बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहोगी। लेकिन इसके लिए यह आवश्यक नही है कि श्रेणी संघर्ष के मार्ग से ही हमें
आगे बढ़ना पड़े अथवा इतिहास की आर्थिक व्याख्या को हमें स्वीकार करना
पड़े।
गिरफ्तारी के समय मेरे पास एक छोटा-सा परचा पाया गया था जिसमें
इतिहास की आर्थिक व्याख्या की अपूर्णता को प्रमाणित करने के लिए मैंने कुछ
बातें संग्रह करके लिख रक्खी थी। यह परचा काकोरी षड्यन्त्र के मामले में
एक्जिविट् है। इतिहास की आर्थिक व्याख्या का खंडन करते हुए मै इस समय एक
ग्रन्थ लिख रहा हूँ। विचारविनिमय नामक मेरी एक पुस्तक के 'व्यक्ति, समाज और
मार्क्सवादी' शीर्षक लेख मे 23 पृष्ठो मे मैंने इतिहास की आर्थिक व्याख्या के कुछ
अंशो का खंडन किया है। और कुछ परिचित कम्यूनिस्टों से इस बात की भी
प्रार्थना की है कि वे इसका प्रत्युत्तर दे। लेकिन अभी तक इसका किसी ने कुछ भी
उत्तर नहीं दिया है। इसके अतिरिक्त अपनी संस्था के कार्यक्रम से भी कुछ अंश
उद्धृत करके ही मै यह दिखाने का प्रयत्न करूँगा कि वर्ग-ज्ञान की धारणा भी इस
कार्यक्रम मे विद्यमान है। देखिए इस कार्यक्रम के प्रकाश्य अंश का दूसरा नियम।
इस नियम से सबको विदित हो जाएगा कि मजदूर और किसान वर्ग के स्वार्थ के
ही लिए क्रान्ति की आयोजना की गई थी। इस स्थान पर श्रेणी-संघर्ष की नीति पर
विशद रूप से आलोचना करने की इच्छा नही है। इस विषय में मैंने कानपुर के
साप्ताहिक प्रताप मे एक काफ़ी बड़ा निबन्ध लिखा है। इस निबन्ध का शीर्षक है
'कम्यूनिस्ट दृष्टिकोण मे परिवर्तन।' मे समझता हूँ कि विप्लव आन्दोलन के
इतिहास मे कम्यूनिस्ट सिद्धान्त पर आलोचनात्मक विचार करने का यहाँ उपयुक्त
स्थान नहीं है, इसके लिए एक स्वतन्त्र ग्रन्थ ही लिखने की आवश्यकता है और
वह मे लिख रहा हूँ। यहाँ पर यह स्पष्ट निर्देश कर देना आवश्यक है कि हमारी
मस्था के कार्यक्रम मे कम्यूनिज्म के बहुत-से सिद्धान्त ग्रहण कर लिए गए थे और
जिन सिद्धान्तों को नही ग्रहण किया गया था वह इसलिए नही कि वे सब हमारी
समझ मे न आए थे बल्कि इसलिए कि उन्हें हमने जान-बूझकर अच्छी तरह से
सोच-विचार कर ही नही ग्रहण किया था। एक विशेष बात इस कार्यक्रम में यह
पाई जाएगी कि कम्यूनिस्ट दृष्टिकोण से इस कार्यक्रम को बनाए जाने पर भी
हमारी संस्था के नाम के साथ कम्यूनिज़्म अथवा सोशलिज्म का नाम नही जोड़ा
गया था। इस बात से यदि कोई यह समझे कि हम लोग सोशलिज्म से परिचित न
थे अथवा उसके सिद्धान्त को ग्रहण नही कर पाए थे तो वह भी उसकी भूल होगी।
हमने यह सोचा था कि सोशलिज्म के नाम से सम्भव है बहुत-से धनी व्यक्ति जो
उस समय हमारी सहायता कर रहे थे हमसे विमुख हो जाएँ। केवल इसी विचार
से हमने अपनी संस्था के नाम के साथ सोशलिज्म नाम नही लगाया था। पंजाब
के सरदार गुरुमुखसिंह के दल को देखकर मैंने भी यह चाहा था कि अपनी संस्था
का नाम सोशलिज्म से युक्त रक्खें। परन्तु मेरे परम मित्र अध्यापक जयचन्द्रजी के
परामर्श से ऐसा नही किया गया। हम लोगों की गिरफ्तारी के बाद सरदार भगत-