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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 408 में से

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पृष्ठ 320

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अनुशीलन समिति का सहयोग
देहली में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के बाद अनुशीलन समिति के नेतागणों
के कहने के अनुसार श्री योगेश चटर्जी मेरे पास बार-बार आते थे और मेरे साथ
मिलकर काम करने की प्रबल इच्छा प्रकट करते थे। अनुशीलन समिति के नेता-
गण यह नहीं चाहते थे कि मैं उनसे अलग होकर काम करूँ। लेकिन वे यह भी
नहीं चाहते थे कि बंगाल के क्रान्तिकारी आन्दोलन में मेरा वही स्थान हो जैसाकि
पंजाब और युक्त प्रान्त में था। इधर जादूगोपाल बाबू चाहते थे कि मैं पूर्ण रूप
से उन लोगों के साथ मिलकर काम करूँ। उस समय श्री यतीन्द्रनाथ मुकुर्जी,
श्री नरेन्द्र नाथ भट्टाचार्य (जो आजकल मानवेन्द्रनाथ राय के नाम से प्रसिद्ध हैं)
श्री जादूगोपाल मुकर्जी इत्यादि सब एक साथ मिलकर काम कर रहे थे। इसी
समय एक विख्यात पुस्तक विक्रेता के पास से एक प्रस्ताव आया था कि मैं उनकी
कलकत्ते की दूकान का कार्य-भार ग्रहण करूँ। जादूगोपाल बाबू भी चाहते थे कि
मैं कलकत्ते में रहूँ और मजदूर वर्ग का काम अपने हाथ में ले लूँ। मैंने इन सब
प्रस्तावों को स्वीकार भी कर लिया था लेकिन वे किताब वाले अन्त में मुझे दूकान
का कार्यभार देने से आनाकानी करने लगे। मैंने भी उनके मन की बात समझ
ली। उन्हें सन्देह हो गया था कि मै राजनैतिक मामलों के सम्पर्क में आकर उलझन
में पड़ जाऊँगा। सम्भवतः इसीलिए उन्होंने अपनी कलकत्ते की दूकान का कार्य-
भार मेरे ऊपर नहीं छोड़ा।
मेरा कलकत्ता जाना तो रह गया। इसके थोड़े ही दिन बाद ढाका से मेरे
एक परिचित बन्धु श्री गोविन्द चन्द्रकर मुझसे मिलने आए। इनके साथ मैं काले-
पानी में रह चुका था। विप्लव के कार्य करते समय गोविन्द बाबू को फरार रहना
पड़ा था। अन्त में पुलिस को गोविन्द बाबू और उनके एक साथी का पता चल
गया। सशस्त्र पुलिस ने इनका मकान घेर लिया। इनके लिए अब निकलने का
कोई रास्ता नहीं रहा। इन्होंने भी अपने अस्त्र उठाए और पुलिस वालों पर गोली
चलाते हुए निकल गए। पुलिस वालों ने भी पीछे से गोली चलाई। गोविन्द बाबू
और उनके साथी बुरी तरह से घायल होकर गिर पड़े। लेकिन ईश्वर की कृपा
से आज भी गोविन्द बाबू जीवित हैं। आज भी उनके शरीर में सीसे की गोली
वर्तमान है। और सम्भवतः इसके परिणाम में और कारागार की विशेष कठोरता