बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रान्तिकारी दल और कम्यूनिस्ट / 313
उस समय रूस में राज्य-क्रान्ति हो चुकी थी। कम्यूनिज्म की रक्ताभ अग्नि-
शिखा से समस्त संसार के उत्पीड़ितगण एवं बड़े-बड़े साम्राज्यों के संचालकगण
त्रस्त और अस्त व्यस्त हो चुके थे। तब से यूरोप और अमेरिका मे कम्यूनिज्म के
सिद्धान्त के आधार पर तुमुल आन्दोलन हो चुका था और उसका प्रचण्ड रूप दिन
पर दिन उग्र से उग्र होता जा रहा था। इन सब परिस्थितियो के प्रति ध्यान रखते
हुए यदि हम उत्तर भारत के विप्लव आन्दोलन की आलोचना करें तो यह
निश्चित रूप से विदित हो जाएगा कि यह आन्दोलनमात्र नितान्त बाल सुलभ
चपलता या अदूरदर्शी उद्दण्ड युवक-वृन्दो की विचारहीन धृष्टतामात्र न था
अथवा हताशाग्रस्त कार्यकर्त्ताओं का व्यर्थ आस्फालन मात्र न था। यदि यह कहा
जाय कि बड़े-बड़े शब्दो के व्यवहार से अथवा ऊँचे विचार के सिद्धान्त के उल्लेख-
मात्र से ही किसी आन्दोलन की सार्थकता का विचार हम नही कर सकते तो
इसके उत्तर मे केवल इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि ससार में जब कभी भी
किसी नूतन सिद्धान्त का प्रचार हुआ है तो उसका प्रारम्भ परिमित आकार में
एव प्रधान रूप से विचार के क्षेत्र मे ही सर्वप्रथम हुआ है। यहाँ तो इन विप्लवियों
ने भीषण प्रतिकूलता का सामना करते हुए समार की सबसे बड़ी साम्राज्यशाही
के प्रहार को सहते हुए भारतवासियों के शिथिल एवं अवसाद ग्रस्त मन को
अपने जीवन के बलिदान से सजीवित किया। सन् 1921 सत्याग्रह आन्दोलन के
अवसान होने के बाद से सन् 1930 तक भारत मे जो आन्दोलन होता रहा
महात्मा गांधी का उसमें कोई हाथ न था। उस समय यह क्रान्तिकारी आन्दोलन
ही ऐसा आन्दोलन था जो संसार के सामने उच्च स्वर से यह घोषित कर रहा था
कि भारत को स्वाधीन करने के लिए वहाँ के नवयुवकगण प्राणों की आहुति दे सकते
है। सन् 1929 की लाहौर काग्रेस के सभापति पं० जवाहरलालजी नेहरू के अभि-
भाषण को ध्यानपूर्वक पढने से सबको यह स्पष्ट विदित हो जायगा कि भारतीय
क्रान्तिकारी आन्दोलन का प्रभाव भारत के राष्ट्र नायकों पर कितने प्रबल रूप
से पड़ रहा था। यदि मैं भूल नही रहा हूँ तो पंडितजी ने अपने अभिभाषण में
यह भी कहने का साहस किया था कि भारत के युवक-वृन्दों के क्रान्तिकारी कार्यों
ने ही भारत के राष्ट्रीय आन्दोलम को जीवित रक्खा है।
यह बात सत्य हो सकती है कि हमारी संस्था के इम कार्यक्रम की सब बातें
सब सदस्यों की समझ में पूर्ण रूप से न आई हों। इस कार्यक्रम को पूर्ण रूप से
समझने के लिए दो बातों को जान लेने की विशेष आवश्यकता है। जिसने भार-
तीय सभ्यता की मर्म-कथा को भली-भाँति नही समझा उसके लिए यह सम्भव
नही कि कम्यूनिज्म के दोष को वह ठीक-ठीक समझ सके। इसलिए भारतीय सभ्यता
के प्रति जिसका प्रेम नही है और इस बात पर कि मानव-सभ्यता की उन्नति के
लिए भारतीय सभ्यता की विशेष उपयोगिता है जिसकी श्रद्धा नही है वह इस
कार्यक्रम को ठीक-ठीक नही समझ सकता तथा वह भी जिसने यह मान ही लिया
है कि कम्यूनिज्म का सिद्धान्त एक परिपूर्णांग अविभाज्य त्रुटिरहित समूचे तौर