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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 333, कुल 408 में से

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पृष्ठ 333

गृह-त्याग / 331

बातों में भी उनके विचार बहुत स्वच्छ एवं निर्भीक थे। माताजी से स्नेहावरण के
कारण सत्यता नहीं छिपती थी। रवीन्द्रनाथ ने यद्यपि इतिहास में एम० ए० पास
किया था तथापि राजनीतिक मामलों में उनके विचार माताजी की नाईं स्वच्छ
एवं निष्पक्ष नहीं थे। रवीन्द्रनाथ स्नेहावेश में आकर सत्य की मर्यादा का उल्लंघन
करते थे। मेरे मामाजी भी परम स्नेहवश रवीन्द्रनाथ के ही पक्ष का समर्थन कर
रहे थे। मेरी माताजी मामाजी एवं रवीन्द्रनाथ मुझे विद्रोही के कठोर अग्निमय
विनाशकारी मार्ग में जाने से रोकते थे। लेकिन विचार की क्षुरधार के सामने
रवीन्द्रनाथ आदि नहीं टिक पाते थे। तथापि विचार-बुद्धि ही तो मनुष्य का सब-
कुछ नहीं है। संसार में विचारपूर्वक ही सब काम नहीं होते। मनुष्यों की भावना,
उनके पूर्व संस्कार, उनकी शिक्षा-दीक्षा, उनके परिवेष्टन इत्यादि इन सबके मिलने
से मनुष्यों की कर्म प्रेरणा बनती है। मैंने जो विद्रोही का मार्ग ग्रहण किया था
वह भी तो केवल विचार बुद्धि ही की प्रेरणा से नहीं किया था। अपनी प्रवृत्ति के
अनुसार अभिरुचि या अभिलाषा बनती है और तब विचार बुद्धि की सहायता से
उस अभिरुचि, उस अभिलाषा का हम समर्थन करते हैं। विचार बुद्धि हमारा यन्त्र-
मात्र है। यह यन्त्र किस काम में लाया जाएगा इसका निर्णय युक्ति मार्ग से नहीं
हो सकता। अपनी-अपनी प्रवृत्ति के अनुसार हम अपने कर्तव्य का निश्चय करते
हैं। यह प्रवृत्ति कहाँ से आती है और क्योंकर आती है इसका निश्चयात्मक निर्णय
आज तक नहीं हो पाया है। यदि वातावरण के ही कारण प्रवृत्ति की उत्पत्ति होती
है तो वातावरण की सृष्टि और उसमें परिवर्तन कैसे और क्यों होता है इसका
निर्णय कौन करेगा? वातावरण के विरुद्ध आकर भी तो शक्तिशाली व्यक्तियों
ने परिस्थितियों को बदल दिया है। टॉल्सटाय के दृष्टान्त का अनुसरण करके
महात्माजी ने भारत के राजनीतिक वातावरण को बहुत कुछ बदल दिया है।
महात्माजी ने रूस के निहिलिस्ट अनारकिस्ट अथवा वोलशेविकों के दृष्टान्तों का
अनुसरण न करके टॉल्सटाय के ही दृष्टान्त का अनुसरण क्यों किया? भारत के
तथा संसार के क्रान्तिकारियों के दृष्टान्त रहते हुए भी पं० जवाहरलालजी ने
उनका अनुसरण न करके महात्माजी का ही अनुसरण क्यों किया? इसका उत्तर
कौन देगा? क्या इसके मूल में व्यक्तिगत रुचि-अभिरुचि, राग-द्वेष, परिणाम की
भावना और दुर्भावना इत्यादि के संस्कार प्रबल रूप में सक्रिय नहीं हैं? एक ही
वातावरण में रहते हुए भारत के कम्यूनिस्ट, सोशलिस्ट, गांधीवादीगण, मुस्लिम-
लीगी, हिन्दू महासभा वाले और क्रान्तिकारी कांग्रेसी तथा अन्य भारतवासी इतने
विभिन्न मार्गों पर क्यों चलना चाहते हैं। इन सब गूढ़ ऐतिहासिक प्रश्नों की
मीमांसा सहज नहीं है।
क्या मेरे भाई रवीन्द्रनाथ नहीं जानते थे कि मैंने युग युगान्तर से आचरित
सर्वमान्य विद्रोहियों के ऐतिहासिक मार्ग को ग्रहण किया था? लेकिन जिस अत्य-
न्तिक आग्रह के साथ रवीन्द्रनाथ मेरे साथ तर्क-वितर्क कर रहे थे उससे यह संदेह
होता था कि सचमुच रवीन्द्रनाथ जी मेरे रास्ते को ठीक नहीं समझ रहे थे। इस