बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुशीलन समिति का सहयोग / 319
के कारण उनकी देह में कोढ़ के चिह्न दिखाई देने लगे हैं। ऐसे पुराने मित्र से मिल-
कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। आप ही से मुझे विदित हुआ कि अनुशीलन के एक
बड़े नेता श्री त्रैलोक्य नाथ चक्रवर्ती मुक्त हो गए हैं और वे मुझसे मिलने के लिए
बहुत उत्सुक हैं। मुझे ढाका ले जाने के लिए ही गोविन्द बाबू इलाहाबाद आए थे।
ढाका जाने-आने का खर्च भी मुझे नहीं उठाना पड़ा। मैं भी त्रैलोक्य बाबू से मिलने
के लिए विशेष इच्छुक था। इसके पहले मैं ढाका कभी नहीं गया था। जहाँ तक
मुझे स्मरण है मैं इलाहाबाद से कलकत्ता गया और वहाँ से ग्वालंद और ग्वालंद
से स्टीमर द्वारा नारायणगंज पहुँचा, फिर नारायणगंज से रेल पर चढ़कर ढाका
पहुँचा। कलकत्ता और ग्वालंद के बीच ट्रेन में एक घटना हुई जिसका उल्लेख करना
यहाँ पर अप्रासंगिक न होगा। मैं बेंच की एक ओर लेटा था और दूसरी ओर एक
अन्य व्यक्ति था। हम दोनों के बीच एक लम्बी-सी पटरी करीब डेढ़ हाथ ऊँची
लगी हुई थी। इस पटरी के कारण उस बेंच के दो हिस्से हो गए। बेंच की एक
ओर लेटा हुआ मनुष्य दूसरी ओर के व्यक्ति को नहीं देख सकता था। थोड़ी
देर में देखता क्या हूँ कि पटरी के ऊपर से एक टाँग और एक हाथ लटक रहा
है। यह बात मुझे कुछ अच्छी न लगी किसी का जूता किसी के शरीर पर लटके
यह किसे अच्छा लग सकता है। फिर भी जब तक मेरे शरीर को न छू दे या
छूने को न हो तब तक ट्रेन के सफर में मैं किसी को क्या कह सकता हूँ। थोड़ी
देर में देखता हूँ कि वह टाँग और भी लटकी और हाथ मेरे सिर पर आ पहुँचा।
मुझे बहुत क्रोध आया। पहले तो मैंने यह समझा कि यह सब निद्रित अवस्था की
बेहोशी है और मैंने अपनी टाँग से उसकी टाँग और हाथ से उसका हाथ हटा दिया।
लेकिन बार-बार वही हरकतें होती रहीं। अबकी बार मैं उठ बैठा तो देखा कि
एक ठिगना-सा जापानी जान-बूझकर यह हरकतें कर रहा था। इस जापानी को
देखकर मुझे कुछ कौतुक अनुभव हुआ और कुछ बुरा भी लगा। मैंने सोचा यह
विदेशी है और फिर एशियावासी। इसके साथ मेरा व्यवहार अच्छा होना चाहिए।
आस-पास के दूसरे बंगाली यात्री मेरी ही तरह हँस रहे थे और कौतुक अनुभव कर
रहे थे। अब मुझे याद नहीं कि वह जापानी अंग्रेजी जानता था या नहीं। बहर-
हाल मैंने उसे समझाया कि रात्रि का समय है तुम भी सो जाओ और मुझे भी
सोने दो। तुम विदेशी हो इसलिए तुम्हारा लिहाज कर रहा हूँ। जापानी हँसता
रहा। लेट जाने के बाद फिर वही बात। जापानी जान-बूझकर मुझे छेड़ रहा
था। मेरे शरीर पर जूता सहित टाँग फेंक रहा था और हाथ से मेरा मत्था छू
रहा था। मैंने बंगाली सहयात्रियों से कहा कि देखिए यह विदेशी होते हुए भी हम
से छेड़छाड़ करने में कुछ भी संकुचित नहीं होता। क्या हम भी विदेश जाकर
ऐसा साहस कर सकते हैं। जब भलमनसाहत के साथ उसे न समझा पाया तो मैंने
भी जैसे के साथ तैसे का व्यवहार किया। मैंने भी अपनी टाँग उसकी टाँग पर
और हाथ उसके हाथ पर चढ़ा दिया। मैंने भी वही हरकतें करनी शुरू कीं जैसी
कि वह कर रहा था। मैंने भी जब उसका सिर नोंचना शुरू किया तब वह शान्त