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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 323

अनुशीलन समिति का सहयोग / 321

उसमें यह लिखा गया था कि अब आगे तुम शचीन्द्र बाबू के नियन्त्रण में काम
करोगे। मैं चिट्ठी लेकर युक्तप्रान्त वापस चला आया। योगेशबाबू को जब मैंने
चिट्ठी दी तो वे बहुत प्रसन्न हुए। मैं भी एक अनुभवी कार्यकर्त्ता चाहता था।
इनको पाकर मैं भी बहुत प्रसन्न हुआ। इसके बाद उनके व्यवहार में मैंने कभी कोई
दोष नहीं पाया। सदा प्रफुल्लचित्त होकर वे मेरे कथनानुसार काम करने में तत्पर
रहते थे। उनके आचरण से मैंने यह कभी नहीं समझा कि वे अपने को किसी भिन्न
दल का समझते हों। अनुशीलन के दूसरे नेताओं से मतभेद होने पर भी योगेशबाबू
मेरे ही मत के अनुसार काम करते रहे। मैंने भी योगेशबाबू पर विश्वास करके
युक्तप्रान्त का कार्यभार उन पर ही छोड़ दिया था। स्वर्गीय राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी
योगेशबाबू से कहीं अधिक शिक्षित थे। योगेशबाबू से मिलने के बहुत पहले से ही
राजेन्द्रनाथ मेरे साथ काम कर रहे थे। वह मेरे विशेष मित्र भी थे। तथापि
पूर्ण रीति से अनुभवी न होने के कारण मैंने राजेन्द्रनाथ पर कार्य-भार न्यस्त न
करके योगेशबाबू पर न्यस्त करना ही उचित समझा। पंजाब का कार्यभार
अध्यापक जयचन्द्रजी पर न्यस्त था। योगेशबाबू से जयचन्द्रजी का अथवा किसी
अन्य व्यक्ति का परिचय मैंने नहीं कराया था। काम करने के सिलसिले में जो जो
व्यक्ति पंजाब से युक्तप्रान्त में आए थे। उन्ही से योगेशबाबू का परिचय हुआ था।
अनुशीलन के साथ सम्बन्ध स्थापित होने के बहुत पहले से ही सरदार भगतसिंह
युक्तप्रान्त में आ गए थे। त्रैलोक्यनाथ बाबू से चिट्ठी लाने के बाद मैंने यह
निर्णय किया कि योगेशबाबू बनारस छोड़कर कानपुर आकर ठहरें क्योंकि मैं यह
समझता था कि बनारस में राजेन्द्र लाहिड़ी हैं परन्तु कानपुर में मेरी अभिरुचि के
अनुसार कोई व्यक्ति न था। इसके पहले ही सरदार भगतसिंह को कानपुर में
ठहराया गया था। भगतसिंह भी बड़े योग्य व्यक्ति थे परन्तु अनुभवी न थे। इस
प्रकार जब योगेशबाबू एवं सरदार भगतसिंह दोनों व्यक्ति कानपुर में रहने लगे तो
ये एक-दूसरे से परिचित हो गए। अभी तक कानपुर में श्री राजकुमार, श्री विजय
कुमार तथा श्री बटुकेश्वर हमारे दल में सम्मिलित नहीं हुए थे। श्री सुरेशचन्द्र
भट्टाचार्य भी कानपुर में थे लेकिन सुरेशबाबू अनमने होकर हमारे दल का काम कर
रहे थे। योगेशबाबू के कानपुर आने पर ढंग से काम होने लगा। मैं था इलाहाबाद
में, राजेन्द्र लाहिड़ी थे बनारस में, और योगेशबाबू कानपुर में आ गए। लखनऊ में
हमारा कोई विश्वस्त और कार्यकुशल व्यक्ति न था। इलाहाबाद और कानपुर
वाले ही लखनऊ का काम भी संभाल रहे थे। धीरे-धीरे मैंने योगेशबाबू से युक्त-
प्रान्त के विभिन्न कार्यकर्ताओं का परिचय करा दिया। बनारस में योगेशबाबू के
दो-तीन मित्र थे यथा श्री मन्मथनाथ गुप्त, श्री शचीन्द्रनाथ बख्शी, श्री प्रणवेश
चटर्जी और स्वर्गीय चन्द्र शेखर आजाद।
योगेशबाबू के कानपुर चले जाने पर उनके बनारस के मित्रगण राजेन्द्रबाबू
के नियन्त्रण में काम करने लगे। मेरी गिरफ्तारी के पूर्व तक योगेशबाबू सरल
हृदय से मेरे साथ काम कर रहे थे। मेरे दिल में कभी भी यह सन्देह नहीं हुआ