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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

क्रान्तिकारी दल और कम्यूनिस्ट / 303
जाय । गरीब और अमीर का भेद तभी मिट सकता है जब धनोत्पादन के साधन
व्यक्ति के हाथ में न रहकर समाज के हाथ में रहें । क्रान्ति के ही मार्ग से यह काम
बन सकता है अन्यथा नही । यदि आर्थिक दृष्टि से समाज मे साम्य नहीं रहता
तो उस समाज की प्रत्येक व्यवस्था एवं राज्य की नीति दूषित एवं अकल्याणमयी
हो जाती है ।
मैंने शान्त एवं एकाग्र चिन होकर उनकी सब बाते सुनी । आज तक
क्रान्तिकारी आन्दोलन के अनेकों इतिहास पढ़े, राष्ट्रों के उत्थान-पतन की भी
कितनी ही बातें पढ़ीं परन्तु कम्यूनिज्म के आर्थिक दृष्टिकोण से ऐतिहासिक
घटनावली को समझना नही सीखा । जीवन मे कुतुबुद्दीनजी की सहायता से
कम्यूनिज़्म का आर्थिक दृष्टिकोण के सिद्धान्त की मौलिकता देखकर मैं चकित
एवं विस्मयाविष्ट हो गया । आज तक मे इस सिद्धान्त से परिचित न था यह
जानकर मुझे बड़ी लज्जा एव क्षोभ हुआ । बातचीत होते-होते कभी इतिहास के
गहन प्रश्नो में, कभी अर्थनीति की विचित्र गति में, एवं अर्थनीति से धर्मनीति में
एवं धर्मनीति से अद्वैतवाद एव भौतिकवाद इत्यादि की गहन दार्शनिक अरण्यनी
मे हम घण्टो विचरते रहे । कुतुबुद्दीन साहब से मिलकर उनसे बातचीत करके मुझे
जैसे अत्यधिक प्रसन्नता हुई वैसे ही एक नवीन सिद्धान्त से परिचित होकर मैं
आश्चर्यान्वित एवं चकित भी हुआ । जीवन में एक और नवीन समस्या पैदा हो
गई । अभी तक वेदान्त के लपेटे में पड़कर ज्ञान और कर्म की विषम उलझन में
पड़ा था । फिर हिंसा और अहिंसा के द्वन्द्व मे पड़कर भी कुछ अशान्ति भुगती,
गांधीवाद और सत्याग्रह-मार्ग से सशस्त्र क्रान्तिकारी मार्ग की भीषण प्रति-
द्वन्द्विता के कारण जीवन में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, अब अन्त
में कम्यूनिज्म के भौतिकवाद, इतिहास की आर्थिक व्याख्या एवं राज की नवीन
परिकल्पना प्रसूत राजनैतिक एवं दार्शनिक उलझनो में पड़कर जीवन मे
एक नवीन एवं जटिल समस्या की उत्पत्ति हुई है ।
सम्पत्ति व्यक्ति के हाथ में न रहकर समाज के हाथ में रहे इसके मूल में
जो महान् आदर्श है उसे में अस्वीकार नहीं कर सका । परन्तु धन उत्पादन के
साधन ही सम्पत्ति है यह मे देहली मे भली भाँति नहीं समझ पाया था । इस
सम्बन्ध में सर्वप्रथम मेरे मन में इस भावना की उन्नति हुई कि में इस महान्
आदर्श का अनुयायी बनने योग्य न था। मेरे मन में वही संन्यासी का आदर्श
दिखाई दिया और मैने यह अनुभव किया कि मैं इसके लिए उपयुक्त न
था । इसके साथ-साथ मैं इस बात को भी स्वीकार नहीं कर पाया कि आर्थिक
व्यवस्था के कारण ही समाज में हर प्रकार की उन्नति हो सकती है। जब मैने
कुतुबुद्दीन माहब को वेदान्त के मूलतत्त्व के विषय में कुछ समझाना प्रारम्भ
किया तो आपने यह स्वीकार किया कि ये सब बातें दार्शनिक विचारधारा में
शोभा पा सकती हैं। एवं सम्भव है इनकी उपयोगिता भी हो लेकिन धर्म के
प्रति कम्यूनिज्म का जो आक्रमण है उससे इन दार्शनिक विचारों का विशेष

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सम्बन्ध नहीं है। आज ये सब बातें स्मरण करते समय मुझे ऐसा सन्देह होता
है कि सम्भव है कुतुबुद्दीन साहब वेदान्त के विचारों से भली भाँति परिचित न
रहे हों अथवा यह भी हो सकता है कि क्योंकि कुतुबुद्दीन साहब मुझे धीरे-धीरे
अपनी ओर खींचना चाहते थे, इसलिए मेरे दृढ़ दार्शनिक विचारों के प्रति
सहिष्णुता दिखाकर मुझे यह समझाना चाहते थे कि दार्शनिक विचारधारा एवं
धार्मिक भावना ये दो एकदम भिन्न वस्तुएँ हैं। कुतुबुद्दीन साहब का यह कहना
कि धर्म के कारण संसार में भीषण अनर्थ हुए हैं मुझे बहुत सीमा तक स्वीकार
करना पड़ा था। तथापि मैने इस बात को किञ्चित् मात्र भी स्वीकार नहीं किया
कि धर्म का सद्व्यवहार नहीं हुआ इसलिए यथार्थ में धर्म भी स्वयं सद्वस्तु नहीं
है। इतिहास में बहुत-से अवसरों पर धर्म का दुरुपयोग हुआ है, इसलिए धर्म
का सदुपयोग भी नहीं हो सकता है यह बात न युक्तियुक्त है न ऐतिहासिक दृष्टि
से ही सत्य है। फिर निरी आर्थिक दृष्टि से ही इतिहास को समझने की चेष्टा
करना यह भी एक युक्ति संगत बात नहीं है। इस प्रकार कम्यूनिज्म के संस्पर्श
में आकर जीवन में एक महान् नवीन आदर्श की प्रेरणा का मैंने अनुभव किया।
परन्तु कम्यूनिज्म के सिद्धान्त में एक महान् आदर्श के साथ कुछ ऐसी भी बातें
जोड़ दी गई हैं जिन्हें न मैंने उस दिन ही स्वीकार किया था और न इतने दिनों
के मनन और अध्ययन के बाद आज भी कर सकता हूँ। मैं युक्ति, दार्शनिक दृष्टि
अथवा मानव अभिज्ञता की दृष्टि से भौतिकवाद को आज भी सत्य नहीं समझता।
किसी नवीन आदर्श की परिकल्पना केवल जड़वाद के दृष्टिकोण से उत्पन्न नहीं
हो सकती।
विप्लव आन्दोलन की दृष्टि से देहली में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के अव-
सर पर बहुत महत्त्वपूर्ण बातें हुईं। इसी अधिवेशन में कांग्रेस ध्येय को बदलने की
सर्वप्रथम चेष्टा हुई। उत्तर भारत के विप्लव आन्दोलन पर कम्यूनिज्म के आदर्श
का अभूत प्रभाव पड़ा। भारतीय विप्लव आन्दोलन के इतिहास में यह एक विशेष
महत्त्वपूर्ण घटना है। देहली में कांग्रेस के अधिवेशन के समय भारत में कम्यूनिस्टों
का कहने योग्य कोई संगठन नहीं था। सन् 1924 ई० में कानपुर के बोलशेविक
षड्यन्त्र के मामले में इने-गिने मनुष्य अभियुक्त थे। हम लोगों के क्रान्तिकारी दल
की तुलना में भारतवर्ष भर में दूसरा कोई व्यापक एवं सुसंगठित दल न था।
पंजाब में सरदार गुरुमुखसिंह तथा सरदार संतोखसिंह के नेतृत्व में कम्यूनिज्म के
आदर्श पर एक दल तैयार हो रहा था। लेकिन इस दल की तमाम कर्मचेष्टा
पंजाब प्रान्त में ही सीमित थी। बंगाल के अन्य क्रान्तिकारी दलों में कम्यूनिज्म
के किसी भी प्रभाव का चिह्न नहीं दिखाई दिया था। मैंने उत्तर भारत में जिस
विप्लव दल का संगठन किया था भारतीय विप्लव आन्दोलन के इतिहास में इसी
दल ने सर्वप्रथम कम्यूनिस्ट सिद्धान्त के बहुत अंशों को स्पष्ट शब्दों में ग्रहण कर
लिया था। उस सिद्धान्त के जिन अंशों को हमने उस दिन नहीं ग्रहण किया था
वह इसलिए नहीं कि वे हम लोगों की समझ में नहीं आए थे, वरन हम लोगों ने

क्रान्तिकारी दल और कम्यूनिस्ट : 305

जान-बूझकर सिद्धान्त के विचार से, युक्ति की कसौटी पर उनके निर्बल प्रमाणित
होने के कारण ही उन्हें स्वीकार नही किया था। यूरोप के आधुनिक इतिहास की
पर्यालोचना करने से यह प्रमाणित हो रहा है कि हमारा दृष्टिकोण सत्य है।
परानुकरण वृत्ति के कारण जो लोग सौ वर्ष से पहले के सिद्धान्त को अपरिवर्तित
रूप मे ज्यों का त्यों आज भी देश-काल-पात्र-भेद का विचार न करके जैसे का
तैसा ग्रहण करने को लालायित हैं वे भूल जाते हैं कि गत शत वर्ष की प्रबल चेष्टा
के बाद भी आज यूरोप अथवा अमेरिका मे कोरे मार्क्सवाद की विजय नही हुई
बल्कि यूरोप के कम्यूनिस्टो को अपनी नीति में बहुत परिवर्तन करना पड़ा है।
श्रेणी सघर्ष के स्थान पर आज सयुक्त मोर्चा आदि के नारे बुलन्द हो रहे हैं।
ध्यान दने योग्य एक और बात यह है कि इंग्लैड, फ्रांस तथा अमेरिका मे कम्यू-
निस्टो के साथ दूसरे प्रगतिशील दलों ने सहयोग करना स्वीकार नही किया।
कम्यूनिस्टो के सयुक्त मोर्चे के प्रयत्न विफल हो रहे हैं।
देहली से लौटकर मैं आगरा, मथुरा इत्यादि होकर कानपुर आया था।
कानपुर आकर एक सज्जन के यहाँ ठहरा। इनका नाम श्री सत्यभक्तजी था।
आप हिन्दी के एक परिचित लेखक हैं। मुझमे कम्यूनिज्म के सिद्धान्त से भली
प्रकार परिचित होने की प्रबल इच्छा उत्पन्न हुई थी।
सत्यभक्तजी कम्यूनिज्म के सिद्धान्त के आधार पर युक्त प्रान्त मे एक दल
संगठित करना चाहते थे। कम्यूनिज्म का एक मूल सिद्धान्त है कि विप्लव के
ही मार्ग से सफलता प्राप्त की जा सकती है अन्यथा नही। हम लोग यथार्थ में
विप्लवी थे। सत्यभक्तजी विप्लव के मार्ग पर नही चलना चाहते थे। लेकिन
उनके पास कम्यूनिज्म के विषय की कुछ अच्छी-अच्छी पुस्तकें थी। उन्हें मैने
पढ़ डाला। कम्यूनिज्म को समझने के लिए मुझे 'बुखारिन' लिखित 'ए० बी०
सी० आफ कम्यूनिज्म' नामक पुस्तक से बड़ी सहायता मिली। लेनिन लिखित
तीन-चार पुस्तकें भी पढ़ डालीं। इन सब पुस्तकों में से तीन-चार पुस्तकें विशेष
उल्लेख योग्य है यथा 'प्रालिटेरियन रेवल्यूशन', 'स्टेट ऐण्ड रेवल्यूशन', 'फ़ाम
युटोपिया टु माइन्स', 'फोर्थ एण्ड सिक्सथ रिपोर्ट आफ दी कम्यूनिस्ट इण्टर
नेशनल काग्रेस' इत्यादि। इसके अतिरिक्त मानवेन्द्रराय द्वारा सम्पादित बहुत-
से पर्चे पढ़ने का भी अवसर मिला। इस प्रकार सन् 1924 मे ही कम्यूनिज्म के
सिद्धान्त के बारे मे मैने बहुत कुछ समझ लिया था। सत्यभक्तजी से मेरा बहुत
वार्तालाप भी हुआ, तर्क-वितर्क हुए, एव भौतिकवाद और आत्मवाद, इतिहास
की आर्थिक व्याख्या एव श्रेणी संघर्ष इत्यादि प्रश्नो को लेकर दिन-दिन-भर तक
आलोचनाएं हुईं।
पंजाब के सरदार गुरुमुखसिंह जी से बातचीत होने के बाद मैने अपने दल के
लिए एक लिखित सगठन और कार्यक्रम की योजना तैयार करना आवश्यक
समझा और कानपुर मे आकर यह योजना तैयार की। इसके बारे में विशद रूप
और विस्तार से लिखने की आवश्यकता है। कारण यह कि क्रान्तिकारी आन्दोलन

[Header] 306 / बन्दी जीवन

के बारे में भारतवर्ष में बहुत-सी भ्रान्त धारणाएँ फैली हुई हैं। हमारे देश के
बहुत से गण्यमान्य लब्ध-प्रतिष्ठ नेतागण भारतीय विप्लव आन्दोलन को बच्चों का
खेल समझते आए हैं। भारतवासी प्रायः यह समझते आए हैं कि भारतीय विप्लव
आन्दोलन का केवल यही अर्थ है कि समय-समय पर कुछ अंग्रेज़ और पुलिस
अफसरों को गोली से मारना अथवा धनी देशवासियों के घरों में डाका डालकर
अर्थ संग्रह करना। हमारे देशवासी आज भी नहीं समझ पाए हैं कि क्रान्ति के
मार्ग से भारत को स्वाधीन करने की चेष्टा युक्तिसंगत एवं ऐतिहासिक परम्परा
के आधार पर समर्थन योग्य है। इस नासमझी के मूल में यथार्थ बात तो यह है
कि भारतवासी आज भी सच्चे हृदय से भारत को स्वाधीन करने के लिए कुछ
नहीं करना चाहते हैं। भारत के किसी भी राष्ट्रनेता की मनोवृत्ति मेजिनी,
गेरीवाल्डी, के बूर, डि वैलेरा अथवा किसी इतिहास प्रसिद्ध विप्लवी नेता की
तरह नहीं है। यही कारण है कि भारत के नेतागण यहाँ के विप्लव आन्दोलन
को यथार्थ रूप में नहीं समझ पाए हैं और दूसरी बात यह भी है कि भारतीय
विप्लवी गणों ने स्वयं अपने सिद्धान्तो का प्रचार कुछ नहीं किया। भारत के
विप्लवियों ने प्रकाश्य आन्दोलन में भाग लेकर ज्वालामयी प्राण-स्पर्शी भाषा
द्वारा एवं अलंघ्य युक्ति के मार्ग से जन-साधारण को अपनी ओर आकर्षित करने
की यथार्थ चेष्टा नहीं की।
अण्डमन में रहते समय ही मैंने यह अनुभव किया था कि भारत में क्रान्ति-
कारी आन्दोलन की ओर से ऐसे साहित्य की सृष्टि करने की परम आवश्यकता
है। ऐसे साहित्य की सृष्टि तभी हो सकती है जब उपयुक्त शिक्षित वर्ग क्रान्ति-
कारी आन्दोलन में भाग ले। परन्तु भारत के दुर्भाग्य से यहाँ के प्रतिभावान,
विचारशील, साहित्यिक रुचि सम्पन्न, मननशील और अध्ययनशील व्यक्तियों
में से अधिकांश ने विप्लव आन्दोलन में भाग नहीं लिया। इसी कारण भारतीय
क्रान्तिकारी आन्दोलन की ओर से उपयुक्त साहित्य की सृष्टि नहीं हुई। किसी
आन्दोलन की सफलता के लिए उसके दृष्टिकोण से उपयुक्त साहित्य की सृष्टि
करना सर्वप्रथम एवं परम आवश्यक बात है। परन्तु यह परम दुःख की बात है
कि इस देश में भारतीय विप्लव आन्दोलन के सम्बन्ध में किसी भी कहने योग्य
साहित्य की सृष्टि नहीं हुई। सन् 1919 ई० से सत्याग्रह आन्दोलन को बीस वर्ष
हो गए पर इस बीच में भी साहित्य की सृष्टि नहीं हुई। यूरोप अमेरिका अथवा
चीन के किसी भी आन्दोलन को ले लीजिए उन देशों में जितने प्रकार के
साहित्यों की सृष्टि हुई है उसका शतांश भी हमारे देश में नहीं हुई। कम्यूनिस्ट
आन्दोलन के सम्बन्ध में इतनी पुस्तकें, पुस्तिकाएँ एवं सामयिक पत्रिकाएँ
प्रकाशित हुई हैं कि उनसे संसार-भर में विप्लव मचा हुआ है। साम्राज्यशाही
राष्ट्रों के निकट कम्यूनिस्टों की एक साधारण पुस्तिका मशीनगन से भी अधिक
भीतिप्रद एवं आपत्तिजनक समझी जाती है। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम भाग
में बंग भाषा में मेजिनी, गैरी वाल्डी इत्यादि प्रसिद्ध राष्ट्र विप्लवियों के जीवन

क्रान्तिकारी दल और कम्यूनिस्ट / 307

चरित्र लिखे गए थे। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही बंकिम रवीन्द्रनाथ,
नवीनचन्द्र, शरत्चन्द्र इत्यादि प्रतिभाशाली लेखको ने जिस साहित्य की सृष्टि
की है उसकी तुलना आज भी भारत मे नहीं मिल सकती। फिर ऐतिहासिक
गवेषणा मे, वैज्ञानिक अनुसंधान में, काव्य मे, कला मे, अर्थात् राष्ट्रीय चेतना
की प्रत्येक दिशा मे प्राणशक्ति का अपूर्व स्फुरण हुआ था। कलकत्ता हाईकोर्ट
के न्यायालय में जब पहले-पहल राजनीतिक षड्यन्त्र के मामलो पर विचार
प्रारम्भ हुआ तो युगान्तर पत्र के अनुवाद के सम्बन्ध में जजों के सामने यह कहा
गया था कि युगान्तर की भाषा इतनी मौलिक है कि उसका भाषान्तर करना
सम्भव नही । मिल्टन की भाषा मे जो शक्ति है, बर्क की शैली मे जो ओजस्विता
है, मार्ले की भाषा में जो प्रांजलता और प्रसाद है, युगान्तर की भाषा मे मानो
इन सब गुणों की अद्भुत व्यंजना व्यक्त हुई है। युगान्तर की तुलना में हिन्दी
भाषा में हमें कुछ भी नही मिल सकता। नेपोलियन के समय में जर्मन प्रदेश
शतधा विभक्त था । सौ मील जाने मे तीस टुकडे-टुकडे स्वतन्त्र प्रान्तो से होकर
जाना पड़ता था । नेपोलियन द्वारा तीव्र रूप से आघात प्राप्त करके जर्मनी में
राष्ट्रीय चेतना का नव-उन्मेष हुआ था। उस समय भी जर्मन साहित्य मे अद्भुत
जागृति दिखाई दी थी। जर्मन विश्वविद्यालय के एक प्रसिद्ध अध्यापक फान्
टिट्श्के ने नवीन शैली से अद्भुत प्रेरणा के वशीभूत होकर जो इतिहास लिखा
था उसी के प्रभाव से जर्मनी मे एक नवीन राष्ट्रीय चेतना का संचार हुआ।
भारतवर्ष के राष्ट्रीय आन्दोलन की चर्चा करने पर हमे नितान्त निराश होना
पडता है। महात्माजी एव पं० जवाहरलालजी की आत्म-कथाओ तथा सुभाष
बाबू की एक-दो पुस्तको को छोडकर पिछले बीस वर्षो मे कुछ भी साहित्य की
सृष्टि नही हुई है। यह कुछ आशा की बात रही है। अण्डमन मे रहने समय मेरे
मानस पटल मे ये सब बातें स्थायी रूप से अंकित हो गई थी। तथापि आज भी
मेरे मन मे परिताप की सीमा नही है कि अपनी अभिलाषा के अनुसार मैं कुछ
भी साहित्यिक प्रयत्न नही कर पाया। बात यह थी कि विप्लव कार्य मे आत्यन्तिक
रूप से लिप्त रहने के कारण मुझे साहित्य चर्चा करने का अवसर ही नही मिला ।
मेरी एक यह इच्छा थी कि क्रान्तिकारी आन्दोलन की उपयोगिता एवं
आवश्यकता के विषय मे एक परिपूर्ण ग्रन्थ लिख डालूं। क्रान्तिकारी आन्दोलनों
के विपक्ष मे आज तक जितने आक्षेप किये गए हैं इसे तुच्छ एवं बुद्धिहीनों का
व्यर्थ आस्फालन प्रतिपादित करने के लिए जितनी बातें कही गई हैं इन सबका
प्रत्युत्तर देने की मन में प्रबल इच्छा थी। परन्तु परम दुर्भाग्यवश मैं कुछ भी न
कर पाया। इस प्रकार के ग्रन्थ लिखने मे यथेष्ठ समय की आवश्यकता होती है, और
मुझे यह समय प्राप्त नही है। यदि ग्रन्थ लिखने बैठ जाता हूँ तो इधर संगठन का
कार्य पड़ा रहता है और संगठन के कार्य में लग जाता हूँ तो लिखने का समय
नहीं मिलता। ऐसी परिस्थिति में ही मैंने अपने दल का एक कार्यक्रम तैयार
किया था। मेरी समझ से भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन के इतिहास में इस

308 / बन्दी जीवन
कार्यक्रम का एक विशेष महत्त्व है। यह कार्यक्रम आज पुलिस के अधिकार में है।
लेकिन काकोरी षड्यन्त्र के मामले के फैसले में इस कार्यक्रम का बहुत-सा अंश
उद्धृत है।
उन उद्धृत अंशों से उस कार्यक्रम का कुछ परिचय इस स्थान पर देने का
प्रयत्न करूँगा। इस कार्यक्रम से पाठकों को विदित होगा कि उत्तर भारत का
क्रान्तिकारी आन्दोलन कितने दृढ़ सिद्धान्तों के आधार पर प्रारम्भ हुआ था।
श्री रासबिहारी के समय उत्तर भारत में जो क्रान्तिकारी दल काम कर रहा
था उसका कोई कार्यक्रम न था। यूनाइटेड स्टेट्स और कनाडा में जो विप्लव
दल था वह गदर पार्टी के नाम से विख्यात था। बंगाल में जितनी पार्टियाँ थीं
उन सब के अलग-अलग नाम थे। अबकी बार मैंने जो दल संगठित किया उसका
नाम 'दि हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' रक्खा। अवध चीफ कोर्ट के फैसले
से इस दल के लक्ष्य तथा साधन एवं इसकी संगठन प्रणाली के नियम इत्यादि
नीचे उद्धृत हैं -
नाम
इस दल का नाम 'दि हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' रहेगा।
लक्ष्य
सुसंगठित एवं सशस्त्र क्रान्ति के द्वारा संयुक्त भारतीय प्रजातन्त्र संघ की
स्थापना करना इस दल का ध्येय होगा। इस प्रजातन्त्र के विधान और उसके
अन्तिम स्वरूप का निर्माण एवं उसकी घोषणा जनता के प्रतिनिधियों द्वारा ऐसे
समय की जायगी जब वे अपने निश्चयों को व्यावहारिक रूप देने में समर्थ होंगे।
सार्वजनीक मताधिकार की नींव पर इस प्रजातन्त्र संघ का संगठन होगा। इस
प्रजातन्त्र संघ में उन सब व्यवस्थाओं का अन्त कर दिया जायगा जिनसे किसी
एक मनुष्य द्वारा दूसरे का शोषण हो सकने का अवसर मिल सकता है।
विधान
संचालक समिति—इस दल के समस्त कार्य केन्द्रीय समिति द्वारा संचालित
होंगे। इस केन्द्रीय समिति में भारत के प्रत्येक प्रान्त के प्रतिनिधि रहेंगे। केन्द्रीय
समिति के सभी निश्चय सब सदस्यों की स्वीकृति से होंगे। केन्द्रीय समिति के
हाथ में अखंड अधिकार रहेंगे। विभिन्न प्रान्तों के समस्त कार्यों की जानकारी
इस समिति को रहेगी। विभिन्न प्रान्तों के कार्यों को समलक्ष्यीभूत करके अपने
उद्देश्य साधन में उन्हें परस्पर सम्बद्ध करना और उन पर नियन्त्रण रखना इस
केन्द्रीय समिति का मुख्य कार्य होगा। भारत के बाहर विदेशों में जो कुछ किया
जाएगा वह केन्द्रीय समिति के ही तत्त्वावधान में होगा .

क्रान्तिकारी दल और कम्यूनिस्ट / 309
प्रान्तीय संगठन
साधारणतया प्रत्येक प्रान्त में दल के पांच विभागों के पांच प्रतिनिधियों को
लेकर एक कार्यकारिणी समिति बनेगी। प्रान्त के समस्त कार्य इस समिति के
नियन्त्रण में होंगे। इस समिति के समस्त निर्णय सर्व सम्मति से निश्चित होगे।
दल के पांच विभाग

  1. प्रचार कार्य, 2. लोक संग्रह, 3. अर्थ संग्रह एव आतंकवाद, 4. अस्त्र-
    शस्त्र का संग्रह एवं उन्हें सुरक्षित रखने की व्यवस्था करना, 5. विदेशों से
    सम्बन्ध स्थापित करना।
  2. प्रचार कार्य—(क) प्रकाश्य एवं गुप्त मुद्रित पत्रों की सहायता से, (ख)
    व्यक्तिगत वार्तालाप की सहायता से, (ग) सार्वजनिक सभा इत्यादि द्वारा, (घ)
    कथा वार्ता अर्थात् धर्मविषयक व्याख्यानों द्वारा सुनियन्त्रित रूप से अपने उद्देश्य
    का प्रचार करना, और (ङ) मैजिक लैण्टर्न द्वारा।
  3. लोक संग्रह का काम जिलों के भार प्राप्त संचालक द्वारा होगा।
  4. साधारणतया स्वेच्छाकृत दान की सहायता से अर्थ-संग्रह किया जायगा
    परन्तु समय-समय पर बल प्रयोग द्वारा भी। विदेशी सरकार से अत्यन्त उत्पीड़ित
    होने पर इस दल का कर्त्तव्य होगा कि वह उसका उचित रूप से प्रतिशोध ले।
  5. इस दल के प्रत्येक सदस्य के पास शस्त्र पहुँचाने का भरसक प्रयत्न किया
    जाएगा परन्तु ये सब शस्त्र विभिन्न केन्द्रों में सुरक्षित रखे जाएँगे एवं प्रान्तीय
    कमेटी के नियन्त्रण में ही उनसे काम लिया जाएगा। इस विभाग के अधिनायक
    अथवा जिला संगठन कर्ता की बिना अनुमति एव बिना जानकारी के कोई भी
    अस्त्र इधर से उधर नही किया जाएगा।
  6. विदेशी विभाग—इस विभाग के समस्त कार्य केन्द्रीय समिति के ही
    नियन्त्रण एवं संचालन में होंगे।
    जिलों के संचालक और उनका कर्तव्य
    जिलों के सदस्यों का भार पूर्ण रूप से जिला आर्गेनाइजर पर रहेगा। अपने
    जिले के प्रत्येक अंश में जिला-संचालक इस दल की शाखाएँ स्थापित करने की
    यथाशक्ति चेष्टा करेगा। सफलतापूर्वक लोक-संग्रह के कार्य के लिए प्रत्येक
    संचालक अपने जिले के विभिन्न सार्वजनिक कार्यों एवं संस्थाओं के साथ घनिष्ठ
    रूप से सम्पर्क रखेगा। जिलों के संचालक गण सब प्रकार से प्रान्तीय कमेटी के
    अधीन रहकर काम करेंगे। प्रान्तीय कमेटी उनके सब कार्यों पर नियन्त्रण रखेगी
    एवं इस समिति के संचालन में ही जिलों के ये संचालकगण काम करेंगे। जिले
    के संचालक अपने सदस्यों को छोटी-छोटी टोलियों में विभाजित कर देंगे एवं इस
    बात पर ध्यान रखेंगे कि ये सब विभिन्न टोलियां एक-दूसरे से परिचित नहीं
    रहेंगी। जहाँ तक सम्भव हो सके एक प्रान्त के विभिन्न जिला संचालकगण भी

310 / बन्दी जीवन
आपस में एक-दूसरे के कामों से जानकारी नहीं रखेंगे। एवं यथासम्भव ये
संचालकगण आपस में एक-दूसरे की शक्ल से भी परिचित न रहेंगे और न वे
एक-दूसरे के नाम जानेंगे। अपने ऊपर वाले को बिना सूचना दिए किसी भी
जिला संचालक को यह अधिकार न होगा कि वह अपने स्थान को छोड़कर
कही और चला जाय
जिला संचालक की योग्यता

  1. विभिन्न स्वभाव एवं प्रकृति वाले मनुष्यों को साथ लेकर चलने और
    उनसे काम लेने की योग्यता प्रत्येक जिला संचालक में होनी चाहिए।
  2. प्रत्येक जिला संचालक में यह योग्यता होनी चाहिए कि वह आधुनिक
    काल की राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं को पूर्ण रीति से समझ
    सके और उन समस्याओं के साथ अपनी मातृभूमि का क्या और कहाँ तक सम्बन्ध
    है इसका भी उसे ज्ञान होना परमावश्यक है।
  3. प्रत्येक जिला संचालक में यह योग्यता होनी चाहिए कि भारतीय इतिहास
    की मर्मकथा को हृदयंगम करते हुए भारतीय सभ्यता की विशेषता को वह भली
    प्रकार समझ सके।
  4. मानव सभ्यता को स्वाधीन भारत की भी कुछ देन है इस बात पर जिला
    संचालकों की परिपूर्ण श्रद्धा होनी चाहिए। प्राच्य और पाश्चात्य सभ्यताओं में
    मानव की अध्यात्मिक एवं पार्थिव आवश्यकताओं में संगति लाना यह सब
    स्वाधीन भारत ही कर सकता है। मानव सभ्यता को स्वाधीन भारत की यही
    देन है।
  5. जिला संचालकों के लिए यह परमावश्यक है कि वे त्यागी एवं साहसी
    हों क्योंकि इन गुणों के बिना उनकी और सब प्रतिभाएँ व्यर्थ हो जाएँगी।
    प्रान्तीय एवं केन्द्रीय कमेटी
    इन कमेटियों के सदस्यों को उचित है कि वे इस बात पर विशेष ध्यान रखें
    कि अपनी संस्था के सदस्यों को इस बात में पूर्ण रीति से विकसित कर पाएँ एवं
    अपनी कार्यकुशलता का पूर्ण परिचय दे सकें। अन्यथा सम्भव है यह संस्था
    क्रमशः अधोगति को प्राप्त हो जाय।
    कार्यक्रम
    इस संस्था के समस्त कार्य दो रीतियों से होंगे, एक प्रकाश्य दूसरी गुप्त।
    प्रकाश्य कार्यक्रम
  6. पुस्तकालय, व्यायामशाला, सेवा-समिति इत्यादि के रूप में विभिन्न
    संस्थाओं की प्रतिष्ठा करना।

क्रान्तिकारी दल और कम्यूनिस्ट / 311
2 किसान एवं मजदूरों का संगठन करना। इस संस्था की ओर से योग्य
व्यक्तियों को कारखानों, रेलों एवं कोयले की खानों मे भेजा जाय जिससे वहाँ
के मजदूरों पर इनका प्रभाव जम जाय और वे मजदूरों के मन में यह बात अच्छी
तरह से बैठा सकें कि मजदूर वर्ग क्रान्ति के साधन-मात्र नहीं हैं वरन् मजदूर
वर्ग के मंगल के लिए ही क्रान्ति होगी। मजदूरों की तरह किसानों को भी
संगठित करना है।
3. प्रत्येक प्रान्त से एक-एक साप्ताहिक निकाला जाय और उसकी सहायता
से स्वाधीनता और प्रजातन्त्र की बातो का प्रचार किया जाय।
4. विदेशों मे क्या-क्या हो रहा है और उन देशों में विचारधाराएँ किन
दिशाओं की ओर प्रवाहित हो रही है इन सब बातों को समझाने के लिए छोटी-
छोटी पुस्तकें और पुस्तिकाएं प्रकाशित की जाएं।
5. कांग्रेस तथा अन्य सार्वजनिक कामों पर यथाशक्ति अपनी संस्था का
प्रभाव डाला जाय और उनसे यथासम्भव लाभ उठाया जाय।
गुप्त कार्यक्रम

  1. गुप्त रीति से छापेखाने की प्रतिष्ठा की जाय और उसकी सहायता से
    ऐसे साहित्य की सृष्टि की जाय जिसका प्रकाशन प्रकाश्य रूप से सम्भव नहीं
    है।
  2. ऐसे साहित्य का प्रचार करना ।
  3. समस्त देश मे जिलेवार इस संस्था की शाखाएं स्थापित करना होगा ।
  4. जैसे भी सम्भव हो अर्थ-संग्रह किया जाय ।
  5. विप्लव के अवसर पर अस्त्र-शस्त्रो के कारखानों एवं सेना परिचालन
    का कार्य-भार ग्रहण करने के योग्य बनने के लिए उपयुक्त व्यक्तियों को विदेशों
    में सामरिक एवं वैज्ञानिक शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से भेजा जाय।
  6. विदेशों से अस्त्र-शस्त्र मंगाना एव इस देश में उनके निर्माण का प्रयत्न
    करना।
  7. विदेशों में भारतीय विप्लवियों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध रखना एवं उनके
    साथ पूर्ण सहयोग से काम करना ।
  8. ब्रिटिश सेना में अपनी संस्था के सदस्यों को भरती कराना ।
  9. समय-समय पर प्रतिशोध के उद्देश्य से ऐसा काम करना जिससे जन-
    साधारण की सहानुभूति अपने सिद्धान्त की ओर आकृष्ट हो सके। इस प्रकार
    देश में एक ऐसे दल की सृष्टि होगी जिसकी सहानुभूति से हम लाभ उठा
    सकेंगे।

312 / बन्दी जीवन
सदस्यों के बारे में

  1. सदस्यगण इस संस्था के काम में अपना पूरा समय लगाएंगे, और
    आवश्यकता पड़ने पर अपने जीवन को संकट में डालने के लिए सदा प्रस्तुत
    रहेंगे । प्रत्येक प्रान्त के जिला संचालकगण ऐसे सदस्यों की भरती करेंगे ।
  2. प्रत्येक सदस्य जिला संचालक की आज्ञाओ का निर्विरोध पालन करेंगे ।
  3. प्रत्येक सदस्य अपनी मौलिक कार्यकुशलता को बढ़ाने का भरसक प्रयत्न
    करेगा । इस संस्था की सफलता एवं सार्थकता इस बात पर निर्भर है कि इसके
    सदस्यगण कितने उद्योगी, मौलिक रूप से कार्य-कुशल, एवं कर्तव्य-परायण हैं,
    प्रत्येक सदस्य इस बात को स्मरण रखेगा ।
  4. प्रत्येक सदस्य का आचरण ऐसा होना आवश्यक है जिससे इस संस्था के
    ध्येय पर किसी प्रकार की कालिमा न लग सके एवं उनके कार्यों से साक्षात् अथवा
    परोक्ष रूप में इस संस्था को कोई हानि न पहुँच सके ।
  5. जिला संचालक की अनुमति बिना इस संस्था का कोई भी सदस्य दूसरी
    संस्था का सदस्य नही बन सकेगा ।
  6. जिला संचालक को बिना सूचित किए कोई सदस्य अपना स्थान नही
    छोड़ेगा ।
  7. प्रत्येक सदस्य इस बात की चेष्टा करेगा कि जनसाधारण अथवा पुलिस
    की दृष्टि में इस सन्देह की उत्पत्ति न हो कि उसका क्रान्तिकारियों से कुछ
    सम्बन्ध है ।
  8. प्रत्येक सदस्य का इस बात का स्मरण रखना परम आवश्यक है कि
    उसका व्यक्तिगत व्यवहार या उससे एक भी गलती होने पर समस्त संस्था नष्ट
    हो सकती है ।
  9. कोई भी सदस्य अपने सार्वजनिक कार्य के बारे में जिला संचालक से
    किसी बात को नहीं छिपाएगा ।
  10. विश्वासघात करने पर सदस्य को संस्था से निकाल दिया जायगा या
    उसे मृत्यु दण्ड दिया जायगा । दण्ड देने का अधिकार पूर्णतया प्रान्तीय कमेटी को
    होगा ।
    हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन अथवा हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ की
    नियमावली एवं कार्यक्रम को यदि कोई विशेष ध्यानपूर्वक पढ़ेगा तो उसे अवश्य
    प्रतीत हो जायगा कि उत्तर भारत का विप्लव आन्दोलन प्रजातन्त्र एवं समाज-
    तन्त्र के सिद्धान्तों के आधार पर प्रतिष्ठित था । और यह केवल कल्पनामात्र ही
    न थी । अपने ध्येय को कार्य में परिणत करने के लिए भारत के चुने हुए युवक-
    वृन्द घर-गृहस्थी की सुख स्वच्छन्दता को, माता-पिता के स्नेह को, भाई-बहिनों
    के प्यार और मोह को, दुनियादारी के प्रलोभनों को तिलांजलि देकर अपने
    उद्देश्य-साधन के लिए फाँसी के तख्ते पर चढ़ने से अथवा आजन्म कालेपानी
    की काल-कोठरी के डर से कभी पीछे नहीं हटे ।

क्रान्तिकारी दल और कम्यूनिस्ट / 313
उस समय रूस में राज्य-क्रान्ति हो चुकी थी। कम्यूनिज्म की रक्ताभ अग्नि-
शिखा से समस्त संसार के उत्पीड़ितगण एवं बड़े-बड़े साम्राज्यों के संचालकगण
त्रस्त और अस्त व्यस्त हो चुके थे। तब से यूरोप और अमेरिका मे कम्यूनिज्म के
सिद्धान्त के आधार पर तुमुल आन्दोलन हो चुका था और उसका प्रचण्ड रूप दिन
पर दिन उग्र से उग्र होता जा रहा था। इन सब परिस्थितियो के प्रति ध्यान रखते
हुए यदि हम उत्तर भारत के विप्लव आन्दोलन की आलोचना करें तो यह
निश्चित रूप से विदित हो जाएगा कि यह आन्दोलनमात्र नितान्त बाल सुलभ
चपलता या अदूरदर्शी उद्दण्ड युवक-वृन्दो की विचारहीन धृष्टतामात्र न था
अथवा हताशाग्रस्त कार्यकर्त्ताओं का व्यर्थ आस्फालन मात्र न था। यदि यह कहा
जाय कि बड़े-बड़े शब्दो के व्यवहार से अथवा ऊँचे विचार के सिद्धान्त के उल्लेख-
मात्र से ही किसी आन्दोलन की सार्थकता का विचार हम नही कर सकते तो
इसके उत्तर मे केवल इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि ससार में जब कभी भी
किसी नूतन सिद्धान्त का प्रचार हुआ है तो उसका प्रारम्भ परिमित आकार में
एव प्रधान रूप से विचार के क्षेत्र मे ही सर्वप्रथम हुआ है। यहाँ तो इन विप्लवियों
ने भीषण प्रतिकूलता का सामना करते हुए समार की सबसे बड़ी साम्राज्यशाही
के प्रहार को सहते हुए भारतवासियों के शिथिल एवं अवसाद ग्रस्त मन को
अपने जीवन के बलिदान से सजीवित किया। सन् 1921 सत्याग्रह आन्दोलन के
अवसान होने के बाद से सन् 1930 तक भारत मे जो आन्दोलन होता रहा
महात्मा गांधी का उसमें कोई हाथ न था। उस समय यह क्रान्तिकारी आन्दोलन
ही ऐसा आन्दोलन था जो संसार के सामने उच्च स्वर से यह घोषित कर रहा था
कि भारत को स्वाधीन करने के लिए वहाँ के नवयुवकगण प्राणों की आहुति दे सकते
है। सन् 1929 की लाहौर काग्रेस के सभापति पं० जवाहरलालजी नेहरू के अभि-
भाषण को ध्यानपूर्वक पढने से सबको यह स्पष्ट विदित हो जायगा कि भारतीय
क्रान्तिकारी आन्दोलन का प्रभाव भारत के राष्ट्र नायकों पर कितने प्रबल रूप
से पड़ रहा था। यदि मैं भूल नही रहा हूँ तो पंडितजी ने अपने अभिभाषण में
यह भी कहने का साहस किया था कि भारत के युवक-वृन्दों के क्रान्तिकारी कार्यों
ने ही भारत के राष्ट्रीय आन्दोलम को जीवित रक्खा है।
यह बात सत्य हो सकती है कि हमारी संस्था के इम कार्यक्रम की सब बातें
सब सदस्यों की समझ में पूर्ण रूप से न आई हों। इस कार्यक्रम को पूर्ण रूप से
समझने के लिए दो बातों को जान लेने की विशेष आवश्यकता है। जिसने भार-
तीय सभ्यता की मर्म-कथा को भली-भाँति नही समझा उसके लिए यह सम्भव
नही कि कम्यूनिज्म के दोष को वह ठीक-ठीक समझ सके। इसलिए भारतीय सभ्यता
के प्रति जिसका प्रेम नही है और इस बात पर कि मानव-सभ्यता की उन्नति के
लिए भारतीय सभ्यता की विशेष उपयोगिता है जिसकी श्रद्धा नही है वह इस
कार्यक्रम को ठीक-ठीक नही समझ सकता तथा वह भी जिसने यह मान ही लिया
है कि कम्यूनिज्म का सिद्धान्त एक परिपूर्णांग अविभाज्य त्रुटिरहित समूचे तौर

314 / बन्दी जीवन
पर अभ्रांत है, वह भी हमारी संस्था के इस कार्यक्रम को पूर्ण रीति से नहीं ही
समझ सकता। कारण यह है कि उसको ऐसा प्रतीत होगा कि कम्यूनिज़म के पूरे
सिद्धान्त को इस कार्यक्रम में ज्यों-का-त्यों नहीं लिया गया है और इसलिए वह
समझेगा कि इसके बनाने वाले कम्यूनिज़म के सिद्धान्त को ठीक-ठीक नहीं समझे
हैं। जिस प्रकार एक ओर पण्डित जवाहरलालजी जैसे व्यक्ति ने क्रान्तिकारियो
को फॉसिस्ट कहा है उसी प्रकार दूसरी ओर कुछ नवीन मार्क्सवादी इस कार्य-
क्रम की आलोचना करते हुए आज यह कहते हैं कि इस कार्यक्रम के निर्माता ने
कम्यूनिज़म के सिद्धान्त को पूर्ण रूप से नहीं समझा था इसलिए श्रेणी संघर्ष के
बारे में वह कुछ नहीं लिख रहा है। इस प्रकार की टिप्पणी करने वालों में से मेरे
एक साथी श्री मन्मथनाथजी गुप्त भी हैं। आपने अपने कई लेखों में ऐसा लिखा
है कि श्री सान्यालजी ने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के कार्यक्रम को
तैयार किया था और उसमें कुछ साम्यवादी सिद्धान्तों को भी रक्खा था। लेकिन
सान्यालजी श्रेणी-संघर्ष के मर्म को समझ नहीं पाए थे। श्री मन्मथनाथजी अपने
को कामरेड कहते हैं। इसलिए उचित है कि मैं भी उन्हें कामरेड ही लिखूं। काम-
रेड मन्मथनाथजी समझते हैं कि हमारी संस्था के कार्यक्रम मे श्रेणियों के स्वार्थ
के विषय में कुछ नहीं कहा गया है। इसलिए वह समझते हे कि इस कार्यक्रम के
रचयिता के मन मे श्रेणी-संघर्ष एवं श्रेणी-स्वार्थ के बारे में कोई धारणा ही न थी।
लोगों की गिरफ्तारी के पहले मन्मथनाथजी ने इस बात के प्रति कभी भी
हमारी दृष्टि आकर्षित नही की। इसका कारण यह है कि इस समय मन्मथनाथजी
इस कार्यक्रम को भलीभांति समझे नहीं थे। कम्यूनिज़म को बिना समझे इस
कार्यक्रम की विशेषता को समझना किसी के लिए सम्भव भी नही है। मन्मथ-
नाथजी उस समय कम्यूनिज़म के सिद्धान्त से विशेष परिचित न थे। आज कामरेड
मन्मथनाथ कम्यूनिज़म को जिस प्रकार समझते हैं सम्भव है भविष्य में ठीक ऐसा
ही न समझें।
अपने पक्ष के समर्थन के लिए इस स्थान पर मैं दो-एक बातों के प्रति पाठकों
का ध्यान दिलाना चाहता हूँ। कम्यूनिज़म के सिद्धान्त में इतिहास की आर्थिक
व्याख्या का एक विशेष महत्त्वपूर्ण स्थान है। और इतिहास की आर्थिक व्याख्या
के मूल मे श्रेणी संघर्ष की धारणा प्राणस्वरूप वर्तमान है। जो इन सिद्धान्तों को
स्वीकार नही करता वह कट्टर पन्थियो की दृष्टि में कम्यूनिस्ट नही हो सकता।
मैंने विशेष ध्यानपूर्वक इन सब सिद्धान्तों को पढ़ा और इन पर गम्भीर रूप से
मनन किया लेकिन आज भी मैं इन सिद्धान्तों को ग्रहण नहीं कर पाया, तथापि
इस बात को मैंने स्वीकार कर लिया था कि स्वाधीन भारत के प्रजातन्त्र राज्य में
मजदूर एवं किसान वर्ग के स्वार्थ की उपयुक्त रीति से रक्षा होनी चाहिए। इति-
हास मे बार-बार यह देखा गया है कि मजदूर तथा किसान वर्ग की ही सहायता
से राज्य क्रान्तियाँ हुईं परन्तु क्रान्ति के बाद उसकी उपेक्षा हुई अतः क्रान्ति के बाद
राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के समय बार-बार उनके स्वार्थ की रक्षा पूरे तौर पर करनी

होगी। लेकिन इसके लिए यह आवश्यक नही है कि श्रेणी संघर्ष के मार्ग से ही हमें
आगे बढ़ना पड़े अथवा इतिहास की आर्थिक व्याख्या को हमें स्वीकार करना
पड़े।
गिरफ्तारी के समय मेरे पास एक छोटा-सा परचा पाया गया था जिसमें
इतिहास की आर्थिक व्याख्या की अपूर्णता को प्रमाणित करने के लिए मैंने कुछ
बातें संग्रह करके लिख रक्खी थी। यह परचा काकोरी षड्यन्त्र के मामले में
एक्जिविट् है। इतिहास की आर्थिक व्याख्या का खंडन करते हुए मै इस समय एक
ग्रन्थ लिख रहा हूँ। विचारविनिमय नामक मेरी एक पुस्तक के 'व्यक्ति, समाज और
मार्क्सवादी' शीर्षक लेख मे 23 पृष्ठो मे मैंने इतिहास की आर्थिक व्याख्या के कुछ
अंशो का खंडन किया है। और कुछ परिचित कम्यूनिस्टों से इस बात की भी
प्रार्थना की है कि वे इसका प्रत्युत्तर दे। लेकिन अभी तक इसका किसी ने कुछ भी
उत्तर नहीं दिया है। इसके अतिरिक्त अपनी संस्था के कार्यक्रम से भी कुछ अंश
उद्धृत करके ही मै यह दिखाने का प्रयत्न करूँगा कि वर्ग-ज्ञान की धारणा भी इस
कार्यक्रम मे विद्यमान है। देखिए इस कार्यक्रम के प्रकाश्य अंश का दूसरा नियम।
इस नियम से सबको विदित हो जाएगा कि मजदूर और किसान वर्ग के स्वार्थ के
ही लिए क्रान्ति की आयोजना की गई थी। इस स्थान पर श्रेणी-संघर्ष की नीति पर
विशद रूप से आलोचना करने की इच्छा नही है। इस विषय में मैंने कानपुर के
साप्ताहिक प्रताप मे एक काफ़ी बड़ा निबन्ध लिखा है। इस निबन्ध का शीर्षक है
'कम्यूनिस्ट दृष्टिकोण मे परिवर्तन।' मे समझता हूँ कि विप्लव आन्दोलन के
इतिहास मे कम्यूनिस्ट सिद्धान्त पर आलोचनात्मक विचार करने का यहाँ उपयुक्त
स्थान नहीं है, इसके लिए एक स्वतन्त्र ग्रन्थ ही लिखने की आवश्यकता है और
वह मे लिख रहा हूँ। यहाँ पर यह स्पष्ट निर्देश कर देना आवश्यक है कि हमारी
मस्था के कार्यक्रम मे कम्यूनिज्म के बहुत-से सिद्धान्त ग्रहण कर लिए गए थे और
जिन सिद्धान्तों को नही ग्रहण किया गया था वह इसलिए नही कि वे सब हमारी
समझ मे न आए थे बल्कि इसलिए कि उन्हें हमने जान-बूझकर अच्छी तरह से
सोच-विचार कर ही नही ग्रहण किया था। एक विशेष बात इस कार्यक्रम में यह
पाई जाएगी कि कम्यूनिस्ट दृष्टिकोण से इस कार्यक्रम को बनाए जाने पर भी
हमारी संस्था के नाम के साथ कम्यूनिज़्म अथवा सोशलिज्म का नाम नही जोड़ा
गया था। इस बात से यदि कोई यह समझे कि हम लोग सोशलिज्म से परिचित न
थे अथवा उसके सिद्धान्त को ग्रहण नही कर पाए थे तो वह भी उसकी भूल होगी।
हमने यह सोचा था कि सोशलिज्म के नाम से सम्भव है बहुत-से धनी व्यक्ति जो
उस समय हमारी सहायता कर रहे थे हमसे विमुख हो जाएँ। केवल इसी विचार
से हमने अपनी संस्था के नाम के साथ सोशलिज्म नाम नही लगाया था। पंजाब
के सरदार गुरुमुखसिंह के दल को देखकर मैंने भी यह चाहा था कि अपनी संस्था
का नाम सोशलिज्म से युक्त रक्खें। परन्तु मेरे परम मित्र अध्यापक जयचन्द्रजी के
परामर्श से ऐसा नही किया गया। हम लोगों की गिरफ्तारी के बाद सरदार भगत-

316 / बन्दी जीवन
सिंह ने इस संस्था के साथ सोशलिज्म का नाम भी लगा दिया था। लेकिन फिर
भी लक्ष्य करने की बात यह है कि इस नाम के अतिरिक्त इस कार्यक्रम में और कोई
परिवर्तन नही किया गया था। हमारी संस्था के ध्येय का वर्णन करते समय स्पष्ट
शब्दों मे कहा गया था कि हम भविष्य मे भारत की समाज व्यवस्था ऐसी बनाना
चाहते हैं जिसमे मनुष्य द्वारा मनुष्य पर किसी प्रकार का भी शोषण सम्भव न हो
सके। फिर इस संस्था की ओर से जो घोषणा-पत्र निकाला गया था उसमे यह भी
कहा गया था कि भारत की भावी राष्ट्र व्यवस्था मे बडे-बडे कारखाने और
उद्योग-धन्धों के व्यापार व्यक्ति के अधीन न रहकर राष्ट्र के अधीन रहेंगे जैसे
रेलवे, कोयले इत्यादि की खाने। जहाजो का बनाना अथवा चलाना इत्यादि की
व्यवस्था समाज के हाथ मे रहेगी। इस ध्येय के साथ यदि प्रकाश्य कार्यक्रम के
दूसरे नियम को देखे, तो निष्पक्ष पाठको को निसन्देह यह बात विदित हो
जाएगी कि कम्यूनिज्म के मूल सिद्धान्तों को हमने बहुत अंश मे ग्रहण कर लिया
था। प्रकाश्य आन्दोलन के दूसरे नियम को यदि ध्यानपूर्वक पढा जाय तो किसी
के मन में सन्देह का अवकाश नही रहेगा कि कम्यूनिस्ट सिद्धान्त के अन्तर्गत वर्ग-
बुद्धि की धारणा हमारी कल्पना एव संकल्प मे सक्रिय रूप से वर्तमान थी। वह
नियम यह है : 'किसान एव मजदूरो का सगठन करना। इस संस्था की ओर से
योग्य व्यक्तियो को कारखानो, रेलो एवं कोयले की खानो मे भेजा जाय जिससे
वहाँ के मजदूरों पर इनका प्रभाव जम जाय और वे मजदूरो के मन मे यह बात
अच्छी तरह से बैठा सके कि मजदूर वर्ग क्रान्ति के साधन मात्र नही हैं वरन् मजदूर
वर्ग के मंगल के लिए ही क्रान्ति होगी।' मजदूरों की तरह किसानो को भी सग-
ठित करना है। इस स्थान पर मैं पाठको की दृष्टि दो वाक्यो पर विशेष रूप से
आकर्षित करना चाहता हूँ। "मजदूर वर्ग क्रान्ति के साधन मात्र नही है वरन
मजदूर वर्ग के मंगल के लिए ही क्रान्ति होगी।" मेरी समझ मे समग्र इतिहास की
मर्म कथा जो कम्यूनिस्ट सिद्धान्त की प्राण-स्वरूपा है इन दो वाक्यों में व्यक्त हो
गई है। इसके अतिरिक्त हमारी संस्था की ओर से जो घोषणा-पत्र प्रकाशित किया
गया था उसमे दो-तीन ऐसे और वाक्य भी थे जिनसे साम्यवादी दृष्टिकोण
का स्पष्टीकरण होता है जैसे स्वाधीन भारत के भावी राज्य संविधान मे विचा-
रालयों (न्यायालयों) की व्यवस्था निःशुल्क की जाएगी। सार्वजनिक मताधिकार
होगा। प्रतियोगिता के स्थान पर सहयोगिता के आदर्श को ग्रहण किया जाएगा
क्योंकि इसी मे संसार का कल्याण है प्रतियोगिता में नही। इस क्रान्तिकारी दल का
ध्येय जितना राष्ट्रीय है उससे अधिक अन्तर्राष्ट्रीय होगा और इस हिसाब से यह
दल अतीत काल के गौरवमय युग के भारतीय ऋषिवृन्दों एवं आधुनिक काल के
वोल्शेविक रूस के पदांक का अनुसरण करेगा। इस स्थान पर एक और बात का
कहना अप्रासंगिक न होगा। हमारे आज के नवीन आलोक प्राप्त कुछ बन्धुगण
प्राचीन गौरवमय युग के भारतीय ऋषिवृन्दों के उल्लेख से नाक-भौंह सिकोड़ते हैं
और कहते हैं कि आधुनिक रूस के साथ प्राचीन ऋषियों का उल्लेख करना बुद्धि-

क्रान्तिकारी दल और कम्यूनिस्ट / 317
भ्रश का परिचय देना है, मानो विश्व-प्रीति का आदर्श वोलशेविक रूस की ही देन
है, मानो प्राचीन भारतीय आदर्श मे विश्व प्रीति की कोई कल्पना ही न थी।
पाठकगण स्वयं विचार करेंगे कि किसे बुद्धि-भ्रम हुआ है।
प० जवाहरलालजी का यह कहना कि भारतीय क्रान्तिकारी गण फॉसिस्ट
थे यह भी नितान्त भ्रमात्मक है। इम स्थान पर इस बात की भी आलोचना करना
अनावश्यक समझता हूँ ।

13
अनुशीलन समिति का सहयोग
देहली में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के बाद अनुशीलन समिति के नेतागणों
के कहने के अनुसार श्री योगेश चटर्जी मेरे पास बार-बार आते थे और मेरे साथ
मिलकर काम करने की प्रबल इच्छा प्रकट करते थे। अनुशीलन समिति के नेता-
गण यह नहीं चाहते थे कि मैं उनसे अलग होकर काम करूँ। लेकिन वे यह भी
नहीं चाहते थे कि बंगाल के क्रान्तिकारी आन्दोलन में मेरा वही स्थान हो जैसाकि
पंजाब और युक्त प्रान्त में था। इधर जादूगोपाल बाबू चाहते थे कि मैं पूर्ण रूप
से उन लोगों के साथ मिलकर काम करूँ। उस समय श्री यतीन्द्रनाथ मुकुर्जी,
श्री नरेन्द्र नाथ भट्टाचार्य (जो आजकल मानवेन्द्रनाथ राय के नाम से प्रसिद्ध हैं)
श्री जादूगोपाल मुकर्जी इत्यादि सब एक साथ मिलकर काम कर रहे थे। इसी
समय एक विख्यात पुस्तक विक्रेता के पास से एक प्रस्ताव आया था कि मैं उनकी
कलकत्ते की दूकान का कार्य-भार ग्रहण करूँ। जादूगोपाल बाबू भी चाहते थे कि
मैं कलकत्ते में रहूँ और मजदूर वर्ग का काम अपने हाथ में ले लूँ। मैंने इन सब
प्रस्तावों को स्वीकार भी कर लिया था लेकिन वे किताब वाले अन्त में मुझे दूकान
का कार्यभार देने से आनाकानी करने लगे। मैंने भी उनके मन की बात समझ
ली। उन्हें सन्देह हो गया था कि मै राजनैतिक मामलों के सम्पर्क में आकर उलझन
में पड़ जाऊँगा। सम्भवतः इसीलिए उन्होंने अपनी कलकत्ते की दूकान का कार्य-
भार मेरे ऊपर नहीं छोड़ा।
मेरा कलकत्ता जाना तो रह गया। इसके थोड़े ही दिन बाद ढाका से मेरे
एक परिचित बन्धु श्री गोविन्द चन्द्रकर मुझसे मिलने आए। इनके साथ मैं काले-
पानी में रह चुका था। विप्लव के कार्य करते समय गोविन्द बाबू को फरार रहना
पड़ा था। अन्त में पुलिस को गोविन्द बाबू और उनके एक साथी का पता चल
गया। सशस्त्र पुलिस ने इनका मकान घेर लिया। इनके लिए अब निकलने का
कोई रास्ता नहीं रहा। इन्होंने भी अपने अस्त्र उठाए और पुलिस वालों पर गोली
चलाते हुए निकल गए। पुलिस वालों ने भी पीछे से गोली चलाई। गोविन्द बाबू
और उनके साथी बुरी तरह से घायल होकर गिर पड़े। लेकिन ईश्वर की कृपा
से आज भी गोविन्द बाबू जीवित हैं। आज भी उनके शरीर में सीसे की गोली
वर्तमान है। और सम्भवतः इसके परिणाम में और कारागार की विशेष कठोरता

अनुशीलन समिति का सहयोग / 319
के कारण उनकी देह में कोढ़ के चिह्न दिखाई देने लगे हैं। ऐसे पुराने मित्र से मिल-
कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। आप ही से मुझे विदित हुआ कि अनुशीलन के एक
बड़े नेता श्री त्रैलोक्य नाथ चक्रवर्ती मुक्त हो गए हैं और वे मुझसे मिलने के लिए
बहुत उत्सुक हैं। मुझे ढाका ले जाने के लिए ही गोविन्द बाबू इलाहाबाद आए थे।
ढाका जाने-आने का खर्च भी मुझे नहीं उठाना पड़ा। मैं भी त्रैलोक्य बाबू से मिलने
के लिए विशेष इच्छुक था। इसके पहले मैं ढाका कभी नहीं गया था। जहाँ तक
मुझे स्मरण है मैं इलाहाबाद से कलकत्ता गया और वहाँ से ग्वालंद और ग्वालंद
से स्टीमर द्वारा नारायणगंज पहुँचा, फिर नारायणगंज से रेल पर चढ़कर ढाका
पहुँचा। कलकत्ता और ग्वालंद के बीच ट्रेन में एक घटना हुई जिसका उल्लेख करना
यहाँ पर अप्रासंगिक न होगा। मैं बेंच की एक ओर लेटा था और दूसरी ओर एक
अन्य व्यक्ति था। हम दोनों के बीच एक लम्बी-सी पटरी करीब डेढ़ हाथ ऊँची
लगी हुई थी। इस पटरी के कारण उस बेंच के दो हिस्से हो गए। बेंच की एक
ओर लेटा हुआ मनुष्य दूसरी ओर के व्यक्ति को नहीं देख सकता था। थोड़ी
देर में देखता क्या हूँ कि पटरी के ऊपर से एक टाँग और एक हाथ लटक रहा
है। यह बात मुझे कुछ अच्छी न लगी किसी का जूता किसी के शरीर पर लटके
यह किसे अच्छा लग सकता है। फिर भी जब तक मेरे शरीर को न छू दे या
छूने को न हो तब तक ट्रेन के सफर में मैं किसी को क्या कह सकता हूँ। थोड़ी
देर में देखता हूँ कि वह टाँग और भी लटकी और हाथ मेरे सिर पर आ पहुँचा।
मुझे बहुत क्रोध आया। पहले तो मैंने यह समझा कि यह सब निद्रित अवस्था की
बेहोशी है और मैंने अपनी टाँग से उसकी टाँग और हाथ से उसका हाथ हटा दिया।
लेकिन बार-बार वही हरकतें होती रहीं। अबकी बार मैं उठ बैठा तो देखा कि
एक ठिगना-सा जापानी जान-बूझकर यह हरकतें कर रहा था। इस जापानी को
देखकर मुझे कुछ कौतुक अनुभव हुआ और कुछ बुरा भी लगा। मैंने सोचा यह
विदेशी है और फिर एशियावासी। इसके साथ मेरा व्यवहार अच्छा होना चाहिए।
आस-पास के दूसरे बंगाली यात्री मेरी ही तरह हँस रहे थे और कौतुक अनुभव कर
रहे थे। अब मुझे याद नहीं कि वह जापानी अंग्रेजी जानता था या नहीं। बहर-
हाल मैंने उसे समझाया कि रात्रि का समय है तुम भी सो जाओ और मुझे भी
सोने दो। तुम विदेशी हो इसलिए तुम्हारा लिहाज कर रहा हूँ। जापानी हँसता
रहा। लेट जाने के बाद फिर वही बात। जापानी जान-बूझकर मुझे छेड़ रहा
था। मेरे शरीर पर जूता सहित टाँग फेंक रहा था और हाथ से मेरा मत्था छू
रहा था। मैंने बंगाली सहयात्रियों से कहा कि देखिए यह विदेशी होते हुए भी हम
से छेड़छाड़ करने में कुछ भी संकुचित नहीं होता। क्या हम भी विदेश जाकर
ऐसा साहस कर सकते हैं। जब भलमनसाहत के साथ उसे न समझा पाया तो मैंने
भी जैसे के साथ तैसे का व्यवहार किया। मैंने भी अपनी टाँग उसकी टाँग पर
और हाथ उसके हाथ पर चढ़ा दिया। मैंने भी वही हरकतें करनी शुरू कीं जैसी
कि वह कर रहा था। मैंने भी जब उसका सिर नोंचना शुरू किया तब वह शान्त

320 / बन्दी जीवन

हो गया। सम्भवतः वह जापानी देखना चाहता था कि हम भारतवासी कितने
गिरे हुए हैं। मेरे दिल में भावना बनी रही कि कही उसे जापान जाकर हम लोगों
की बुराई करने का मोका न मिले।
भोर होते ही ग्वालंद पहुँचे। इसके पहले मैं ग्वालंद कभी नही आया था।
वहाँ जो दृश्य मैंने देखा ऐसा दृश्य इसके पहले कभी नही देखा था। रेलवे लाइन
के लिए जितनी भूमि की आवश्यकता थी उसे छोड़कर चारों दिशाओं में पानी ही
पानी दिखाई दिया मानो एक समुद्र के बीच में आकर गाड़ी ठहर गई हो। जहाँ
पर गाड़ी आकर ठहरी उसके आसपास पानी में दो-चार झोपड़ियां इधर-उधर
दिखाई दी। एक टिकटघर है तो दूसरा मालगोदाम का दफ्तर, कही पानी अधिक
है कही कम। पछाहँ की ओर जैसे प्रत्येक बड़े स्टेशन पर गर्म पूड़ियां मिल सकती
हैं वैसे बंगाल में दो स्टेशनो को छोड़कर और कही नही मिल सकती। लेकिन
यहाँ के स्टेशनों पर बंगाली मिठाइयाँ मिल जाती हैं। ग्वालंद मे हम लोग स्टीमर
पर सवार हुए।
ढाका पहुँचकर जिस मकान मे आकर ठहरे वहाँ पर क्रान्तिकारी गण छिपे
हुए रहते थे एव जाली नोट बनाने के लिए नाना प्रकार के प्रयत्न कर रहे थे।
मुझे इस बात का पता था क्योकि अनुशीलन समिति के नेताओ के साथ इसके
पहले अर्थ-संग्रह के बारे मे मेरा बहुत-कुछ वाद-विवाद हो चुका था। मेरा कहना
था कि इस देश में रहकर जाली नोट बनाने मे हम लोग सफल नही हो सकते।
यदि नोट बनाना ही है तो विदेश मे जाकर आधुनिकतम वैज्ञानिक प्रणालियो द्वारा
बनाने की चेष्टा होनी चाहिए। मै किसी और उग्र कार्यक्रम पक्षपाती था। इस
मकान मे नोट बनाने के काम को देखकर कुछ आशा तो अवश्य उत्पन्न हुई और
उसके साथ मन मे कुछ ईर्ष्या का भी उद्रेक हुआ कि कही ये लोग बाजी न मार
ले जायें परन्तु नोट के एक-आध नमूने को देखकर मुझे यह भरोसा न हुआ कि ये
लोग नोट बनाने में कृतकार्य हो सकेंगे और अन्ततः यही बात हुई भी। नोट बने
लेकिन काम के नही थे।
अनुशीलन समिति के एक विशिष्ट नेता श्री त्रैलोक्य नाथ चक्रवर्ती से मेरी
खूब बातचीत हुई। मेरी शिकायतों का औचित्य उन्होने स्वीकार किया एव यह
वादा किया कि भविष्य मे ऐसी शिकायतो का अवसर आपको नही मिलेगा।
उनकी बातचीत से मुझे पूर्ण सन्तोष हुआ। ये बहुत सरल एवं सहज स्वभाव के
व्यक्ति हैं और जैसा कहते हैं वैसा ही करते हैं। अण्डमन मे रहते समय जिस
वीरता के साथ इन्होंने मेरा साथ दिया था अनुशीलन के और किसी व्यक्ति ने
ऐसा नही किया। अब मैं अनुशीलन समिति के साथ मिलकर काम करने को
तैयार हो गया।
अब यह तय हो गया कि मैं अनुशीलन समिति के साथ मिलकर काम करूँगा
और हमारे दोनों दलों के मिलने के बाद इसके नियन्त्रण मे मुझसे कुछ छिपाया न
जाएगा। त्रैलोक्य बाबू ने योगेश बाबू के लिए मेरे हाथ एक पत्र भेजा था और

अनुशीलन समिति का सहयोग / 321

उसमें यह लिखा गया था कि अब आगे तुम शचीन्द्र बाबू के नियन्त्रण में काम
करोगे। मैं चिट्ठी लेकर युक्तप्रान्त वापस चला आया। योगेशबाबू को जब मैंने
चिट्ठी दी तो वे बहुत प्रसन्न हुए। मैं भी एक अनुभवी कार्यकर्त्ता चाहता था।
इनको पाकर मैं भी बहुत प्रसन्न हुआ। इसके बाद उनके व्यवहार में मैंने कभी कोई
दोष नहीं पाया। सदा प्रफुल्लचित्त होकर वे मेरे कथनानुसार काम करने में तत्पर
रहते थे। उनके आचरण से मैंने यह कभी नहीं समझा कि वे अपने को किसी भिन्न
दल का समझते हों। अनुशीलन के दूसरे नेताओं से मतभेद होने पर भी योगेशबाबू
मेरे ही मत के अनुसार काम करते रहे। मैंने भी योगेशबाबू पर विश्वास करके
युक्तप्रान्त का कार्यभार उन पर ही छोड़ दिया था। स्वर्गीय राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी
योगेशबाबू से कहीं अधिक शिक्षित थे। योगेशबाबू से मिलने के बहुत पहले से ही
राजेन्द्रनाथ मेरे साथ काम कर रहे थे। वह मेरे विशेष मित्र भी थे। तथापि
पूर्ण रीति से अनुभवी न होने के कारण मैंने राजेन्द्रनाथ पर कार्य-भार न्यस्त न
करके योगेशबाबू पर न्यस्त करना ही उचित समझा। पंजाब का कार्यभार
अध्यापक जयचन्द्रजी पर न्यस्त था। योगेशबाबू से जयचन्द्रजी का अथवा किसी
अन्य व्यक्ति का परिचय मैंने नहीं कराया था। काम करने के सिलसिले में जो जो
व्यक्ति पंजाब से युक्तप्रान्त में आए थे। उन्ही से योगेशबाबू का परिचय हुआ था।
अनुशीलन के साथ सम्बन्ध स्थापित होने के बहुत पहले से ही सरदार भगतसिंह
युक्तप्रान्त में आ गए थे। त्रैलोक्यनाथ बाबू से चिट्ठी लाने के बाद मैंने यह
निर्णय किया कि योगेशबाबू बनारस छोड़कर कानपुर आकर ठहरें क्योंकि मैं यह
समझता था कि बनारस में राजेन्द्र लाहिड़ी हैं परन्तु कानपुर में मेरी अभिरुचि के
अनुसार कोई व्यक्ति न था। इसके पहले ही सरदार भगतसिंह को कानपुर में
ठहराया गया था। भगतसिंह भी बड़े योग्य व्यक्ति थे परन्तु अनुभवी न थे। इस
प्रकार जब योगेशबाबू एवं सरदार भगतसिंह दोनों व्यक्ति कानपुर में रहने लगे तो
ये एक-दूसरे से परिचित हो गए। अभी तक कानपुर में श्री राजकुमार, श्री विजय
कुमार तथा श्री बटुकेश्वर हमारे दल में सम्मिलित नहीं हुए थे। श्री सुरेशचन्द्र
भट्टाचार्य भी कानपुर में थे लेकिन सुरेशबाबू अनमने होकर हमारे दल का काम कर
रहे थे। योगेशबाबू के कानपुर आने पर ढंग से काम होने लगा। मैं था इलाहाबाद
में, राजेन्द्र लाहिड़ी थे बनारस में, और योगेशबाबू कानपुर में आ गए। लखनऊ में
हमारा कोई विश्वस्त और कार्यकुशल व्यक्ति न था। इलाहाबाद और कानपुर
वाले ही लखनऊ का काम भी संभाल रहे थे। धीरे-धीरे मैंने योगेशबाबू से युक्त-
प्रान्त के विभिन्न कार्यकर्ताओं का परिचय करा दिया। बनारस में योगेशबाबू के
दो-तीन मित्र थे यथा श्री मन्मथनाथ गुप्त, श्री शचीन्द्रनाथ बख्शी, श्री प्रणवेश
चटर्जी और स्वर्गीय चन्द्र शेखर आजाद।
योगेशबाबू के कानपुर चले जाने पर उनके बनारस के मित्रगण राजेन्द्रबाबू
के नियन्त्रण में काम करने लगे। मेरी गिरफ्तारी के पूर्व तक योगेशबाबू सरल
हृदय से मेरे साथ काम कर रहे थे। मेरे दिल में कभी भी यह सन्देह नहीं हुआ

322 / बन्दी जीवन
कि योगेशबाबू ने मुझसे कुछ भी छिपाया हो या हमारे दल में किसी प्रकार के भेद-
भाव की सृष्टि की हो। लेकिन उनके बनारस के अनुयायीगणों ने स्वर्गीय राजेन्द्र-
नाथ से सरल एवं उचित व्यवहार नहीं किया। इसका पता मुझे बहुत बाद को
चला था। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब तक हम दोनों गिरफ्तार नहीं हुए थे
हम लोग एक-दूसरे पर पूर्णतया निर्भर रहते थे। यह भी सत्य है कि आये दिन के
कार्यक्रम से योगेशबाबू को यह प्रतीत हो रहा था कि उत्तर भारत में हमारा कार्य-
क्रम बंगाल के कार्यक्रम से अधिक उपयोगी एवं अधिक फलप्रसू था। इतिहास के
पृष्ठों में यह बात आज प्रमाणित भी हो चुकी है कि क्रान्तिकारी आन्दोलन के
सम्पर्क में उत्तर भारत के दल की जितनी देन है उसकी तुलना में बंगाल की
अनुशीलन समिति की कुछ भी नहीं है। उत्तर भारत के कार्यक्रम से योगेशबाबू
इतने प्रभावित हुए थे कि वे बंगाल में जाकर अपने उद्योग से अर्थसंग्रह करके
युक्त प्रान्त में लाते थे। जहाँ तक मुझे स्मरण है बंगाल के नेताओं को इसका पता
न था। यदि पता होता तो वे भी अवश्य इसके हिस्सेदार बन जाते। योगेशबाबू
के आचरण से मैं कभी यह सन्देह नहीं कर पाया कि वे मुझे किसी अन्य दल का
नेता समझते थे और अपने को किसी दूसरे दल का अनुयायी। बात तो यह थी कि
बंगाल में भी अनुशीलन समिति के नेतागण सदा यही बताते थे कि सान्याल भी
अपने ही दल का आदमी है। उत्तर भारत के कार्यक्रम की बहुत-सी बातें मैं योगेश-
बाबू को बता दिया करता था जो कि मैंने बंगाल के नेताओं को नहीं बताई
थीं। इसका एक कारण था कि मैं योगेशबाबू से दिन-रात काम ले रहा था इस-
लिए उन्हें बहुत-सी बातों का बताना आवश्यक हो जाता था। दूसरा कारण यह
था कि बंगाल के नेताओं के साथ मिलने का अवसर मुझे कम प्राप्त होता था।
तीसरी बात यह थी कि हम लोगों में एक प्रतियोगिता की भावना रहती थी। चौथी
बात यह थी कि अनुशीलन के नेतागण अपनी सब बातें मुझे नहीं बताते थे। लेकिन
धीरे-धीरे हम एक-दूसरे को समझने लगे थे और क्रमशः हम लोगों में सहयोग
की भावना प्रबल हो रही थी।
मैं चाहता था कि पंजाब-शाखा की सहायता से काश्मीर और काबुल के
रास्ते से हम रूस और पश्चिम यूरोप तक पहुँचें, इन रास्तों से अस्त्र आदि के
मँगाने की व्यवस्था करें और विदेशस्थ भारतीय विप्लववादियों के साथ इन्ही
रास्तों से अपना योगसूत्र स्थापित करें। इस विषय की कोई बात न मैंने योगेश-
बाबू को बतलाई और न बंगाल के नेताओं को। इसी प्रकार युक्तप्रान्त के कार्य-
क्रम के बारे में भी सब बातें मैंने बंगाल के नेताओं को नहीं बताई थीं। आज
भी वे कार्यक्रम अपूर्ण रह गए हैं। इसलिए इन सब बातों का उल्लेख करना आज
उचित न होगा। इस स्थान पर तो मैं केवल इतना ही बताना चाहता हूँ कि उन
पिछले दिनों में योगेशबाबू के साथ मेरा क्या सम्बन्ध था।
मैं यह पहले ही बता चुका हूँ कि दिल्ली से लौटने के बाद मैं कानपुर गया।
कानपुर में पहला बोलशेविक कान्सप्रेसी (षड्यन्त्र) केस चल रहा था। इस