीकार्य नहीं है।" मैंने कहा कि मैं फिर पूछ लूंगा और यह वचन देता
हूँ कि यदि इसने यथार्थ में अनुमति नहीं दी तो मैं इस काम को नहीं करूँगा।"
अतीत काल की ये सब बातें लिखते हुए आज भी मेरा हृदय हर्ष, अभिमान
और गुमान से भर आता है। आज भी हमारे देश में ऐसे साधु-सन्त हैं जिन्हें मेरे
ऐसे विद्रोही के अग्निमय कर्म-पथ से आन्तरिक प्रीति है। और हम अपनी सामा-
जिक व्यवस्था की निगूढ बातों के प्रति ध्यान देने से आज भी फूले नहीं समाते।
कर्तव्य कर्म चाहे कितना ही संकटपूर्ण और अग्निगर्भ क्यों न हो हमारे समाज के
शीर्षस्थानीय संन्यासी आज भी उससे विचलित नही होते और मेरे ऐसे विद्रोहियों
के कठोर कार्यों का वे हृदय से समर्थन करते थे। फिर पत्नी का स्थान हमारे
समाज में कितना ऊँचा है। पत्नी की अनुमति बिना कोई काम करना उचित नहीं
है। पत्नी हमारे भोग की सामग्री नहीं है सहधर्मिणी है, सहधर्मिणी को छोड़कर
हिन्दू समाज में, आर्य संस्कृति में, मनुष्य अपूर्ण रह जाता है। पत्नी को पाकर ही
समाज में मनुष्य स्वधर्मानुष्ठान के अधिकार को प्राप्त करता है अन्यथा नहीं।
हिन्दू समाज में पत्नी को छोड़कर कोई शुभ कार्य सम्पन्न नहीं हो सकता। जिस
समाज में बिना पत्नी की अनुमति पति को संन्यास लेने का भी अधिकार नहीं उस
समाज में स्त्री का स्थान कितना ऊँचा होना आवश्यक है इसे आज हम भूल रहे
हैं। आज पाश्चात्य समाज में स्त्री-अधिकार के प्रश्न पर कितना शोरगुल मचा
हुआ है मानो स्त्री के अधिकार पुरुष से एवं पुरुष के अधिकार स्त्री से स्वतन्त्र हैं।
हमारे सामाजिक आदर्श में पुरुष और स्त्री के मिलने से ही पति-पत्नी के रूप में
एक परिवार के रूप में एक परिपूर्ण स्वतन्त्र अस्तित्व बनता है। इसीलिए हमारे
समाज में पुरुष और स्त्री के अधिकार अलग-अलग नहीं होते। कामरेड शब्द से
भी सहधर्मिणी शब्द अधिक व्यापक एवं अर्थगर्भित है। सहधर्मिणी शब्द के अनुसार
बुरे कार्य में स्त्री पति की साथिन नहीं हो सकती, कामरेड शब्द के अनुसार हो