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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 408 में से

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पृष्ठ 308

[Header] 306 / बन्दी जीवन

के बारे में भारतवर्ष में बहुत-सी भ्रान्त धारणाएँ फैली हुई हैं। हमारे देश के
बहुत से गण्यमान्य लब्ध-प्रतिष्ठ नेतागण भारतीय विप्लव आन्दोलन को बच्चों का
खेल समझते आए हैं। भारतवासी प्रायः यह समझते आए हैं कि भारतीय विप्लव
आन्दोलन का केवल यही अर्थ है कि समय-समय पर कुछ अंग्रेज़ और पुलिस
अफसरों को गोली से मारना अथवा धनी देशवासियों के घरों में डाका डालकर
अर्थ संग्रह करना। हमारे देशवासी आज भी नहीं समझ पाए हैं कि क्रान्ति के
मार्ग से भारत को स्वाधीन करने की चेष्टा युक्तिसंगत एवं ऐतिहासिक परम्परा
के आधार पर समर्थन योग्य है। इस नासमझी के मूल में यथार्थ बात तो यह है
कि भारतवासी आज भी सच्चे हृदय से भारत को स्वाधीन करने के लिए कुछ
नहीं करना चाहते हैं। भारत के किसी भी राष्ट्रनेता की मनोवृत्ति मेजिनी,
गेरीवाल्डी, के बूर, डि वैलेरा अथवा किसी इतिहास प्रसिद्ध विप्लवी नेता की
तरह नहीं है। यही कारण है कि भारत के नेतागण यहाँ के विप्लव आन्दोलन
को यथार्थ रूप में नहीं समझ पाए हैं और दूसरी बात यह भी है कि भारतीय
विप्लवी गणों ने स्वयं अपने सिद्धान्तो का प्रचार कुछ नहीं किया। भारत के
विप्लवियों ने प्रकाश्य आन्दोलन में भाग लेकर ज्वालामयी प्राण-स्पर्शी भाषा
द्वारा एवं अलंघ्य युक्ति के मार्ग से जन-साधारण को अपनी ओर आकर्षित करने
की यथार्थ चेष्टा नहीं की।
अण्डमन में रहते समय ही मैंने यह अनुभव किया था कि भारत में क्रान्ति-
कारी आन्दोलन की ओर से ऐसे साहित्य की सृष्टि करने की परम आवश्यकता
है। ऐसे साहित्य की सृष्टि तभी हो सकती है जब उपयुक्त शिक्षित वर्ग क्रान्ति-
कारी आन्दोलन में भाग ले। परन्तु भारत के दुर्भाग्य से यहाँ के प्रतिभावान,
विचारशील, साहित्यिक रुचि सम्पन्न, मननशील और अध्ययनशील व्यक्तियों
में से अधिकांश ने विप्लव आन्दोलन में भाग नहीं लिया। इसी कारण भारतीय
क्रान्तिकारी आन्दोलन की ओर से उपयुक्त साहित्य की सृष्टि नहीं हुई। किसी
आन्दोलन की सफलता के लिए उसके दृष्टिकोण से उपयुक्त साहित्य की सृष्टि
करना सर्वप्रथम एवं परम आवश्यक बात है। परन्तु यह परम दुःख की बात है
कि इस देश में भारतीय विप्लव आन्दोलन के सम्बन्ध में किसी भी कहने योग्य
साहित्य की सृष्टि नहीं हुई। सन् 1919 ई० से सत्याग्रह आन्दोलन को बीस वर्ष
हो गए पर इस बीच में भी साहित्य की सृष्टि नहीं हुई। यूरोप अमेरिका अथवा
चीन के किसी भी आन्दोलन को ले लीजिए उन देशों में जितने प्रकार के
साहित्यों की सृष्टि हुई है उसका शतांश भी हमारे देश में नहीं हुई। कम्यूनिस्ट
आन्दोलन के सम्बन्ध में इतनी पुस्तकें, पुस्तिकाएँ एवं सामयिक पत्रिकाएँ
प्रकाशित हुई हैं कि उनसे संसार-भर में विप्लव मचा हुआ है। साम्राज्यशाही
राष्ट्रों के निकट कम्यूनिस्टों की एक साधारण पुस्तिका मशीनगन से भी अधिक
भीतिप्रद एवं आपत्तिजनक समझी जाती है। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम भाग
में बंग भाषा में मेजिनी, गैरी वाल्डी इत्यादि प्रसिद्ध राष्ट्र विप्लवियों के जीवन