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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 327, कुल 408 में से

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पृष्ठ 327

गृह-त्याग / 325
यह बात दूसरे नहीं समझ सकते। ऐसी परिस्थिति में यदि मैं बच्चों को अपनी
माता और भाइयों के पास छोड़कर फरार हो जाता हूँ तो इन पर मैं एक भारी
बोझा डाले जाता हूँ। और इस प्रकार फरार होने से यह भी बात थी कि मुझे
सदा के लिए अपनी स्त्री तथा बाल-बच्चों से विच्छिन्न होना पड़ता। विभिन्न
देशों के क्रान्तिकारी आन्दोलन के इतिहास में यह प्रायः देखा गया है कि फरार
व्यक्ति लौट-फिर कर अपने परिवार में आकर पकड़े गए हैं। जब मैंने विवाह
किया था तो मैंने अपने भाइयों से यह आग्रह किया था कि मैं क्रान्तिकारी आन्दो-
लन में जीवन बिता दूँगा और आवश्यकता पड़ने पर मेरे परिवार का भार आप
लोग ग्रहण करेंगे। उनके लिए मानो यही देश सेवा है। मैं अपने जीवन को खतरे
में डालने के लिए प्रस्तुत हूँ तो क्या मेरे भाई मेरे परिवार का प्रतिपालन भी न
करेंगे। मेरे तीसरे भाई श्री जितेन्द्रनाथ सहर्ष यह कर्तव्य भार ग्रहण करने के
लिए प्रस्तुत हुए थे।
जब मुझे योगेशबाबू जैसे कार्यकर्त्ता मिल गए तो मैंने भी यथारीति फरार
होने का संकल्प कर लिया। युक्त प्रदेश में मुझे पुलिस वाले अच्छी तरह से पह-
चानते थे। पंजाब की पुलिस उतना नहीं पहचानती थी। अपनी स्त्री का मुंह देख-
कर मेरे दिल में यह भावना उत्पन्न होती थी कि पराई लड़की को मैं कहाँ
घसीट लाया। इसे छोड़कर यदि मैं सदा के लिए फरार हो जाता हूँ तो क्या
इसका जीवन व्यर्थ-सा नहीं हो जायगा। अपने लड़के का मुंह देखता था तो यह
सोचने लगता कि यह बेचारा भी अपने पितृस्नेह से सदा के लिए वंचित रह
जायगा। मैं इस 'सदा के लिए' की भावना से नितान्त विचलित हो जाता था।
माता और भाइयों के स्नेह, स्त्री और सन्तानों की प्रीति के बन्धन से सदा के
लिए विच्छिन्न हो जाना मेरे लिए असहनीय था। और यह बात भी थी कि युक्त
प्रदेश अथवा पंजाब में मेरे लिए बाल-बच्चों को साथ लेकर फरार होना न संभव
था न उचित। इसका एक कारण तो यह था कि इन प्रदेशों में मुझे पुलिस के
काफी आदमी अच्छी तरह पहचानते थे और यदि मैं बड़े-बड़े शहरों को छोड़कर
किसी छोटे नगर में जाकर बाल-बच्चों सहित रहता तो भी बंगाली होने के नाते
मैं बहुत शीघ्र ही सबकी दृष्टि को आकर्षित कर लेता। ऐसी दशा में मेरे लिए
यह संभव न था कि मैं अपने बाल-बच्चों को साथ लेकर पंजाब अथवा युक्त
प्रदेश में फरार हालत में रह सकता। मैंने यह भी निश्चय कर लिया था कि
फरार हालत में मैं अपने बाल-बच्चों को साथ ही रक्खूँगा। इन सब कारणों से
मैंने बंगाल में ही फरार होकर रहने का निश्चय कर लिया। लेकिन फरार
होकर जान बचाना ही तो मेरा उद्देश्य न था और यदि फरार हालत में रहकर
क्रान्तिकारी आन्दोलन का कार्य करता तो यथारीति संगठन शक्ति की सहायता
के बिना ऐसा संभव न था। यदि मैं फरार हालत में रहकर क्रान्तिकारी अथवा
राजनैतिक आन्दोलनों से अलग रहता और किसी प्रकार से अपनी जीविका
उपार्जन कर लेता तो विशेष चिन्ता की कोई बात न थी। लेकिन एक तरफ