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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 408 में से

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पृष्ठ 314

312 / बन्दी जीवन
सदस्यों के बारे में

  1. सदस्यगण इस संस्था के काम में अपना पूरा समय लगाएंगे, और
    आवश्यकता पड़ने पर अपने जीवन को संकट में डालने के लिए सदा प्रस्तुत
    रहेंगे । प्रत्येक प्रान्त के जिला संचालकगण ऐसे सदस्यों की भरती करेंगे ।
  2. प्रत्येक सदस्य जिला संचालक की आज्ञाओ का निर्विरोध पालन करेंगे ।
  3. प्रत्येक सदस्य अपनी मौलिक कार्यकुशलता को बढ़ाने का भरसक प्रयत्न
    करेगा । इस संस्था की सफलता एवं सार्थकता इस बात पर निर्भर है कि इसके
    सदस्यगण कितने उद्योगी, मौलिक रूप से कार्य-कुशल, एवं कर्तव्य-परायण हैं,
    प्रत्येक सदस्य इस बात को स्मरण रखेगा ।
  4. प्रत्येक सदस्य का आचरण ऐसा होना आवश्यक है जिससे इस संस्था के
    ध्येय पर किसी प्रकार की कालिमा न लग सके एवं उनके कार्यों से साक्षात् अथवा
    परोक्ष रूप में इस संस्था को कोई हानि न पहुँच सके ।
  5. जिला संचालक की अनुमति बिना इस संस्था का कोई भी सदस्य दूसरी
    संस्था का सदस्य नही बन सकेगा ।
  6. जिला संचालक को बिना सूचित किए कोई सदस्य अपना स्थान नही
    छोड़ेगा ।
  7. प्रत्येक सदस्य इस बात की चेष्टा करेगा कि जनसाधारण अथवा पुलिस
    की दृष्टि में इस सन्देह की उत्पत्ति न हो कि उसका क्रान्तिकारियों से कुछ
    सम्बन्ध है ।
  8. प्रत्येक सदस्य का इस बात का स्मरण रखना परम आवश्यक है कि
    उसका व्यक्तिगत व्यवहार या उससे एक भी गलती होने पर समस्त संस्था नष्ट
    हो सकती है ।
  9. कोई भी सदस्य अपने सार्वजनिक कार्य के बारे में जिला संचालक से
    किसी बात को नहीं छिपाएगा ।
  10. विश्वासघात करने पर सदस्य को संस्था से निकाल दिया जायगा या
    उसे मृत्यु दण्ड दिया जायगा । दण्ड देने का अधिकार पूर्णतया प्रान्तीय कमेटी को
    होगा ।
    हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन अथवा हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ की
    नियमावली एवं कार्यक्रम को यदि कोई विशेष ध्यानपूर्वक पढ़ेगा तो उसे अवश्य
    प्रतीत हो जायगा कि उत्तर भारत का विप्लव आन्दोलन प्रजातन्त्र एवं समाज-
    तन्त्र के सिद्धान्तों के आधार पर प्रतिष्ठित था । और यह केवल कल्पनामात्र ही
    न थी । अपने ध्येय को कार्य में परिणत करने के लिए भारत के चुने हुए युवक-
    वृन्द घर-गृहस्थी की सुख स्वच्छन्दता को, माता-पिता के स्नेह को, भाई-बहिनों
    के प्यार और मोह को, दुनियादारी के प्रलोभनों को तिलांजलि देकर अपने
    उद्देश्य-साधन के लिए फाँसी के तख्ते पर चढ़ने से अथवा आजन्म कालेपानी
    की काल-कोठरी के डर से कभी पीछे नहीं हटे ।