बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रान्तिकारी दल और कम्यूनिस्ट / 303
जाय । गरीब और अमीर का भेद तभी मिट सकता है जब धनोत्पादन के साधन
व्यक्ति के हाथ में न रहकर समाज के हाथ में रहें । क्रान्ति के ही मार्ग से यह काम
बन सकता है अन्यथा नही । यदि आर्थिक दृष्टि से समाज मे साम्य नहीं रहता
तो उस समाज की प्रत्येक व्यवस्था एवं राज्य की नीति दूषित एवं अकल्याणमयी
हो जाती है ।
मैंने शान्त एवं एकाग्र चिन होकर उनकी सब बाते सुनी । आज तक
क्रान्तिकारी आन्दोलन के अनेकों इतिहास पढ़े, राष्ट्रों के उत्थान-पतन की भी
कितनी ही बातें पढ़ीं परन्तु कम्यूनिज्म के आर्थिक दृष्टिकोण से ऐतिहासिक
घटनावली को समझना नही सीखा । जीवन मे कुतुबुद्दीनजी की सहायता से
कम्यूनिज़्म का आर्थिक दृष्टिकोण के सिद्धान्त की मौलिकता देखकर मैं चकित
एवं विस्मयाविष्ट हो गया । आज तक मे इस सिद्धान्त से परिचित न था यह
जानकर मुझे बड़ी लज्जा एव क्षोभ हुआ । बातचीत होते-होते कभी इतिहास के
गहन प्रश्नो में, कभी अर्थनीति की विचित्र गति में, एवं अर्थनीति से धर्मनीति में
एवं धर्मनीति से अद्वैतवाद एव भौतिकवाद इत्यादि की गहन दार्शनिक अरण्यनी
मे हम घण्टो विचरते रहे । कुतुबुद्दीन साहब से मिलकर उनसे बातचीत करके मुझे
जैसे अत्यधिक प्रसन्नता हुई वैसे ही एक नवीन सिद्धान्त से परिचित होकर मैं
आश्चर्यान्वित एवं चकित भी हुआ । जीवन में एक और नवीन समस्या पैदा हो
गई । अभी तक वेदान्त के लपेटे में पड़कर ज्ञान और कर्म की विषम उलझन में
पड़ा था । फिर हिंसा और अहिंसा के द्वन्द्व मे पड़कर भी कुछ अशान्ति भुगती,
गांधीवाद और सत्याग्रह-मार्ग से सशस्त्र क्रान्तिकारी मार्ग की भीषण प्रति-
द्वन्द्विता के कारण जीवन में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, अब अन्त
में कम्यूनिज्म के भौतिकवाद, इतिहास की आर्थिक व्याख्या एवं राज की नवीन
परिकल्पना प्रसूत राजनैतिक एवं दार्शनिक उलझनो में पड़कर जीवन मे
एक नवीन एवं जटिल समस्या की उत्पत्ति हुई है ।
सम्पत्ति व्यक्ति के हाथ में न रहकर समाज के हाथ में रहे इसके मूल में
जो महान् आदर्श है उसे में अस्वीकार नहीं कर सका । परन्तु धन उत्पादन के
साधन ही सम्पत्ति है यह मे देहली मे भली भाँति नहीं समझ पाया था । इस
सम्बन्ध में सर्वप्रथम मेरे मन में इस भावना की उन्नति हुई कि में इस महान्
आदर्श का अनुयायी बनने योग्य न था। मेरे मन में वही संन्यासी का आदर्श
दिखाई दिया और मैने यह अनुभव किया कि मैं इसके लिए उपयुक्त न
था । इसके साथ-साथ मैं इस बात को भी स्वीकार नहीं कर पाया कि आर्थिक
व्यवस्था के कारण ही समाज में हर प्रकार की उन्नति हो सकती है। जब मैने
कुतुबुद्दीन माहब को वेदान्त के मूलतत्त्व के विषय में कुछ समझाना प्रारम्भ
किया तो आपने यह स्वीकार किया कि ये सब बातें दार्शनिक विचारधारा में
शोभा पा सकती हैं। एवं सम्भव है इनकी उपयोगिता भी हो लेकिन धर्म के
प्रति कम्यूनिज्म का जो आक्रमण है उससे इन दार्शनिक विचारों का विशेष