बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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सिंह ने इस संस्था के साथ सोशलिज्म का नाम भी लगा दिया था। लेकिन फिर
भी लक्ष्य करने की बात यह है कि इस नाम के अतिरिक्त इस कार्यक्रम में और कोई
परिवर्तन नही किया गया था। हमारी संस्था के ध्येय का वर्णन करते समय स्पष्ट
शब्दों मे कहा गया था कि हम भविष्य मे भारत की समाज व्यवस्था ऐसी बनाना
चाहते हैं जिसमे मनुष्य द्वारा मनुष्य पर किसी प्रकार का भी शोषण सम्भव न हो
सके। फिर इस संस्था की ओर से जो घोषणा-पत्र निकाला गया था उसमे यह भी
कहा गया था कि भारत की भावी राष्ट्र व्यवस्था मे बडे-बडे कारखाने और
उद्योग-धन्धों के व्यापार व्यक्ति के अधीन न रहकर राष्ट्र के अधीन रहेंगे जैसे
रेलवे, कोयले इत्यादि की खाने। जहाजो का बनाना अथवा चलाना इत्यादि की
व्यवस्था समाज के हाथ मे रहेगी। इस ध्येय के साथ यदि प्रकाश्य कार्यक्रम के
दूसरे नियम को देखे, तो निष्पक्ष पाठको को निसन्देह यह बात विदित हो
जाएगी कि कम्यूनिज्म के मूल सिद्धान्तों को हमने बहुत अंश मे ग्रहण कर लिया
था। प्रकाश्य आन्दोलन के दूसरे नियम को यदि ध्यानपूर्वक पढा जाय तो किसी
के मन में सन्देह का अवकाश नही रहेगा कि कम्यूनिस्ट सिद्धान्त के अन्तर्गत वर्ग-
बुद्धि की धारणा हमारी कल्पना एव संकल्प मे सक्रिय रूप से वर्तमान थी। वह
नियम यह है : 'किसान एव मजदूरो का सगठन करना। इस संस्था की ओर से
योग्य व्यक्तियो को कारखानो, रेलो एवं कोयले की खानो मे भेजा जाय जिससे
वहाँ के मजदूरों पर इनका प्रभाव जम जाय और वे मजदूरो के मन मे यह बात
अच्छी तरह से बैठा सके कि मजदूर वर्ग क्रान्ति के साधन मात्र नही हैं वरन् मजदूर
वर्ग के मंगल के लिए ही क्रान्ति होगी।' मजदूरों की तरह किसानो को भी सग-
ठित करना है। इस स्थान पर मैं पाठको की दृष्टि दो वाक्यो पर विशेष रूप से
आकर्षित करना चाहता हूँ। "मजदूर वर्ग क्रान्ति के साधन मात्र नही है वरन
मजदूर वर्ग के मंगल के लिए ही क्रान्ति होगी।" मेरी समझ मे समग्र इतिहास की
मर्म कथा जो कम्यूनिस्ट सिद्धान्त की प्राण-स्वरूपा है इन दो वाक्यों में व्यक्त हो
गई है। इसके अतिरिक्त हमारी संस्था की ओर से जो घोषणा-पत्र प्रकाशित किया
गया था उसमे दो-तीन ऐसे और वाक्य भी थे जिनसे साम्यवादी दृष्टिकोण
का स्पष्टीकरण होता है जैसे स्वाधीन भारत के भावी राज्य संविधान मे विचा-
रालयों (न्यायालयों) की व्यवस्था निःशुल्क की जाएगी। सार्वजनिक मताधिकार
होगा। प्रतियोगिता के स्थान पर सहयोगिता के आदर्श को ग्रहण किया जाएगा
क्योंकि इसी मे संसार का कल्याण है प्रतियोगिता में नही। इस क्रान्तिकारी दल का
ध्येय जितना राष्ट्रीय है उससे अधिक अन्तर्राष्ट्रीय होगा और इस हिसाब से यह
दल अतीत काल के गौरवमय युग के भारतीय ऋषिवृन्दों एवं आधुनिक काल के
वोल्शेविक रूस के पदांक का अनुसरण करेगा। इस स्थान पर एक और बात का
कहना अप्रासंगिक न होगा। हमारे आज के नवीन आलोक प्राप्त कुछ बन्धुगण
प्राचीन गौरवमय युग के भारतीय ऋषिवृन्दों के उल्लेख से नाक-भौंह सिकोड़ते हैं
और कहते हैं कि आधुनिक रूस के साथ प्राचीन ऋषियों का उल्लेख करना बुद्धि-