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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 408 में से

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पृष्ठ 306

304 / बन्दी जीवन
सम्बन्ध नहीं है। आज ये सब बातें स्मरण करते समय मुझे ऐसा सन्देह होता
है कि सम्भव है कुतुबुद्दीन साहब वेदान्त के विचारों से भली भाँति परिचित न
रहे हों अथवा यह भी हो सकता है कि क्योंकि कुतुबुद्दीन साहब मुझे धीरे-धीरे
अपनी ओर खींचना चाहते थे, इसलिए मेरे दृढ़ दार्शनिक विचारों के प्रति
सहिष्णुता दिखाकर मुझे यह समझाना चाहते थे कि दार्शनिक विचारधारा एवं
धार्मिक भावना ये दो एकदम भिन्न वस्तुएँ हैं। कुतुबुद्दीन साहब का यह कहना
कि धर्म के कारण संसार में भीषण अनर्थ हुए हैं मुझे बहुत सीमा तक स्वीकार
करना पड़ा था। तथापि मैने इस बात को किञ्चित् मात्र भी स्वीकार नहीं किया
कि धर्म का सद्व्यवहार नहीं हुआ इसलिए यथार्थ में धर्म भी स्वयं सद्वस्तु नहीं
है। इतिहास में बहुत-से अवसरों पर धर्म का दुरुपयोग हुआ है, इसलिए धर्म
का सदुपयोग भी नहीं हो सकता है यह बात न युक्तियुक्त है न ऐतिहासिक दृष्टि
से ही सत्य है। फिर निरी आर्थिक दृष्टि से ही इतिहास को समझने की चेष्टा
करना यह भी एक युक्ति संगत बात नहीं है। इस प्रकार कम्यूनिज्म के संस्पर्श
में आकर जीवन में एक महान् नवीन आदर्श की प्रेरणा का मैंने अनुभव किया।
परन्तु कम्यूनिज्म के सिद्धान्त में एक महान् आदर्श के साथ कुछ ऐसी भी बातें
जोड़ दी गई हैं जिन्हें न मैंने उस दिन ही स्वीकार किया था और न इतने दिनों
के मनन और अध्ययन के बाद आज भी कर सकता हूँ। मैं युक्ति, दार्शनिक दृष्टि
अथवा मानव अभिज्ञता की दृष्टि से भौतिकवाद को आज भी सत्य नहीं समझता।
किसी नवीन आदर्श की परिकल्पना केवल जड़वाद के दृष्टिकोण से उत्पन्न नहीं
हो सकती।
विप्लव आन्दोलन की दृष्टि से देहली में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के अव-
सर पर बहुत महत्त्वपूर्ण बातें हुईं। इसी अधिवेशन में कांग्रेस ध्येय को बदलने की
सर्वप्रथम चेष्टा हुई। उत्तर भारत के विप्लव आन्दोलन पर कम्यूनिज्म के आदर्श
का अभूत प्रभाव पड़ा। भारतीय विप्लव आन्दोलन के इतिहास में यह एक विशेष
महत्त्वपूर्ण घटना है। देहली में कांग्रेस के अधिवेशन के समय भारत में कम्यूनिस्टों
का कहने योग्य कोई संगठन नहीं था। सन् 1924 ई० में कानपुर के बोलशेविक
षड्यन्त्र के मामले में इने-गिने मनुष्य अभियुक्त थे। हम लोगों के क्रान्तिकारी दल
की तुलना में भारतवर्ष भर में दूसरा कोई व्यापक एवं सुसंगठित दल न था।
पंजाब में सरदार गुरुमुखसिंह तथा सरदार संतोखसिंह के नेतृत्व में कम्यूनिज्म के
आदर्श पर एक दल तैयार हो रहा था। लेकिन इस दल की तमाम कर्मचेष्टा
पंजाब प्रान्त में ही सीमित थी। बंगाल के अन्य क्रान्तिकारी दलों में कम्यूनिज्म
के किसी भी प्रभाव का चिह्न नहीं दिखाई दिया था। मैंने उत्तर भारत में जिस
विप्लव दल का संगठन किया था भारतीय विप्लव आन्दोलन के इतिहास में इसी
दल ने सर्वप्रथम कम्यूनिस्ट सिद्धान्त के बहुत अंशों को स्पष्ट शब्दों में ग्रहण कर
लिया था। उस सिद्धान्त के जिन अंशों को हमने उस दिन नहीं ग्रहण किया था
वह इसलिए नहीं कि वे हम लोगों की समझ में नहीं आए थे, वरन हम लोगों ने