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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 408 में से

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पृष्ठ 330

328 / बन्दी जीवन

ही इन महात्माजी के पास पहुँची थी और उनमे उन्होने अपना दुखडा सुनाया था
कि मेरा लड़का निषिद्ध मार्ग पर चलकर देशसेवा करना चाहता है, हजार कहती
हूँ वह मानता ही नही। जाने क्या धुन सवार है। एक बार आजन्म कालेपानी
की सजा हो गई थी लेकिन परमात्मा की कृपा से चार-पाँच साल मे ही छुटकारा
मिल गया था। फिर वही काम करना चाहता है। मैने उसे किसी तरह भी समझा
नही पाया। आप महात्मा है यदि आप दो शब्द कह देगे तो लड़का अवश्य ही
मान जायगा। मै बहुत दु खी हूँ एक घडी के लिए भी मेरे मन मे शान्ति नही है।
मैं विधवा हूँ मेरा लड़का ही मेरा सहारा है।" यह सब बातें सुनकर सन्यासीजी
ने माताजी से कहा कि तुम अपने लडके को मेरे पास लेती आना। माताजी जानती
थी कि मैं भी साधु-सन्तो के पास आया-जाया करता हूँ। साधु-सन्तो से मेरी
अत्यन्त प्रीति है। एक दिन माताजी ने मुझसे कहा कि चलो तुम्हे एक पहुँचे हुए
महात्मा के पास ले चलती हूँ। मैं भी बडी उत्सुकता के साथ साधु-दर्शन के लिए
चल पड़ा तो देखता हूँ कि जिस महात्मा के पास मै जाया करता था उसी के पास
माताजी भी मुझे ले आईं। इनके पास आकर मुझे बडी प्रस-नता हुई। मेरे साथ मेरी
माता, मेरी पत्नी और मेरा डेढ साल का लड़का था। माता ने मेरी तरफ इशाग
करने के बाद कहा कि "यही मेरे पुत्र है जिनके सम्बन्ध मे आपसे पहले कह चुकी हूँ।"
महात्माजी ने माताजी को बताया कि यह तो मेरे पास पहले ही से आता है। और
मुझसे कहा आओ पास बैठो। कुछ बातचीत होने पर संन्यासीजी ने माताजी से
कहा कि "बेटी ! तुम्हारे जब चार लडके है, तब तो तुम्हे एक लडके को धर्मार्थ
देना ही पडेगा। चार मे से जब तीन तुम्हारे पास रहने है और एक धर्मार्थ
जीवन व्यतीत करना चाहता है तो उस पर तुम्हारा कोई अधिकार नही रह
सकता।" माताजी के दोनो नयन आंसुओ से भर आए लेकिन माताजी फिर भी
हँस रही थी क्योकि वे अच्छी तरह जानती थी कि मेरा मार्ग धर्म का मार्ग था।
मैं कोई बुरा काम करने नही जा रहा था। माताजी तो स्नेह की पीडा से
जर्जरित हो रही थी फिर भी उनकी धर्म की बुद्धि जागृत थी। एक विशिष्ट साधु
के मुख से उपर्युक्त वचनो को सुनकर मेरी माताजी को युगपद दुःख, स्नेह, गौरव
इत्यादि की भावनाओ के सम्मिश्रण ने एक साथ हर्ष और विषाद की अनुभूति
हुई। अश्रुपूर्ण नयनो से मेरी तरफ देखकर जब माताजी हँसने लगी तो मैं भी
हर्षोत्फुल्ल नयनो से विजयोल्लास की क्षणिक अनुभूति की दीप्ति से व्यक्त कर
रहा था और सौम्य मूर्ति गौरवर्ण उक्त महापुरुष की तरफ देखकर विस्मयपूर्ण
चकित दृष्टि मे कृतज्ञता एवं आत्म-समर्पण की भावना को दीनता के साथ व्यक्त
कर रहा था। इतने मे सन्यासीजी मुझसे यह कहने लगे कि "देखो बेटा ! हिन्दू
शास्त्र के अनुसार तुम्हारा यह परम कर्तव्य है कि जब तुमने विवाह कर लिया है
तो अपनी पत्नी की अनुमति की उपेक्षा करके तुम कोई धर्म कार्य नही कर
सकते।" यह बात मैं पहले ही से जानता था। मैं यह जानता था कि आर्य धर्म
के अनुसार यदि कोई सन्यासी भी होना चाहता है तो उसे न केवल अपने माता-