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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 408 में से

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पृष्ठ 307

क्रान्तिकारी दल और कम्यूनिस्ट : 305

जान-बूझकर सिद्धान्त के विचार से, युक्ति की कसौटी पर उनके निर्बल प्रमाणित
होने के कारण ही उन्हें स्वीकार नही किया था। यूरोप के आधुनिक इतिहास की
पर्यालोचना करने से यह प्रमाणित हो रहा है कि हमारा दृष्टिकोण सत्य है।
परानुकरण वृत्ति के कारण जो लोग सौ वर्ष से पहले के सिद्धान्त को अपरिवर्तित
रूप मे ज्यों का त्यों आज भी देश-काल-पात्र-भेद का विचार न करके जैसे का
तैसा ग्रहण करने को लालायित हैं वे भूल जाते हैं कि गत शत वर्ष की प्रबल चेष्टा
के बाद भी आज यूरोप अथवा अमेरिका मे कोरे मार्क्सवाद की विजय नही हुई
बल्कि यूरोप के कम्यूनिस्टो को अपनी नीति में बहुत परिवर्तन करना पड़ा है।
श्रेणी सघर्ष के स्थान पर आज सयुक्त मोर्चा आदि के नारे बुलन्द हो रहे हैं।
ध्यान दने योग्य एक और बात यह है कि इंग्लैड, फ्रांस तथा अमेरिका मे कम्यू-
निस्टो के साथ दूसरे प्रगतिशील दलों ने सहयोग करना स्वीकार नही किया।
कम्यूनिस्टो के सयुक्त मोर्चे के प्रयत्न विफल हो रहे हैं।
देहली से लौटकर मैं आगरा, मथुरा इत्यादि होकर कानपुर आया था।
कानपुर आकर एक सज्जन के यहाँ ठहरा। इनका नाम श्री सत्यभक्तजी था।
आप हिन्दी के एक परिचित लेखक हैं। मुझमे कम्यूनिज्म के सिद्धान्त से भली
प्रकार परिचित होने की प्रबल इच्छा उत्पन्न हुई थी।
सत्यभक्तजी कम्यूनिज्म के सिद्धान्त के आधार पर युक्त प्रान्त मे एक दल
संगठित करना चाहते थे। कम्यूनिज्म का एक मूल सिद्धान्त है कि विप्लव के
ही मार्ग से सफलता प्राप्त की जा सकती है अन्यथा नही। हम लोग यथार्थ में
विप्लवी थे। सत्यभक्तजी विप्लव के मार्ग पर नही चलना चाहते थे। लेकिन
उनके पास कम्यूनिज्म के विषय की कुछ अच्छी-अच्छी पुस्तकें थी। उन्हें मैने
पढ़ डाला। कम्यूनिज्म को समझने के लिए मुझे 'बुखारिन' लिखित 'ए० बी०
सी० आफ कम्यूनिज्म' नामक पुस्तक से बड़ी सहायता मिली। लेनिन लिखित
तीन-चार पुस्तकें भी पढ़ डालीं। इन सब पुस्तकों में से तीन-चार पुस्तकें विशेष
उल्लेख योग्य है यथा 'प्रालिटेरियन रेवल्यूशन', 'स्टेट ऐण्ड रेवल्यूशन', 'फ़ाम
युटोपिया टु माइन्स', 'फोर्थ एण्ड सिक्सथ रिपोर्ट आफ दी कम्यूनिस्ट इण्टर
नेशनल काग्रेस' इत्यादि। इसके अतिरिक्त मानवेन्द्रराय द्वारा सम्पादित बहुत-
से पर्चे पढ़ने का भी अवसर मिला। इस प्रकार सन् 1924 मे ही कम्यूनिज्म के
सिद्धान्त के बारे मे मैने बहुत कुछ समझ लिया था। सत्यभक्तजी से मेरा बहुत
वार्तालाप भी हुआ, तर्क-वितर्क हुए, एव भौतिकवाद और आत्मवाद, इतिहास
की आर्थिक व्याख्या एव श्रेणी संघर्ष इत्यादि प्रश्नो को लेकर दिन-दिन-भर तक
आलोचनाएं हुईं।
पंजाब के सरदार गुरुमुखसिंह जी से बातचीत होने के बाद मैने अपने दल के
लिए एक लिखित सगठन और कार्यक्रम की योजना तैयार करना आवश्यक
समझा और कानपुर मे आकर यह योजना तैयार की। इसके बारे में विशद रूप
और विस्तार से लिखने की आवश्यकता है। कारण यह कि क्रान्तिकारी आन्दोलन