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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 312, कुल 408 में से

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पृष्ठ 312

310 / बन्दी जीवन
आपस में एक-दूसरे के कामों से जानकारी नहीं रखेंगे। एवं यथासम्भव ये
संचालकगण आपस में एक-दूसरे की शक्ल से भी परिचित न रहेंगे और न वे
एक-दूसरे के नाम जानेंगे। अपने ऊपर वाले को बिना सूचना दिए किसी भी
जिला संचालक को यह अधिकार न होगा कि वह अपने स्थान को छोड़कर
कही और चला जाय
जिला संचालक की योग्यता

  1. विभिन्न स्वभाव एवं प्रकृति वाले मनुष्यों को साथ लेकर चलने और
    उनसे काम लेने की योग्यता प्रत्येक जिला संचालक में होनी चाहिए।
  2. प्रत्येक जिला संचालक में यह योग्यता होनी चाहिए कि वह आधुनिक
    काल की राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं को पूर्ण रीति से समझ
    सके और उन समस्याओं के साथ अपनी मातृभूमि का क्या और कहाँ तक सम्बन्ध
    है इसका भी उसे ज्ञान होना परमावश्यक है।
  3. प्रत्येक जिला संचालक में यह योग्यता होनी चाहिए कि भारतीय इतिहास
    की मर्मकथा को हृदयंगम करते हुए भारतीय सभ्यता की विशेषता को वह भली
    प्रकार समझ सके।
  4. मानव सभ्यता को स्वाधीन भारत की भी कुछ देन है इस बात पर जिला
    संचालकों की परिपूर्ण श्रद्धा होनी चाहिए। प्राच्य और पाश्चात्य सभ्यताओं में
    मानव की अध्यात्मिक एवं पार्थिव आवश्यकताओं में संगति लाना यह सब
    स्वाधीन भारत ही कर सकता है। मानव सभ्यता को स्वाधीन भारत की यही
    देन है।
  5. जिला संचालकों के लिए यह परमावश्यक है कि वे त्यागी एवं साहसी
    हों क्योंकि इन गुणों के बिना उनकी और सब प्रतिभाएँ व्यर्थ हो जाएँगी।
    प्रान्तीय एवं केन्द्रीय कमेटी
    इन कमेटियों के सदस्यों को उचित है कि वे इस बात पर विशेष ध्यान रखें
    कि अपनी संस्था के सदस्यों को इस बात में पूर्ण रीति से विकसित कर पाएँ एवं
    अपनी कार्यकुशलता का पूर्ण परिचय दे सकें। अन्यथा सम्भव है यह संस्था
    क्रमशः अधोगति को प्राप्त हो जाय।
    कार्यक्रम
    इस संस्था के समस्त कार्य दो रीतियों से होंगे, एक प्रकाश्य दूसरी गुप्त।
    प्रकाश्य कार्यक्रम
  6. पुस्तकालय, व्यायामशाला, सेवा-समिति इत्यादि के रूप में विभिन्न
    संस्थाओं की प्रतिष्ठा करना।