बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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चरित्र लिखे गए थे। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही बंकिम रवीन्द्रनाथ,
नवीनचन्द्र, शरत्चन्द्र इत्यादि प्रतिभाशाली लेखको ने जिस साहित्य की सृष्टि
की है उसकी तुलना आज भी भारत मे नहीं मिल सकती। फिर ऐतिहासिक
गवेषणा मे, वैज्ञानिक अनुसंधान में, काव्य मे, कला मे, अर्थात् राष्ट्रीय चेतना
की प्रत्येक दिशा मे प्राणशक्ति का अपूर्व स्फुरण हुआ था। कलकत्ता हाईकोर्ट
के न्यायालय में जब पहले-पहल राजनीतिक षड्यन्त्र के मामलो पर विचार
प्रारम्भ हुआ तो युगान्तर पत्र के अनुवाद के सम्बन्ध में जजों के सामने यह कहा
गया था कि युगान्तर की भाषा इतनी मौलिक है कि उसका भाषान्तर करना
सम्भव नही । मिल्टन की भाषा मे जो शक्ति है, बर्क की शैली मे जो ओजस्विता
है, मार्ले की भाषा में जो प्रांजलता और प्रसाद है, युगान्तर की भाषा मे मानो
इन सब गुणों की अद्भुत व्यंजना व्यक्त हुई है। युगान्तर की तुलना में हिन्दी
भाषा में हमें कुछ भी नही मिल सकता। नेपोलियन के समय में जर्मन प्रदेश
शतधा विभक्त था । सौ मील जाने मे तीस टुकडे-टुकडे स्वतन्त्र प्रान्तो से होकर
जाना पड़ता था । नेपोलियन द्वारा तीव्र रूप से आघात प्राप्त करके जर्मनी में
राष्ट्रीय चेतना का नव-उन्मेष हुआ था। उस समय भी जर्मन साहित्य मे अद्भुत
जागृति दिखाई दी थी। जर्मन विश्वविद्यालय के एक प्रसिद्ध अध्यापक फान्
टिट्श्के ने नवीन शैली से अद्भुत प्रेरणा के वशीभूत होकर जो इतिहास लिखा
था उसी के प्रभाव से जर्मनी मे एक नवीन राष्ट्रीय चेतना का संचार हुआ।
भारतवर्ष के राष्ट्रीय आन्दोलन की चर्चा करने पर हमे नितान्त निराश होना
पडता है। महात्माजी एव पं० जवाहरलालजी की आत्म-कथाओ तथा सुभाष
बाबू की एक-दो पुस्तको को छोडकर पिछले बीस वर्षो मे कुछ भी साहित्य की
सृष्टि नही हुई है। यह कुछ आशा की बात रही है। अण्डमन मे रहने समय मेरे
मानस पटल मे ये सब बातें स्थायी रूप से अंकित हो गई थी। तथापि आज भी
मेरे मन मे परिताप की सीमा नही है कि अपनी अभिलाषा के अनुसार मैं कुछ
भी साहित्यिक प्रयत्न नही कर पाया। बात यह थी कि विप्लव कार्य मे आत्यन्तिक
रूप से लिप्त रहने के कारण मुझे साहित्य चर्चा करने का अवसर ही नही मिला ।
मेरी एक यह इच्छा थी कि क्रान्तिकारी आन्दोलन की उपयोगिता एवं
आवश्यकता के विषय मे एक परिपूर्ण ग्रन्थ लिख डालूं। क्रान्तिकारी आन्दोलनों
के विपक्ष मे आज तक जितने आक्षेप किये गए हैं इसे तुच्छ एवं बुद्धिहीनों का
व्यर्थ आस्फालन प्रतिपादित करने के लिए जितनी बातें कही गई हैं इन सबका
प्रत्युत्तर देने की मन में प्रबल इच्छा थी। परन्तु परम दुर्भाग्यवश मैं कुछ भी न
कर पाया। इस प्रकार के ग्रन्थ लिखने मे यथेष्ठ समय की आवश्यकता होती है, और
मुझे यह समय प्राप्त नही है। यदि ग्रन्थ लिखने बैठ जाता हूँ तो इधर संगठन का
कार्य पड़ा रहता है और संगठन के कार्य में लग जाता हूँ तो लिखने का समय
नहीं मिलता। ऐसी परिस्थिति में ही मैंने अपने दल का एक कार्यक्रम तैयार
किया था। मेरी समझ से भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन के इतिहास में इस