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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 329, कुल 408 में से

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पृष्ठ 329

गृह-त्याग / 327
की आवश्यकता नही। एक दिन की बात है कि मेरे पिता के एक मित्र ने मेरे
कनिष्ठ भ्राता को गोद में उठा लिया था। इनसे हम लोग परिचित न थे इसलिए
मेरे मंझले भ्राता ने चिल्लाना शुरू कर दिया और अपने नन्हे-नन्हे हाथ फैलाकर
अपने कनिष्ठ भ्राता को उनकी गोद से उतारने की व्यर्थ चेष्टा करने लगे। बाल्या-
वस्था की वह प्रीति आज चालीस वर्ष के बाद भी वैसी ही बनी है। घोर दुर्दिनों
के समय जब मैं असहाय दशा मे ब्रिटिश सरकार के कारागार में निर्जन कोठरी
में अनिर्दिष्ट काल के लिए बन्द पड़ा रहा तब मेरे इन परम स्नेहास्पदों ने ही मेरे
बाल-बच्चों का विषाद-युक्त हर्ष के साथ लालन-पालन किया था। एक-दो दिन
के लिए तो सभी दुःख झेल सकते है लेकिन लगातार बारह-तेरह वर्ष तक अपने
असहाय भ्राता के दुख दैन्य अपने कंधे पर उठाने के दृष्टान्त आजकल संसार
में विरले ही है। ऐसे भाइयों से सदा के लिए बिछुड़ने की दुश्चिन्ता से मैं विचलित
क्यों न होता। और अपनी स्नेह-मयी जननी की बात का क्या कहना। किसकी
जननी स्नेहमयी नही होती ? और किस संतान को अपनी जननी से प्रेम नही
होता ? सदा के लिए ऐसी माँ और भाइयों से अलग होने की संभावना से मैं सदा
दुखी रहता था। अंत मे घर से अलग होना ही पड़ेगा यह मैं जानता था तथापि
स्नेह-बन्धन के कारण मैं उस अलग होने के दिन को सदा टालता रहता था। मैं
नित्य यह सोचता था कि अब अलग होना पड़ेगा और फिर अलग होने के दिन
को मैं टाल देता था। अपने बाल-बच्चों को तो मैंने साथ लेने का संकल्प कर ही
लिया था लेकिन अपनी दुखिनी विधवा जननी को मैं किस प्रकार छोड़ जाता।
यदि मैं इन स्नेह बन्धनों को नही तोड़ सकता हूँ तो मुझे राजनीति से अलग होना
पड़ता है।
माताजी के चार पुत्र थे। उनमें से एक चला जायगा। तीन तो माताजी के
पास रह जाएँगे। मुझे इतना ही संतोष रह गया था। एक दिन की बात है माताजी
प्रयाग में अर्धकुंभी के अवसर पर कल्पवास कर रही थीं। गंगा के तट पर साधु-
सन्तों का जमघट था। नग्न, अर्धनग्न, चन्दन सुशोभित तरह-तरह के वस्त्र पहने,
गौर, श्याम आदि सभी वर्ण के, उच्च कोटि, मध्य कोटि, अथवा निम्नस्तर के
नाना प्रकार के सहस्रों साधुओं के दर्शन के लिए जिज्ञासु अथवा कौतूहली सैकड़ों
व्यक्ति प्रातःकाल से संध्या तक वहाँ घूमा करते थे। मैं भी इन भटकते हुए
व्यक्तियों में से एक था। मेरी माताजी भी स्वतंत्र रूप से अपनी टोली के साथ
साधु-सन्तों का दर्शन करती थीं। एक गौरवर्ण सौम्य मूर्ति संन्यासी के पास मैं
प्रायः जाया करता था। कुछ न कहने पर भी मेरे मन के प्रश्न को योंही समझकर
इन महात्माजी ने मुझे बहुत-सी बातें बताईं। उनका उल्लेख करने की यहाँ आव-
श्यकता नहीं है। योग की शक्ति पर जिनका विश्वास नहीं है इन संन्यासीजी के
पास जाने से उनके संदेह का भंजन हो सकता है। क्योंकि यह साधु अद्या भी
जीवित हैं। इनका नाम है परमहंस श्रीमन्स्वामी जयेन्द्रपुरीजी। आजकल आप
बनारस के पास शिवपुर में अपने आश्रम में रहते हैं। मेरी माताजी भी मेरे पहले