बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति के समस्त साधन मुझे खोज निकालने में लगे हों
दूसरी तरफ में संकटपूर्ण क्रान्तिकारी कार्य में लगा रहूँ तो परिस्थिति कुछ और
ही हो जाती है ।
इन सब कारणों से मेरे लिए यह आवश्यक था कि बाल-बच्चों को लेकर
फरार होने से पहले मैं अपने रहने का स्थान एवं आवश्यकतानुसार सहायता पाने
की सब व्यवस्था कर लेता । इसके लिए मैंने बंगाल में जाकर सब प्रकार की विधि-
व्यवस्था का आयोजन किया । मैंने सोचा कि यदि कलकत्ता के पास फ्रांसीसी राज्य
के अन्तर्गत चन्द्रनगर में बस जाता हूँ तो संभव है मेरे लिए कुछ सहूलियत हो
जाय । चन्द्रनगर के एक कार्यकर्त्ता से मैंने बातचीत कर ली ये सज्जन अनुशीलन
समिति के नही थे । आप बंगाल के एक साप्ताहिक पत्र 'आत्मशक्ति' के दफ्तर मे
काम करते थे । क्रान्तिकारी आन्दोलन के साथ भी इनका सम्पर्क था । यह तो सभी
को मालूम है कि बंगाल में विभिन्न दल क्रान्तिकारी आन्दोलन में काम करते थे ।
इन सभी विभिन्न दलों को एकत्रित करने के लिए मैंने बहुत प्रयत्न किए थे । इसी
सिलसिले में इन सज्जन से मेरा परिचय हुआ । इनका नाम था श्री नरेन्द्रनाथ
बनर्जी । इन्होंने बड़े उत्साह के साथ मेरे चन्द्रनगर में रहने के प्रस्ताव का समर्थन
किया । और अपने मकान में रहने के लिए मुझसे विशेष आग्रह किया था । इधर
माताजी से मैंने कहा कि पिताजी के छोड़े हुए धन से मुझे एक या दो हजार रुपया
दे दें ताकि कुछ दिनों के लिए मैं निश्चिन्त हो जाऊँ । माताजी ने कहा कि यह
रुपये लेकर तुम बरबाद कर दोगे मैं तुम्हें माहवार कुछ देती रहूँगी । मैने इस
प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और कहा कि उन्हें मुझको कम-से-कम पच्चीस
रुपया प्रति मास भेजना पड़ेगा । माताजी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया ।
लेकिन केवल पच्चीस रुपये में बाल-बच्चों को साथ लेकर फरार हालत मे रहना
बहुत कठिन बात थी । और क्रान्तिकारी दल की आर्थिक सहायता पर पूर्ण रूप से
निर्भर करना भी बहुत कठिन बात थी । ऐसी अनिश्चयात्मक स्थिति में मैं अपने
परिवार को लेकर अथाह समुद्र में कूद पड़ा ।
मैं अच्छी तरह जानता था कि आज हो, या कल हो मुझे घरबार छोड़ना ही
पड़ेगा । फरार होने का अर्थ होता है आत्मीयजनों से एक अनिर्दिष्ट समय के लिए
विच्छिन्न हो जाना एवं अन्ततः पुलिस के पंजे में पड़कर न जाने किस अनजान
पातालपुरी में जाकर खो जाना । इस आसन्न विच्छेद की भावना से मैं दिन-प्रति-
दिन अधिक से अधिक विचलित होता गया । हम सब भाइयों में अत्यन्त प्रीति का
सम्बन्ध था । मुझे स्मरण है जब मैं लगभग चार या पाँच वर्ष का था तो मेरे मंझले
भाई के गाल में एक फोड़ा हुआ था जिसके चीरे जाने की बात सुनकर मैं एकदम
चंचल हो उठा था और अपने माता-पिता से मैंने कहा था कि मैं इसे कभी नहीं
चीरने दूँगा । मुझे यह भी स्मरण है कि मेरी माता ने मुझे यह कहकर बहुत सम-
झाया कि तुम्हारे एक और भाई कलकत्ता में पढ़ते हैं जिन्हें चीर-फाड़ का काम
करना पड़ता है यह तो एक साधारण बात है इसके लिए तुम्हें इतना व्याकुल होने