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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 316, कुल 408 में से

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पृष्ठ 316

314 / बन्दी जीवन
पर अभ्रांत है, वह भी हमारी संस्था के इस कार्यक्रम को पूर्ण रीति से नहीं ही
समझ सकता। कारण यह है कि उसको ऐसा प्रतीत होगा कि कम्यूनिज़म के पूरे
सिद्धान्त को इस कार्यक्रम में ज्यों-का-त्यों नहीं लिया गया है और इसलिए वह
समझेगा कि इसके बनाने वाले कम्यूनिज़म के सिद्धान्त को ठीक-ठीक नहीं समझे
हैं। जिस प्रकार एक ओर पण्डित जवाहरलालजी जैसे व्यक्ति ने क्रान्तिकारियो
को फॉसिस्ट कहा है उसी प्रकार दूसरी ओर कुछ नवीन मार्क्सवादी इस कार्य-
क्रम की आलोचना करते हुए आज यह कहते हैं कि इस कार्यक्रम के निर्माता ने
कम्यूनिज़म के सिद्धान्त को पूर्ण रूप से नहीं समझा था इसलिए श्रेणी संघर्ष के
बारे में वह कुछ नहीं लिख रहा है। इस प्रकार की टिप्पणी करने वालों में से मेरे
एक साथी श्री मन्मथनाथजी गुप्त भी हैं। आपने अपने कई लेखों में ऐसा लिखा
है कि श्री सान्यालजी ने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के कार्यक्रम को
तैयार किया था और उसमें कुछ साम्यवादी सिद्धान्तों को भी रक्खा था। लेकिन
सान्यालजी श्रेणी-संघर्ष के मर्म को समझ नहीं पाए थे। श्री मन्मथनाथजी अपने
को कामरेड कहते हैं। इसलिए उचित है कि मैं भी उन्हें कामरेड ही लिखूं। काम-
रेड मन्मथनाथजी समझते हैं कि हमारी संस्था के कार्यक्रम मे श्रेणियों के स्वार्थ
के विषय में कुछ नहीं कहा गया है। इसलिए वह समझते हे कि इस कार्यक्रम के
रचयिता के मन मे श्रेणी-संघर्ष एवं श्रेणी-स्वार्थ के बारे में कोई धारणा ही न थी।
लोगों की गिरफ्तारी के पहले मन्मथनाथजी ने इस बात के प्रति कभी भी
हमारी दृष्टि आकर्षित नही की। इसका कारण यह है कि इस समय मन्मथनाथजी
इस कार्यक्रम को भलीभांति समझे नहीं थे। कम्यूनिज़म को बिना समझे इस
कार्यक्रम की विशेषता को समझना किसी के लिए सम्भव भी नही है। मन्मथ-
नाथजी उस समय कम्यूनिज़म के सिद्धान्त से विशेष परिचित न थे। आज कामरेड
मन्मथनाथ कम्यूनिज़म को जिस प्रकार समझते हैं सम्भव है भविष्य में ठीक ऐसा
ही न समझें।
अपने पक्ष के समर्थन के लिए इस स्थान पर मैं दो-एक बातों के प्रति पाठकों
का ध्यान दिलाना चाहता हूँ। कम्यूनिज़म के सिद्धान्त में इतिहास की आर्थिक
व्याख्या का एक विशेष महत्त्वपूर्ण स्थान है। और इतिहास की आर्थिक व्याख्या
के मूल मे श्रेणी संघर्ष की धारणा प्राणस्वरूप वर्तमान है। जो इन सिद्धान्तों को
स्वीकार नही करता वह कट्टर पन्थियो की दृष्टि में कम्यूनिस्ट नही हो सकता।
मैंने विशेष ध्यानपूर्वक इन सब सिद्धान्तों को पढ़ा और इन पर गम्भीर रूप से
मनन किया लेकिन आज भी मैं इन सिद्धान्तों को ग्रहण नहीं कर पाया, तथापि
इस बात को मैंने स्वीकार कर लिया था कि स्वाधीन भारत के प्रजातन्त्र राज्य में
मजदूर एवं किसान वर्ग के स्वार्थ की उपयुक्त रीति से रक्षा होनी चाहिए। इति-
हास मे बार-बार यह देखा गया है कि मजदूर तथा किसान वर्ग की ही सहायता
से राज्य क्रान्तियाँ हुईं परन्तु क्रान्ति के बाद उसकी उपेक्षा हुई अतः क्रान्ति के बाद
राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के समय बार-बार उनके स्वार्थ की रक्षा पूरे तौर पर करनी