बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
282 / बन्दी जीवन
पर देशबन्धुदासजी से परामर्श किया था उस समय मैं कलकत्ता फरार हालत में
नहीं आया था। परिपक्व बुद्धि न रहने के कारण एवं दुनियादारी की बातों से
एकदम अपरिचित रहने के कारण मैंने देशबन्धुदास को अपना विरोधी बना लिया
था। मेरी गिरफ्तारी के बाद बंगाल प्रान्तीय राजनीतिक कांफ्रेंस के अवसर पर
विचारालय से दण्ड प्राप्त न होने पर भी जो सैकड़ों युवकों को जेलों में बन्द कर
दिया गया था उस सम्बन्ध में जो आलोचना हुई थी उस समय देशबन्धु दासजी
ने खुले जलसे में यह कहा था कि नज़रबन्द राजबन्दियों में सभी व्यक्ति निर्दोष
नहीं हैं इसलिए सब नज़रबन्दों की मुक्ति के लिए प्रयत्न करना युक्ति-संगत एवं
न्याय-संगत नहीं होगा। प्रान्तीय कांफ्रेंस में देशबन्धु दासजी की इन बातों का
प्रचंड विरोध हुआ था। विरोध होने पर भी देशबन्धु दासजी ने स्पष्ट शब्दों में
कांफ्रेंस के सामने यह प्रश्न रखा था कि क्या आप लोग कहना चाहते हैं कि शचीन्द्र-
नाथ सान्याल निर्दोष व्यक्ति हैं। इस बात पर कांफ्रेंस में घोर वाद-विवाद हुआ
था एवं देशबन्धुदासजी से यह कहा गया था कि यदि श्री सान्याल निर्दोष व्यक्ति
नहीं हैं तो खुले इजलास में उनका विचार क्यों नही होता। सम्भव है कि सरकार
के खुफिया विभाग से आपको कुछ खबर मिली हो। लेकिन कांफ्रेंस के सामने ऐसी
कोई बात नही है जिससे हम शचीन्द्रबाबू के विरुद्ध खुले सम्मेलन में आपकी तरह
कुछ कहें। खुले सम्मेलन मे सभी पार्टियों के व्यक्तियों ने मेरे पक्ष मे सी० आर०
दास जी के विरुद्ध आवाजें उठाईं थी। हमारे देश के गण्यमान्य नेताओं की मनो-
वृत्ति का परिचय इन सब बातों से खूब मिल सकता है। क्रान्तिकारी आन्दोलन
प्रधान रूप में गुप्त रीति से ही चल रहा था। इस आन्दोलन के विरुद्ध प्रकाश्य
रूप में कटूक्ति करना बहुत आसान बात थी। कारण कि इन कटूक्तियों का उत्तर
देना सब समय क्रान्तिकारियों के लिए आसान नही होता था क्योकि उन्हे तो
गुप्त रीति से ही काम करना पड़ता था। हमारे देश के प्रायः सभी गण्यमान्य
नेताओं ने इस आन्दोलन के प्रति अनेकों बार अनेकों प्रकार से कटूक्ति की है।
यदि किसी ने इन सब कटूक्तियों के विरुद्ध कुछ कहने का साहस किया तो हमारे
देश के गण्यमान्य लब्ध-प्रतिष्ठित नेता गणों ने उसकी खबर लेने की खूब चेष्टा की
है। लेकिन इसमे एक विशेष अपवाद अवश्य है वह है महात्मा गांधी। महात्मा
गांधी ने भी बेलगांव कांग्रेस मे क्रान्तिकारियो के प्रति भीषण कटूक्ति की थी।
लेकिन जब मैंने उन कटूक्तियों का प्रत्युत्तर महात्माजी के पास भेजा तो महात्माजी
ने विशेष उदारता एवं न्याय निष्ठा के साथ मेरे प्रत्युत्तर को ज्यों-का-त्यों 12
फरवरी सन् 1925 के 'यंग इंडिया' में छाप दिया था और बाद को उन्होंने अपने
मन्तव्य को भी उसी प्रत्युत्तर के अन्त मे छाप दिया था। इसके लिए आज भी
मेरा हृदय महात्माजी के श्री चरणों का स्पर्श करता है।
एक दफे की बात है, किसी काम से मैं कलकत्ता आया था। श्री सी० आर०
दासजी से मेरी खूब बहस हुई थी। दास और मुझे छोड़कर उस कमरे में एक
व्यक्ति और थे। ये सज्जन बंगाल के प्रसिद्ध नेता श्री अश्विनीकुमार दत्त के भाई
श्री मोतीलालजी, जवाहरलालजी तथा श्री सी० आर० दास से भेंट / 283
अथवा भतीजे थे । सब बातें आज याद नहीं हैं लेकिन इतना याद है कि देशबन्धु
अत्यन्त उत्तेजित होकर तीव्र स्वर से भर्त्सना व्यंजक शब्दों में मेरे प्रत्येक प्रश्न
का उत्तर दे रहे थे । उत्तेजित होने से युक्ति स्थिर नहीं रहती है । अन्त में उस
तीसरे सज्जन से रहा नहीं गया । मेरे पक्ष को लेकर उन्होंने भी श्री सी० आर०
दासजी से बहस की । मुझे इस समय अपना एक प्रत्युत्तर याद है । दासजी अहिंसा
नीति के पक्ष में तीव्र रूप से वाद-विवाद कर रहे थे और उन्होंने अन्त में यह कहा
था कि पाशविक बल से आत्मिक बल कहीं अधिक प्रबल है । तुम लोग शारीरिक
बल पर अत्यधिक ध्यान दे रहे हो आत्मिक बल पर नहीं । इस पर मैंने यह उत्तर
दिया था कि "आप हम लोगों को गलत समझ रहे हैं । आप समझते हैं कि पिस्तौल
या बन्दूक का चलाना एक पाशविक बल मात्र है । आप भूल जाते हैं कि ट्रीगर
(Triger) का खींचना पाशविक बल से नहीं होता है । ट्रीगर को खींचने के पीछे
कुछ कम आत्मिक बल की आवश्यकता नहीं होती । एक पहलवान भी तो ट्रीगर
खींच सकता है लेकिन पहलवान होने से ही वह क्रान्तिकारी आन्दोलन में भाग
लेगा ऐसी बात नहीं है । आत्मिक बल रहे बिना क्या कोई व्यक्ति क्रांतिकारी
आन्दोलन मे सम्मिलित हो सकता है । एक तरुण वयस्क युवक पहलवान की अपेक्षा
कही कम शारीरिक बल रखता है लेकिन विप्लवकार्य में यह तरुण युवक महज ही
मे ट्रीगर खींच सकेगा लेकिन पहलवान वह ट्रीगर नही खींच सकता । ट्रीगर
खींचने को आप पाशविक बल क्यों समझ रहे हैं ।"
इसी प्रकार से एक और बात मुझे अब भी खूब याद है । यह बात सहायता
पाने के सिलसिले में ही हुई थी । किस नीति के अनुसार क्रान्तिकारी आन्दोलन
सफल होगा उसके बारे मे बातचीत हो रही थी । जब सब प्रश्नों का उत्तर मैंने
सफलता पूर्वक दे दिया तो अन्त में दास जी ने यह प्रश्न किया कि "अच्छा मान लो
और सब बात ठीक है, लेकिन आम जनता को किस प्रकार से तुम लोग अपने
साथ लोगे ? तुम लोगों के कार्यक्रम में जनता का साथ लेने का कोई विधान नही
है । जनता को साथ लिये बिना कोई भी क्रान्तिकारी आन्दोलन सफल नही हो
सकता ।" मैंने इसके उत्तर मे कहा था, "आम जनता को साथ लेना हम लोग अधिक
कठिन बात नही समझते है । इस बात को ले लीजिए, कलकत्ता के आसपास दस-
पन्द्रह मील के अन्दर जितने कारखाने है उनमें कम-से-कम दस-ग्यारह लाख
मजदूर काम करते होगे । तीन-चार महीने के परिश्रम से इन कारखानों मे हड़ताल
करा देना विशेष कठिन बात नही है । इतनी बडी हड़ताल के अवसर पर
मिलिटरी, पुलिस और पलटन कारखानों की रक्षा के लिए अवश्य आ जाएगी ।
ऐसे मोकों पर मजदूरों को भडका देना कोई कठिन बात नही है । ऐसी परिस्थिति
में यदि हमारे पास फ़ौजी शिक्षा प्राप्त किये हुए उपयुक्त व्यक्ति आवश्यक संख्या में
हों और अपने प्रयोजन के अनुसार उपयुक्त संख्या में अस्त्र-शस्त्र भी हो तो क्या,
क्रान्ति का प्रारम्भ करना कुछ कठिन बात है । ऐसी अवस्था में क्या जनना हमारा
साथ नही देगी ?" मुझे याद है दासजी इसका कोई उत्तर नही दे पाए थे ।
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इस प्रसंग में एक बात और बता देना अप्रासंगिक न होगा। मेरे साथ बात-
चीत करने के परिणामतः देशबन्धुदास इतने प्रबल रूप से प्रभावान्वित हुए थे कि
उन्हीं दिनों में एक प्रकाश्य सभा में उन्होंने अंग्रेज सरकार को चेतावनी देकर
कहा था कि यदि सरकार समझती है कि क्रान्तिकारी आन्दोलन दब गया है तो
वह भारी भूल में पड़ी हुई है, यह आन्दोलन इतना व्यापक एवं गंभीर रूप धारण
किये हुए है कि यदि सरकार जनमत की अवहेलना करेगी तो उसे बुरी तरह
पछताना पड़ेगा।
इस वक्तृता के बाद बंगाल सरकार की तरफ से खुफिया विभाग के एक
पुलिस सुपरिटेंडेंट श्री भूपेन्द्र चटर्जी को श्री देशबन्धु के पास भेजा गया था। सर-
कार जानना चाहती थी कि दासजी के उस वक्तव्य का आधार क्या है। भूपेन्द्र
चटर्जी बहुत देर तक सी० आर० दासजी को प्रश्न पूछ-पूछकर परेशान करते रहे।
सरकार जानना चाहती थी कि क्या वर्तमान परिस्थिति वैसी नाजुक है जैसी
कि सन् 1915-16 में हुई थी।
भूपेन्द्र चटर्जी के मिलने के बाद मैं फिर सी० आर० दासजी से मिला था
और उन्ही की जबानी ये सब बातें सुनी थी। कलकत्ता शहर-भर मे यह बात
फैल गई थी कि बंगाल सरकार सी० आर० दासजी की बातों से विचलित हो
गई थी।
जिस समय दासजी ने ऐसी वक्तृता दी थी उस समय ढाका समिति के साथ
मेरा समझौता हो चुका था। मैं सी० आर० दासजी के साथ जो सम्बन्ध स्थापित
करना चाहता था ढाका अनुशीलन समिति के नेतागण उसे पसन्द नहीं करते थे।
उनका कहना था कि दासजी के वक्तव्य से सरकार और चौकन्नी हो जाएगी
इससे हमारे कार्य में बहुत बाधा पहुँचेगी और लाभ कुछ न होगा। मैं इनकी बातो
से सहमत न था। मैं कहता था कि इससे क्रान्तिकारी आन्दोलन भी प्रबल होता
जा रहा है और इससे हमारे आन्दोलन को लाभ होगा। इस प्रकार से राष्ट्रीय
आन्दोलन के ऊपर क्रान्तिकारी आन्दोलन की एक गहरी छाप पड़ रही है।
लेकिन ढाका समिति के नेताओं ने मेरे दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया।
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उत्तर भारत में दल का विस्तार
मुझे युक्तप्रान्त एवं पंजाब का बार-बार दौरा करना पड़ा और जब मैंने
समझ लिया कि उन प्रदेशों का काम अन्य व्यक्तियों पर छोड़कर दूसरी जगह
जाया जा सकता है तब मैं अपने बाल-बच्चों को साथ लेकर फरार हालत में
कलकत्ता चला आया। लेकिन इसके पहले पंजाब में और विशेष रूप से युक्तप्रान्त
में क्रान्ति का कार्य बहुत कुछ आगे बढ़ा था। यहाँ अपने साध्य के अनुसार उसका
परिचय देने की मैं चेष्टा करता हूँ।
सन् 1923 के प्रारम्भ में युक्तप्रान्त एवं पंजाब में मैंने कम-से-कम बीस या
पच्चीस विप्लव केन्द्र स्थापित कर लिए थे। सन् 1923 में मैंने दिल्ली में कांग्रेस
के विशेष अधिवेशन में भाग लिया था। उस समय तक ढाका अनुशीलन समिति के
साथ मेरा कोई सम्बन्ध नही था। देहली में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के बाद
ही मैंने अपने संगठन का नाम 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' रख दिया था
और इस नामकरण के अवसर पर ही अपने संगठन का लक्ष्य एवं साधन इत्यादि
को लेते हुए एक परिपूर्ण नियमावली बनाई थी। इस प्रकार पौर्वापर्य निर्णय करने
के लिए मेरे पास कुछ साधन मौजूद हैं
जब मैं जमशेदपुर मे श्रमजीवियों के आन्दोलन में काम कर रहा था उसी
समय मैं क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए धन मिलने की व्यवस्था भी कर रहा था।
मेरे परम सौभाग्य से एक महानुभाव धनी व्यक्ति ने मुझे मासिक एक सौ पचास
रुपए देने का वचन दिया था। मेरी गिरफ्तारी के बाद भी ये महानुभाव नियम-
पूर्वक प्रति मास एक सौ पचास रुपए देते गए। इन्ही रुपयो से हम लोगों का रेल
खर्च इत्यादि निकल आता था। ढाका अनुशीलन समिति के साथ सम्बन्ध स्थापित
होने के पहले तक युक्तप्रान्त या पंजाब में हम लोगों ने कभी कोई डकैती नही
की। जो सज्जन हमे प्रतिमास एक सौ-पचास रुपए देते थे उन्होंने कभी भी हम
लोगों से इसका कोई हिसाब नही माँगा। विश्वास के ऊपर हम लोगों का काम
चलता था। इस प्रकार से और कुछ आदमी भी थोड़ी रकमों से हम लोगों की
सहायता करते थे। एक दफे मैं मेरठ के वैश्य अनाथालय में श्री विष्णुशरणजी
दुबलिस के यहाँ ठहरा था। विष्णुशरणजी उस समय वैश्य अनाथालय के अध्यक्ष
थे। एक दिन अनाथालय में अलीगढ़ के प्रसिद्ध व्यक्ति ठाकुर टोडरसिंहजी आए।
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मैं एक पेड़ के नीचे चारपाई पर बैठा हुआ था। चारपाई पर बन्दी जीवन की दो-
एक प्रतियाँ पड़ी थीं। ठाकुर साहब मुझे पहचानते नहीं थे। टोडरसिंहजी बन्दी-
जीवन की एक प्रति को उठाकर लेखक के प्रति बहुत प्रशंसासूचक शब्द कहने लग
गए। इसके पहले दुबलिसजी ने मुझे बताया था कि ठाकुर टोडरसिंहजी एक धनी
जमींदार हैं, अच्छे व्यक्ति हैं। लेकिन यह भी कह दिया था कि अपना परिचय इन्हें
अभी न देना। दुबलिसजी समझते थे कि सम्भव है टोडरसिंहजी क्रान्तिकारी
आन्दोलन के प्रति सहानुभूति न प्रकट करे। दुबलिसजी किसी काम से घर के
अन्दर गए थे। बाहर चारपाई पर बैठे-बैठे टोडरसिंहजी से मेरी बातचीत होने
लगी। बातचीत के प्रसंग में मेरा परिचय पूछने पर टोडरसिंहजी को मैंने अपना
परिचय दे दिया। मैंने समझ लिया था कि टोडरसिंहजी से सहायता लेनी
असम्भव बात नहीं थी। लेकिन दुबलिसजी ने मेरा इस प्रकार से परिचय देना
पसन्द नहीं किया और बाद को यह कहकर मेरी खूब हँसी उड़ाई कि ज्योंही टोडर-
सिंहजी ने कहा कि बन्दी जीवन के लेखक को यदि मैं सामने पाता तो उनका पैर
छूता त्योंही सान्यालजी लपककर कह उठे कि मैं ही लेखक हूँ। आज भी दुबलिसजी
इस बात पर चुटकी लेते हैं यद्यपि यह बात सच नहीं है कि मैंने एकदम से
अपना परिचय टोडरसिंहजी को दे दिया था। टोडरसिंहजी से बात करते समय
मैंने यह अनुभव किया था कि ठाकुरसाहब पर प्रभाव डालने से कुछ काम निकल
सकता है। इसी गरज से उनके पूछने पर मैंने अपना परिचय दे दिया। परिणामतः
टोडरसिंहजी मुझे अपने स्थान पर ले गए। उन्होंने मुझे प्रेम से भोजन कराया,
और अन्त में मेरे एक आदमी को चालीस रुपया मासिक वेतन पर अपने यहाँ के
एक स्कूल में शिक्षक रखने के लिए वे राजी हो गए। टोडरसिंहजी क्रान्तिकारी
आन्दोलन के विशेष पक्षपाती नहीं थे तथापि इस प्रकार से उन्होंने हम लोगों को
चालीस रुपए मासिक देना स्वीकार किया था। टोडरसिंहजी महात्माजी के अनु-
रक्त अनुयायियों में से थे तथापि उनसे हम लोग यह सहायता लेने में समर्थ हुए
थे। लेकिन दुर्भाग्यवश जिस व्यक्ति को मैंने टोडरसिंहजी के स्कूल में भेजा था
वह व्यक्ति हम लोगों के काम के उपयुक्त न था। दो महीनों के बाद वह व्यक्ति
विप्लव कार्य से अलग हो गया। इसी व्यक्ति ने बनारस में मेरे विवाह के अवसर
पर मुझे चुभती हुई बातें सुनाई थीं। गनीमत यह थी कि सरल रूप से एक पत्र
द्वारा मुझे उन्होंने यह सूचना दी कि विप्लव कार्य से अब मैं अलग हो रहा हूँ
क्योंकि इस काम के लिए मैं अपने को उपयुक्त नहीं समझ रहा हूँ। यह घटना
सितम्बर सन् 1923 के पहले हुई। टोडरसिंहजी से हम लोगों ने और कोई विशेष
सहायता नहीं पाई।
मेरठ की एक और घटना विशेष उल्लेख योग्य है। यह घटना भी ढाका अनु-
शीलन समिति के साथ सम्बन्ध स्थापित होने के पहले ही हुई थी। मेरठ होकर मैं
लाहौर जानेवाला था। मेरे मनीबेग में पाँच सौ रुपए के नोट और कुछ रेज़गारी
थे। मेरठ स्टेशन से मनीबेग से दो दस-दस रुपए के नोट निकाले। मनीबेग को
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फिर कोट के ऊपरी जेब में रख दिया। टिकट लेने गया। उस समय खिड़की के
सामने दो ही चार आदमी थे लेकिन फिर भी उन दो-चार आदमियों में ही जाते
समय कुछ धक्कम-धक्का हुआ। उस समय मैं समझ नहीं पाया कि धक्कम-धक्का
करना गिरहकटों की एक तरकीब है। बाद को जेल में इस तरकीब का पता
चला था। एक आदमी यदि किसी को धक्का देता है तो स्वभावतः ही धक्का खाने
वाला धक्का देने वाले की तरफ देखता है। थोड़ी देर के लिए उसका पूर्ण ध्यान
धक्का देने वाले के प्रति आकृष्ट रहता है। इसी अवसर पर गिरहकट अपनी
कारीगरी दिखला देते हैं। उस ज़रा-सा ही धक्कम धक्के के बाद जब मैंने खिड़की
के सामने आकर लाहौर का टिकट माँगा तो टिकट बाबू ने कहा कि गाड़ी आने
में अभी देर है टिकट अभी नहीं बटेगा। जब मैंने खिड़की से बाहर आकर नोट
अपने मनीबेग में रखना चाहा तो देखा मनीबेग गायब है। मेरे होश-हवास
बिलकुल उड़ गए। किंकर्तव्यविमूढ की तरह रह गया, क्या कहूँ और क्या न
कहूँ कुछ समझ में नहीं आया। अवश्य मेरे मुँह से यह निकला होगा कि अरे
मनीबेग गायब है क्योंकि किसी ने मुझसे कहा कि जाओ पुलिस में इत्तला दे दो।
इत्तला भी देता तो पुलिस को अपना नाम-धाम क्या बताता। यदि मैं अपना असल
नाम बताता हूँ और यह कहता हूँ कि मेरठ में आकर वैश्य अनाथालय में मैं
ठहरा था तो भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर पुलिस को इस बात का प्रमाण मिल
जाता कि दुबलिसजी के साथ मेरा सम्बन्ध है। लेकिन फिर भी मैं रेलवे थाने में
गया एक पुलिस का हेडकानस्टेबुल दौड़कर मेरे साथ टिकट बाँटने के जंगले के
सामने आया। वहीं के लोगों से कुछ पूछताछ की कि कौन टाँगावाला यहाँ था
कौन गया है, उसका कोई जान-पहचान का आदमी उस समय उस स्थान पर था
या नहीं इत्यादि बातों को जानकर फिर हम लोग रेलवे थाने में वापस आए।
मुझसे पूछा गया कि मेरठ में मैं कहाँ ठहरा था। मैंने बता दिया कि वैश्य यतीम-
खाने में ठहरा था। पुलिसवालों ने मुझसे पूछा कि रिपोर्ट लिखूँ या नहीं। मैंने
बताया कि झूठ-मूठ लिखने से क्या फायदा, रुपया मिलना तो है नहीं। लेकिन यह
भी मैंने बताया कि मनीबेग में पाँच सौ रुपए के नोट थे। यदि रुपया वापस मिल
जाय तो पता लगानेवाले को आधा दे दूंगा। रिपोर्ट नहीं लिखवाई। दिल छोटा
करके पुलिस के दफ्तर से फिर उसी टिकटघर के सामने आकर खड़ा हो गया और
सोचा कि मैं कितना बड़ा बेवकूफ हूँ। अब कौन-सा मुँह लेकर कहाँ वापस जाऊँ।
कितनी मुश्किल से तो रुपये मिलते हैं। बड़ी मुसीबत है। थोड़ी देर तक इस
प्रकार के विमर्श के बाद दुबलिसजी के यहाँ वापस जाना ही ठीक समझा। मेरे
दिल में यह एक अत्यन्त भय हो रहा था कि दुबलिसजी और मेरे अन्य साथी मेरे
ऊपर यह सन्देह न करने लग जाएँ कि मैं रुपए हजम कर बैठा हूँ। यदि ऐसा
होता तो मैं मिट्टी में मिल जाता। लेकिन ये रुपए मैं जहाँ से लाता था उसका
पता हमारे दल के और किसी को न था। मुझे छोड़कर और दो व्यक्तियों को
इसका पता रहता था। एक तो देने वाले और दूसरा वह जिसके जरिए से मैं कभी-
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कभी रुपया जाता था। इसके अलावा मुझसे प्रश्न करनेवाला तो कोई था नही।
मनीबेग गायब होने का किस्सा यदि मैं प्रकाश न करता तो किसी को क्या मालूम
होता। ये सब बातें होते हुए भी मेरे मन में एकाएक भय और लज्जा उत्पन्न हुई
थी।
मुझे वापस आते देखकर दुबलिसजी मेरे पास आकर हँसते हुए खड़े हो
गए और पूछा क्या बात है। गाड़ी छूट गई। मैंने कहा टाँगेवाले को तो कुछ दे दो
फिर बताता हूँ। टाँगेवाले को पैसे दे दिए और मैंने अपनी बेवकूफी की कहानी
कह सुनाई। सब बातें सुनकर क्रोध का और अविश्वास के स्थान पर मेरे प्रति
दुबलिसजी के हृदय मे दया का उद्रेक हुआ। मुझे आश्वासन दिलाकर दुबलिसजी
ने कहा कि आप आज रात-भर ठहर जाइए। मैं आपको कुछ रुपया लाकर देता
हूँ। मेरे लिए दुबलिसजी ने एक बण्डी भी दी जिसकी भीतरी तरफ एक जेब
थी। दूसरे दिन दुबलिसजी ने कही से दो सौ रुपए लाकर मुझे दिए। उस दिन से
आज तक मैं कभी भी मनीबेग कोट या कमीज के ऊपरी हिस्से मे नही रखता हूँ।
मेरे बदन में हमेशा एक बण्डी रहती है। उस बण्डी को छोडकर और कही मैं
पैसा नहीं रखता। जीवन में यह दूसरी बार हुआ था, जब मेरे जेब से रुपया
निकल गया। पहली बार हावडा स्टेशन मे एक दफे मेरे जेब से और कुछ रुपए
निकल गए थे।
मेरठ में रहते समय एक और सज्जन से मेरी जान-पहचान हुई थी जिसका
उल्लेख करना यहाँ पर अप्रासंगिक न होगा। उन सज्जन का नाम था चौधरी
विजयपालसिंह। हम लोगों के साथ उनकी गहरी सहानुभूति थी लेकिन हम लोगों
की सहायता करने का उन्हे अवसर नही मिला। उनके पास से मैंने एक किताब
ली थी उसका नाम है सोवियत कन्स्टिट्यूशन। सितम्बर सन् 1923 के पहले ही
मैंने इस प्रकार से सोवियत कन्स्टिट्यूशन को समझाने की चेष्टा की थी। सन्
1923 में दिल्ली कांग्रेस के बाद मैंने कम्युनिज्म को समझने के लिए अच्छी तरह
से चेष्टा की उसी समय सोवियत कन्स्टिट्यूशन से भी यथेष्ठ लाभ उठाया। यह
किस्सा बाद का है। दुबलिसजी के साथ मेरी गहरी मित्रता हो गई थी। दुबलिस-
जी का घर था मेरठ जिले के मवाना ग्राम में। मवाना से हस्तिनापुर बहुत क़रीब
है। दुबलिसजी ने अपने घर ले जाने के लिए मुझसे विशेष आग्रह किया था और
कहा था कि मवाना से हस्तिनापुर बहुत क़रीब है ओर हस्तिनापुर देखने योग्य
स्थान है। ऐसा कौन-सा भारतवासी होगा जिसके हृदय मे हस्तिनापुर का नाम
सुनकर चांचल्य पैदा न हो। इन्द्रप्रस्थ हस्तिनापुर और दिल्ली ये तीन नाम
भारत के इतिहास में मानो एक सूत्र में ग्रथित है। लेकिन मुझमें एक बुरी आदत है
कि जिस काम के लिए जहाँ जाता हूँ उसको छोड़कर एक तिल-भर भी इधर-उधर
जाना मुझसे नहीं होता। यह एक त्रुटि है। व्यापक रूप मे किसी चीज को न देखना
एक अपूर्णता है। मैं अपने कामों मे ऐसा उलझा हुआ रहता था कि दो दिन की
जगह तीन दिन एक स्थान पर रहना मेरे लिए कठिन हो जाता था। मैं आज
उत्तर भारत में दल का विस्तार / 289
तक भी हस्तिनापुर नहीं गया। सन् 1937 में छूटने के बाद मैं दो दफा मेरठ
गया। मेरे कुछ साथी हस्तिनापुर हो आए हैं। लेकिन मुझे हस्तिनापुर जाने का
अवकाश नही मिला।
मेरठ में मैं कई बार आया-गया। दुबलिसजी की सहायता से मेरठ में दो-
चार आदमी और मिलने लग गए थे। लेकिन मेरी गिरफ्तारी के कारण मेरठ का
संगठन कुछ अधिक अग्रसर नही हो पाया। एक आर्यसमाजी प्रचारक वैश्य
अनाथालय मे आया करते थे। उनसे मेरी बहुत बातचीत हुई थी। बातचीत
के बाद वह आर्यसमाज के प्रचारक मेरे साथ काम करने को तैयार हो गए। वह
सज्जन पंजाब तक जाते थे। लेकिन दुख की बात है कि मेरी अनुपस्थिति में
इन सज्जन से किसी ने कोई काम नही लिया।
मेरठ के बाद मुझे पंजाब जाना था। लेकिन जेब से रुपया निकल जाने के
कारण फिलहाल पजाब जाना स्थगित किया किन्तु पजाब जाना तो था ही, इस-
लिए बनारस और इलाहाबाद घूमकर मैं फिर पंजाब गया।
पजाब मे जाकर लाहौर के प्रोफेसर जयचन्द्रजी विद्यालकार के यहाँ ठहरता
था। अब की बार भी विद्यालंकारजी के ही यहाँ ठहरा। मुझे ठीक स्मरण नही है
कि अब की बार या इसके पहले ही मुझे पता लग गया था कि सरदार गुरुमुखसिंह
इत्यादि जो अपना अलग सगठन कर रहे थे यह नही चाहते थे कि अबकी बार
सिख गैर सिक्ख सस्थाओ के साथ मिलकर भारतीय विप्लववादी आन्दोलन मे भाग
लें। यहाँ तक कि सरदार गुरुमुखसिंहजी ने चाहा कि हमारे सच्चे साथी सरदार
भगतसिंह को हम लोगो से तोडकर अपनी संस्था मे मिला लें। इस कारण गुरुमुख-
सिंह ने भगतसिंहजी को बहुतेरा समझाया कि तुम बंगालियो के फेर में मत पड़ो
इनके फेर मे पड़ोगे तो फाँसी पर लटक जाओगे काम कुछ भी नही कर पाओगे।
इस प्रकार से गुरुमुखसिंहजी जितनी बाते भगतसिंहजी से कहते थे वे हम लोगों
से सब कह देते थे। बहुत बहकाने पर भी भगतसिंहजी ने हम लोगों का साथ नही
छोडा। मैं भी गुरुमुखसिंहजी से मिलता रहा। अपनी संस्था के छपे हुए कानून-
कायदे गुरुमुखसिंहजी ने मुझे दिए थे। उन सबसे मुझे पता चला कि उनकी सस्था
रूस की साम्यवादी नीति पर सगठित है। साम्यवाद की नीति पर गुरुमुखसिंहजी
से बहुत बातचीत हुई। जहाँ तक मुझे आज याद है उस समय गुरुमुखसिंहजी पूर्ण
रीति से मार्क्सिस्ट नही थे कारण कि भौतिकबाद मे उनका पूरा विश्वास नही
था। यदि मैं भूल नही कर रहा हूँ तो सम्भव है गुरुमुखसिंहजी ने मुझसे यह भी कहा
था कि रूस की पूरी नकल करने की कोई आवश्यकता नही है। सरदार सन्तोष-
सिंह नामक एक सज्जन रूस से वापस आये हुए थे। मैं जिस समय पंजाब गया
था उस समय सरदार सन्तोषसिंहजी एक गाँव मे नजरबन्द थे। लेकिन मुझे
ऐसा मालूम हुआ कि सरदार सन्तोषसिंह ही यथार्थ में गुरुमुखसिंह आदि के संस्था
के संचालक, व्यवस्थापक या संस्थापक थे,। उनकी सलाह से ही गुरुमुखसिंह
इत्यादि काम करते थे। इसके बहुत पहले से ही मैं कम्यूनिज्म का साहित्य पढ़ने
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लग गया था। लेकिन अभी भी कम्यूनिज्म का पूरा स्वरूप मेरी समझ मे नहीं
आया था। गुरुमुखसिंहजी से बातचीत करने के बाद एवं सोवियत कांस्टिट्यूशन
(शासन विधान) पढ़ने के कारण कम्यूनिज्म के बारे मे मेरी धारणा और भी
स्पष्ट हो गई। सरदार गुरुमुखसिंह की संस्था के बारे में जयचन्द्रजी से मेरी
बातचीत हुई और यह विचार किया गया कि कम्यूनिज्म के सिद्धान्त का कितना
अंश हम अपनी संस्था में ग्रहण कर सकते हैं। उस समय अध्यापक जयचन्द्रजी भी
कुछ अधिक नहीं जानते थे। इस प्रकार हम लोग कम्यूनिज्म के बारे में धीरे-धीरे
सोचने लग गए। उस समय तक बंगाल के पुराने क्रान्तिकारी श्री नरेन्द्रनाथ
भट्टाचार्य उर्फ मानवेन्द्र राय यूरोप के कम्यूनिज्म के बारे मे लेख इत्यादि भारत
में भेजा करते थे। उनके प्रकाशित 'वेङ्गाडं आफ इण्डियन इण्डिपेन्डेन्स' नामक
साप्ताहिक पत्र हम लोगों के हाथ में आए। उन पत्रों एवं पर्चों से भी कम्यूनिज्म
के बारे में हम लोग कुछ-कुछ समझने लग गए ।
अबकी बार पंजाब आकर जैसा एक तरफ रूस की साम्यवादी नीति के
संस्पर्श में आए उसी
प्रकाशित कर दूँ। मुझे जहाँ तक पता है उससे मैं कह सकता हूँ कि भारत के और
किसी भी विप्लव दल ने ऐसी चेष्टा नहीं की थी जैसी कि हमारे दल के द्वारा
हुई थी ! सरदार गुरुमुखसिंह के दल में अवश्य ऐसी चेष्टा सफलतापूर्वक हुई
थीं।
उस व्यक्ति का नाम आज मैं भूल गया हूँ जिसे हम लोगों ने काश्मीर की
प्रसिद्ध सरहद गिलगिट में एवं पेशावर की सरहद जमरूद इत्यादि की तरफ भेजा
था। हम लोगों का उद्देश्य यह था कि इन सरहदों के जरिए से बाह्य जगत् से
भारत के विप्लव आन्दोलन का योग सूत्र स्थापन किया जाय। इस व्यक्ति ने कई
महीनों तक भीषण कष्ट सहन करते हुए गिलगिट के आसपास में मुसीबत के
दिन बिताए थे। उनकी सहायता से हम लोगों को यह पता चला था कि भारत
और चीन के लिए गिलगिट के रास्ते से व्यापारी आते-जाते हैं, लेकिन उनकी
बड़ी सख्त निगरानी होती है। महीनों तक का रसद साथ लेकर इन रास्तों से
गुज़रना पड़ता था। धन और बुद्धि से काम लेने पर इस रास्ते से अस्त्र-शस्त्र
मंगाना असंभव बात नहीं थी। आज अवश्य इन रास्तों से अस्त्र मँगाने की
आवश्यकता नहीं है। लेकिन जिन दिनों की बात यहाँ लिख रहा हूँ उन दिनों में
हम लोग विदेश से बड़े पैमाने में अस्त्र-शस्त्र मँगाने का रास्ता ढूंढ़ रहे थे। यदि
मैं शीघ्र पकड़ा गया न होता तो संभव है, हमारा विप्लव आन्दोलन कुछ और ही
रंग-रूप ग्रहण किए होता। गिलगिट के रास्ते के अलावा पेशावर के रास्ते का
भी हम लोगों ने भली प्रकार से निरीक्षण कर लिया था। अवश्य ही ब्रिटिश
सरकार को यह पता है कि पेशावर के रास्ते से बाहर के विप्लवकारियों का
गुजरना संभव एवं स्वाभाविक है।
सन् 1923 के सितम्बर मास में देहली में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन हुआ
था। ऐसे अवसरों पर भारत के प्रत्येक प्रांत से हर प्रकार के मनुष्य आया करते
हैं। इस कारण कांग्रेस के अधिवेशन के समय अन्तर प्रांतीय संगठन का कार्य बहुत
आगे बढ़ जाता है। देहली के कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के समय मैंने कराची के
अध्यापक गिडवानी साहब, श्री कुरेशी साहब (जो कि एक समय महात्मा गांधी
के 'यंग इंडिया' के सम्पादक भी रह चुके थे), महाराष्ट्र के हार्डीकर साहब
मिर्जापुर के बैरिस्टर श्री यूसुफ इमाम साहब, बुन्देलखण्ड के दीवान शत्रुघ्नसिंह
आदि से बातचीत की थी। अध्यापक गिडवानी साहब जानना चाहते थे कि
क्रान्तिकारी आन्दोलन के साथ देशबन्धु चितरंजनदास का कहाँ तक सम्बन्ध था।
मैं भी जानना चाहता था कि क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे में गिडवानी साहब
की क्या धारणा है। उनसे बातचीत करने पर मुझे यह निश्चय हो गया था कि
गिडवानी साहब अहिंसा नीति को सिद्धान्त के तौर पर नहीं मानते थे। नीति
के हिसाब से भी हिंसा और अहिंसा के रास्ते पर उनकी कोई निश्चयात्मक
धारणा नहीं थी। जिस समय की बात मैं लिख रहा हूँ उस समय गिडवानी
साहब राष्ट्रीय विद्यालय के अध्यापक थे। अपने प्रांत के नवयुवकों में उनकी
282 / बन्दी जीवन
काफी प्रतिष्ठा थी। वे देशबन्धुदास के अत्यन्त विरोधी थे। अकाली आन्दोलन
के सिलसिले में एक बार पं० जवाहरलालजी के साथ गिडवानी साहब नाभा
पधारे थे। गिरफ्तारी के बाद थोड़े ही दिनों में वे दोनों सज्जन छोड़ दिये गए
थे। पुनः नाभा के सत्याग्रह आन्दोलन में इन सज्जनों में से किसी ने कोई भाग
नहीं लिया। सन् 1921 में आसाम बंगाल रेलवे कर्मचारियों ने एवं पूर्व बंगाल
की स्टीम नेवीगेशन कम्पनियों के कर्मचारियों ने भी भारी हड़ताल कर दी थी।
इन हड़तालों के कराने में देशबन्धुदासजी का विशेष हाथ नहीं था। लेकिन जब
हड़ताल प्रारम्भ हो गई थी तो देशबन्धुजी ने हड़तालियों की जी-जान से सहायता
की थी। उस समय चटगांव इत्यादि स्थानों के कलक्टरों को भी इन हड़तालों के
कारण कोई सामान नही मिलता था हर प्रकार से हड़ताल सफल रही थी।
देहली की कांग्रेस में जाने के पहले ही पं० जवाहरलालजी से मेरी बातचीत
हो चुकी थी। उसका उल्लेख मैंने पहले ही कर दिया है। देहली कांग्रेस के
अवसर पर एक बार मुझे डाक्टर अंसारी के स्थान पर जाना पड़ा। वहाँ पर
पं० जवाहरलालजी से मेरी भेंट हुई। पंडितजी बहुत आग्रह के साथ आनन्दित
होकर मुझे एक विशेष कमरे में ले गए। वहाँ श्री कुरेशी से मेरी जान-पहचान
करा दी। मैं यह देख रहा था कि इन नेताओं में गुप्त आन्दोलन की बाते जानने
का तीव्र कुतूहल हो रहा था। कुरेशी साहब मुझे बहुत प्रशान्त मालूम पड़े। वे
प्रफुल्लचित्त तो अवश्य दिखाई पड़ रहे थे किन्तु बातें उन्होंने बहुत कम कीं। जब
आपसे मेरी फिर मुलाकात हुई तो मैं अभियुक्त की दशा में काकोरी केस के
सिलसिले में अदालत के कटघरे के अन्दर बैठा था और कुरेशी साहब दर्शकों के
स्थान पर बैठे थे।
हिन्दुस्तानी सेवा दल के संस्थापक डाक्टर हर्डीकर महोदय एक समय
अमेरिका मे थे। उस समय भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन मे कुछ व्यक्तियों से
उनका परिचय हुआ था। उनके परिचित व्यक्तियों मे से एक सज्जन का नाम
पिंगले था। बन्दी जीवन के पाठकगण पिंगले के नाम से भली-भांति परिचित हैं।
पंजाब का विप्लव आन्दोलन विफल हो जाने के पश्चात् जिस समय श्री रास-
बिहारी बोस बनारस में रहकर फिर नये सिरे से विप्लव आन्दोलन का कार्य कर
रहे थे उस समय श्री हर्डीकर का संवाद श्री रासबिहारी के पास आया था। इस
बात को मैं जानता था। इसलिए दिल्ली कांग्रेस के अवसर पर मैं हर्डीकरजी
से बहुत मिलना चाहता था। परन्तु उनसे मिलकर मुझे तृप्ति नहीं हुई। मैंने
अनुभव किया कि हर्डीकर साहब अब पुराने रास्ते को छोड़ना चाहते हैं। सन्
1916 से लेकर आज सन् 1929 तक श्री हर्डीकरजी अपने ढंग पर देशसेवा के काम
में लगे हुए थे। हर्डीकरजी त्यागी समझदार तथा गभीर प्रकृति के विलक्षण व्यक्ति
हैं। लेकिन यदि हम ऐसे विलक्षण व्यक्ति के तेईस सालों के कामों की तुलना
सरदार भगतसिंह अथवा श्री यतीन्द्रनाथ दास अथवा चटगाँव आर्मरी केस के
श्री सूर्यकान्त सेन और बंगाल के दूसरे विप्लवी कार्यकर्ताओं के कार्यों से करें तो
उत्तर भारत में दल का विस्तार / 293
क्या हम यह कह सकेंगे कि भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन पर हर्डीकरजी का उतना
प्रभाव पड़ा है जितना कि क्रान्तिकारी आन्दोलन का पड़ा है ।
हर्डीकरजी गुप्त रीति से कोई दल नही बनाना चाहते थे । उनकी इच्छा थी
कि कांग्रेस में रहते हुए और उसकी छत्रछाया में कांग्रेस की मर्यादा से लाभ
उठाते हुए कांग्रेस नेतागणों के सहयोग से एक स्वयंसेवकों का विराट् दल बनाएं ।
आज भी हर्डीकरजी उसी काम में लगे हैं। लेकिन अब तक उन्हें कोई सफलता
नहीं प्राप्त हुई ।
भारत का विप्लव आन्दोलन कांग्रेस के नेतृत्व पर कुछ भी निर्भर नहीं
रहा। इसके विपरीत कांग्रेस आन्दोलन पर ही विप्लव आन्दोलन का यथेष्ठ प्रभाव
पड़ा । दृष्टान्त रूप में यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस के ध्येय में जो परिवर्तन
हुआ इसका सबसे बड़ा श्रेय विप्लव आन्दोलन को ही है। जिस समय भारत
के संतानगण विदेशों में जा-जाकर भारत को पूर्ण रूप से स्वतंत्र बनाने के लिए
जान की बाजी लगा रहे थे, जिस समय विदेशों में एक तरफ श्री एम० एन०
चटर्जी, श्री अब्दुल्ला, श्री महेन्द्र प्रताप एवं दूसरी ओर रासबिहारी बोस इत्यादि
भारतवर्ष को स्वतंत्र करने के लिए जी-जान से लगे हुए थे उस समय भारत मे
कांग्रेस के नेतागण प्रांतीय स्वराज्य लाभ करने के लिए प्रयत्न कर रहे थे । भारत
के उग्रपंथी व्यक्तियों ने बार-बार यह चेष्टा की कि भारत को पूर्ण रूप से स्वतन्त्र
करना कांग्रेस का ध्येय बन जाय लेकिन हर बार वे इसमें असफल रहे । भारत को
पूर्ण रूप से स्वतन्त्र करने के लिए कितने ही युवकों ने फांसी के तख्ते पर जीवन
बलि चढ़ा दी । साल के बाद साल गुज़रते गए। षड्यन्त्र रचे गए। ऐसा कोई मास
खाली नहीं गया जिसमे भारत के किसी-न-किसी प्रांत में राजनैतिक षड्यन्त्र के
मामले न चले । दो-दो तीन-तीन हज़ार नवयुवको को बिना उन पर किसी
प्रकार का मुकदमा चलाए पाँच-पाँच, दस-दस साल के लिए ब्रिटिश सरकार ने
जेलों मे बन्द रखा। क्या इन सब बातों का प्रभाव कांग्रेस के नेतागणों के मन पर
कुछ भी नही पड़ा ? सन् 1919 के दिसम्बर महीने में ब्रिटिश सरकार के घोषणा-
पत्र द्वारा विद्रोहियों के लिए विशेष रूप से सन्देश भेजा गया । एक ओर जैसे
भारत के शासन विधान में सुधार हुए दूसरी ओर भारत को ब्रिटिश पंजे के चंगुल
में सुरक्षित रखने के लिए रोलट कमेटी की सिडिशन रिपोर्ट के अनुसार काले
क़ानून बनाए गए। भारत के विप्लव आन्दोलन को कुचलने के लिए मुख्य रूप
से ये काले क़ानून बनाए गए थे । भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में महात्मा गांधी
ने सर्वप्रथम जब अपना क़दम रखा तो उन्होंने इस काले क़ानून के विरुद्ध ही
अपना आन्दोलन प्रारम्भ किया था। विप्लव आन्दोलन कुचला नहीं गया ।
महात्माजी का चलाया हुआ आन्दोलन भी बढ़ता गया । विप्लव आन्दोलन को
दबाने के लिए रोलट ऐक्ट बना । रोलट ऐक्ट .के विरुद्ध महात्मा गांधी का
सत्याग्रह आन्दोलन प्रारम्भ हुआ । पहले कांग्रेस का ध्येय प्रांतीय स्वराज्य लाभ
करना था । अहमदाबाद कांग्रेस में उग्रपंथियों ने अपनी सारी शक्ति कांग्रेस के
294 / बन्दी जीवन
उक्त ध्येय को बदलने के लिए लगा दी । बहुत वोटों से महात्माजी इसके विरुद्ध
जीत गए । लेकिन अन्त तक कम-से-कम कहने के लिए तो कांग्रेस के ध्येय में
परिवर्तन हो ही गया तो क्या यह कहना नितान्त भूल है कि कांग्रेस आन्दोलन पर
विप्लव आन्दोलन का यथेष्ठ प्रभाव पड़ा है ?
मिर्जापुर के बैरिस्टर श्री यूसुफ इमामजी तथा बुन्देलखण्ड के विशिष्ट व्यक्ति
दीवान शत्रुघ्नसिंहजी से हम लोगों की बातें हुईं । हम लोगों ने एक-दूसरे को
अच्छी तरह से समझ लिया । लेकिन विशेष दुःख की बात है कि मेरी अनुपस्थिति
मे इन लोगों से किसी ने कुछ काम नही लिया । आज भी सांप्रदायिकता की
लहर में यूसुफ इमाम साहब पूर्ण राष्ट्रीयतावादी हैं । दीवान शत्रुघ्नसिंहजी एवं
यूसुफ इमाम साहब दोनों ने ही कांग्रेस आन्दोलन में पूर्णरीति से भाग लिया ।
आज भी सच्चे देशभक्तों की भाँति ये दोनों सज्जन राष्ट्रीय क्षेत्र में काम कर रहे
हैं ।
भारत के विप्लव आन्दोलन के लिए यह विशेष दुःख की बात थी कि विप्लव
आन्दोलन के नेताओं को प्रकाश्य आन्दोलन में भाग लेने का अवसर नही प्राप्त
हुआ । यह भी एक कारण है जिसके लिए भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन पर विप्लव
आन्दोलन का जितना प्रभाव पडना चाहिए था उतना नही पड़ा । इसलिए
अण्डमन से मुक्त होने पर मेरी इच्छा थी कि मैं भी प्रकाश्य आन्दोलन में भाग
लूँ । देहली मे कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के समय मैने देशवासियो के प्रति
एक अपील निकाली थी । इस अपील में एक नया कार्यक्रम किया गया था —
भारत को पूर्ण रूप से स्वतंत्र करना है इस ध्येय पर विशेष जोर देते हुए एशिया
की विभिन्न पद-दलित जातियो का एक राष्ट्र संघ बनाने की कल्पना के अनुसार
इस अपील में कार्यक्रम दिया गया था । इसके अतिरिक्त मजदूर संगठन के बारे
में भी इस कार्यक्रम में विशेष ध्यान दिया गया था । राष्ट्रीय समस्याओं को भली
प्रकार समझने वाले चैतन्यवान त्यागी दृढ़ संकल्पयुक्त देशप्रेमियों को लेकर
स्वयंसेवकों का देशव्यापी एक विराट् दल बनाने का संकल्प भी इस कार्यक्रम
में था । इस प्रकार थोडे शब्दो में ओजस्विनी अंग्रेजी भाषा में अपने कार्यक्रम
का स्पष्ट चित्र खींचते हुए मैने यह अपील निकाली थी । प्रोफेसर जितेन्द्रलाल
बनर्जी अंग्रेजी के प्रसिद्ध शक्तिशाली लेखक है । इस अपील को पढ़कर उन्होंने
यह जानना चाहा था कि इस अपील की अंग्रेजी किसने लिखी है । मेरे साथ बंगाल
के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी नेता श्री विपिन चन्द्र गांगुली थे । उन्होने बनर्जी साहब
को मेरा नाम बताया । मैं श्री विपिन गांगुली को लेकर इस अपील पर जितेन्द्रलाल
बनर्जी के हस्ताक्षर कराने गया था । डेलीगेट की हैसियत से मैं देहली कांग्रेस
में आया था । मेरा नाम इस अपील के बिलकुल अन्त में था । जहाँ तक मुझे
स्मरण है सबसे पहले श्रीयुत विपिनचन्द्र गागुली के हस्ताक्षर थे । इस अपील में
आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी के बहुत-से सदस्यों के हस्ताक्षर थे । इस अपील के
निकालने के साथ-साथ हम एक प्रकाश्य आन्दोलन की सृष्टि करना चाहते थे ।
उत्तर भारत में दल का विस्तार / 295
इस काम में विपिन गांगुली की पूर्ण सहानुभूति थी। उन्होंने यह कहा था कि वे
ऐसा आन्दोलन तो खूब चाहते हैं लेकिन कठिनाई तो पैसे की है। अर्थ के बिना
कोई भी आन्दोलन चलाया नहीं जा सकता। मुझे कुछ अर्थ पाने की पूर्ण आशा
थी। इसलिए मैं इस कार्य में पूर्ण उद्यम से लगना चाहता था। गांगुली साहब ने
मुझे यह वचन दिया था कि पैसे की बात को छोड़कर अन्य सब बातों में वे मेरे
साथ पूर्ण रूप से सहयोग करेंगे।
इस अपील को लेकर मे सुभाष बाबू के पास भी गया था। उन्होंने इस
अपील को बहुत गम्भीर तथा शान्तचित्त होकर पढ़ा। इस विषय पर मेरे साथ
उनका कुछ वाद-विवाद भी हुआ। सुभाष बाबू का कहना था कि अभी वह समय
नही आया है कि मे कांग्रेस के कार्यक्रम से भिन्न किसी अन्य कार्यंक्रम को लेकर
चलूँ । उनका यह भी कहना था कि एक ही व्यक्ति के लिए गोपनीय एवं प्रकाश्य
आन्दोलन मे काम करना उचित नहीं है।
सुभाष बाबू के साथ क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे मे बातचीत करने का
मेरा यह प्रथम अवसर था। मे चाहता था कि सुभाष बाबू हमारे आन्दोलन का
नेतृत्व ग्रहण करे। नेतृत्व के बारे मे मेरे दिल मे कोई ऐसी भावना नही थी कि मैं
दूरा रे का नेतृत्व स्वीकार न करूँ। वरन सुभाष बाबू को यदि मे अपने नेता के
पद पर बैठा सकता तो मेरे आनन्द की सीमा न रहती। यही सब बातें मैने
सुभाष बाबू को समझानी चाही। सुभाष बाबू ने एकाग्रचित्त होकर मेरी बाते
तो सब सुन ली परन्तु उन्होने अपना कोई स्थिर मत नही व्यक्त किया। उन्होंने
बार-बार यही कहा कि अभी मेरा समय नही आया है। अन्त मे यह निश्चय
हुआ कि मे उनमें कलकत्ते मे फिर मिलूं। इस निश्चय के अनुसार मे उनसे
कलकत्ते में फिर मिला। यथास्थान इसका वर्णन विस्तारपूर्वक आगे किया
जाएगा। सुभाष बाबू ने मेरी लिखी हुई अपील पर अन्त तक हस्ताक्षर नही
किए।
बंगाल के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी दल अनुशीलन समिति के नेताओं के पास भी
मे गया था। अब तक इस समिति के साथ मेरा बिगड़ा हुआ सम्बन्ध सुलझा
नही था। इसलिए मुझे इस बात का विशेष आग्रह न था कि अनुशीलन समिति
के नेतागण मेरी अपील पर अवश्य ही अपने हस्ताक्षर कर दें। थोडे शब्दों में
मैंने उन्हें अपना आशय समझाया। पहले तो उन्होंने अपने हस्ताक्षर देने में
आनाकानी की। मैने भी उनसे अधिक अनुरोध नही किया। उनकी इस आना-
कानी को देखकर मैने भी कुछ लापरवाही से यह कह दिया कि यदि आप इस
अपील पर हस्ताक्षर करना उचित न समझें तो न कीजिए। मेरी उदासीनता
को देखकर वे कुछ सोच में पड़ गए। न जाने क्या समझकर मुझसे उन्होंने
कहा कुछ देर ठहर जाएँ हम आपस में परामर्श कर लें। कुछ देर के बाद उनमे
से कुछ ने प्रतिनिधि की हैसियत से अपील पर हस्ताक्षर कर दिए। लेकिन
उनका दृष्टिकोण कुछ ओर ही था। मे यह चाहता था कि क्रान्तिकारी नेतागण
296 / बन्दी जीवन
अपने मौलिक कार्यक्रम को लेकर प्रकाश्य रूप से राजनैतिक क्षेत्र में अवतीर्ण हों।
कलकत्ता क्रान्तिकारी दल के नेता श्री विपिनचन्द्र गांगुली ने तो इस बात के
महत्त्व को अनुभव किया परन्तु अनुशीलन समिति के नेताओं ने इसे व्यर्थ
समझा।
इस अपील को लेकर मैं देशबन्धुदास के पास भी गया था। अपील पढ़कर
दासजी कुछ हँसे और बोले कि कौंसिल प्रवेश का कार्यक्रम इसमें क्यों नहीं
रक्खा। मैंने भी हंसकर कहा कि कौंसिल प्रवेश के कार्यक्रम से तो हम सहमत
हैं ही यदि अन्य सब बातों से आप सहमत हों तो इस कार्यक्रम को भी इस अपील
में रखा जा सकता है। मैं जानता था कि दासजी इसमें अपना हस्ताक्षर न देंगे।
दासजी उस समय एक ही बात पर अपनी पूरी शक्ति लगा रहे थे। कौंसिल
प्रवेश को छोड़कर और किसी प्रश्न पर उनका ध्यान न था।
इस सिलसिले में एक विचित्र बात से मुझे बहुत लाभ हुआ। मुझे यह
अपील छपवानी थी। (इसके लिए मेरे पास पैसे न थे।) देहली की जिस
धर्मशाला में मैं ठहरा था उसी में मेरे दल के कुछ साथी भी थे। यह अपील
मैंने उनके परामर्श से उसी धर्मशाला में बैठकर लिखी थी। उसी समय मेरे एक
साथी ने मुझे नोटों का एक बंडल दिया और कहा कि ये रुपए उसे अमुक कमरे
में मिले थे। यदि उस व्यक्ति का पता चल जाय जिसका यह रुपया है तो उसे दे
दिया जाएगा अन्यथा इसे अपने काम में लगाया जाय। मैं मन-ही-मन ऐसा
सोचता था कि यदि कोई रुपया मांगनेवाला न आए तो अच्छा हो। मुझे हर
घड़ी यही चिन्ता थी कि कोई मांगनेवाला तो नहीं आ रहा है। परन्तु सौभाग्य
से न किसी ने रुपया मांगा न रुपया खोने की उस धर्मशाला भर में कोई चर्चा
ही हुई। इस बंडल में पछत्तर रुपये के नोट थे। देहली के एक आर्यसमाजियों के
प्रेस से यह अपील छपवाई थी। शीघ्रता के कारण प्रेस ने अपील की छपवाई के
दाम अधिक ही लिए थे। इस बात की सुविधा मुझे अवश्य मिली कि इस प्रेस ने
मेरी अपील छाप तो दी, सम्भव था कि दूसरे प्रेस इस काम को न करते।
इन छपे हुए अपीलपत्रों को कांग्रेस पंडाल के अन्दर हम लोगों ने बाँटना
चाहा लेकिन स्वयंसेवकों ने ऐसा करने से हम लोगों को रोका। तब प्रोफेसर
जितेन्द्रलाल बनर्जी की सहायता से हम स्वयंसेवकों के सरदार श्री आसफअली
के पास पहुंचे। आसफअली साहब ने वायदा किया कि वे अपने स्वयंसेवकों की
सहायता से इस अपील को पंडाल के अन्दर बंटवा देंगे। हमने इस अपील की पांच
हजार प्रतियां छपवाई थीं। लगभग दो या तीन सौ प्रतियां अपने पास रखकर
बाकी सब प्रतियाँ आसफअली को दे दीं। लेकिन बाद को हमें यह देखकर बड़ा
आश्चर्य हुआ कि उनमें से एक प्रति भी किसी को नहीं दी गई थी।
इस अपील की प्रतियाँ मैंने भारत के भिन्न-भिन्न प्रान्तों के सम्वादपत्रों को
भेज दीं लेकिन भारत के किसी पत्र ने इस अपील को नहीं छापा। इसकी कुछ
प्रतियाँ जापान में श्री रासबिहारी एवं अमेरिका में श्री तारकनाथदास के पास भी
उत्तर भारत में दल का विस्तार / 297
भेज दी। अमेरिका के लिए प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्र 'दि न्यू रिपब्लिक' मे यह अपील
ज्यो-की-त्यों छप गई और उसके साथ श्री तारकनाथदासजी ने भी इस अपील के
महत्त्व के बारे मे एक लेख लिखा। जापान से रासबिहारी बोस ने उस पत्र की
एक प्रति मेरे पास भेजी थी। सम्भवतः इस अपील की एक प्रति महात्माजी के
यंग इण्डिया को भी भेजी गई थी। भारत मे इस अपील के विषय मे कोई चर्चा
नही हुई।
बंगाल के उपन्यासकार श्री शरत्चन्द्र चटर्जी से एक सम्वाद सुनकर हम
चकित हो गए। शरत् बाबू भी हम लोगो की भाँति महात्माजी के अन्ध भक्त
नही थे। यो तो बंगाल के अधिकांश व्यक्ति महात्माजी के अन्ध भक्त नही है
फिर भी जब शरत् बाबू जैसे व्यक्ति की सम्मति हमारी सम्मति से मिल गई तो
हमे बडी खुशी हुई। इस प्रकार महात्माजी के बारे मे चर्चा करते समय वारदोली
के सत्याग्रह को इसलिए स्थगित नही किया गया था कि चौरीचौरा मे हिंसात्मक
काण्ड हो गया बल्कि बारदोली के किसान पहले ही से सालभर का लगान
सरकार को दे चुके थे। केवल इतना ही नही यह भी खबर थी कि बारदोली के
किसानो ने अपनी हटाने योग्य सारी वस्तुएँ अपने मकानों से अलग कर दी थी।
गुजरात के एक सब डिवीजनल अफ़सर ने यह संवाद महात्माजी को दिया था इस
पर महात्माजी ने अपने विश्वस्त व्यक्ति को बारदोली भेजा था। उसने भी
महात्माजी के पास एस० डी० ओ० की बातों को सही बताया। ऐसी अवस्था मे
बारदोली के सत्याग्रह आन्दोलन को स्थगित कर देने के अतिरिक्त महात्मा के
पास और रास्ता ही क्या रह गया था।
उत्तर भारत के विप्लववादी आन्दोलन के सम्बन्ध में देहली के कांग्रेस
अधिवेशन के विशेष अवसर पर दो महत्त्वपूर्ण बाते हुई थी जिनका उल्लेख इस
स्थान पर करना विशेषतः आवश्यक है।
कांग्रेस के इस अधिवेशन के पहले ही मै इलाहाबाद के श्री पुरुषोत्तमदास
टंडन से भली प्रकार परिचित हो चुका था। टंडनजी अच्छी तरह से जानते थे
कि हम लोग गुप्त रीति से क्रान्तिकारी आन्दोलन मे लगे हुए हैं। हम लोगों के
प्रति उनकी पूर्ण सहानुभूति थी। परन्तु वास्तविक क्षेत्र में हम लोगों ने उनकी
सहानुभूति से कुछ लाभ नही उठा पाया। टंडनजी अपरिवर्तनवादी थे। देहली
कांग्रेस मे यह प्रस्ताव पास हो गया कि कांग्रेस जन लेजिस्लेटिव कौंसिल के सदस्य
बनकर उसके कार्य मे भाग ले सकते हैं। सत्याग्रह आन्दोलन एक बार व्यर्थ हो
चुका था। अपना आन्दोलन समाप्त होने पर महात्माजी राजनीतिक क्षेत्र से
कुछ दिनो के लिए अलग हो जाते हैं। किसी आन्दोलन के विफल हो जाने पर
जनता मे अवसाद छा जाता है। आशा भंग के आघात से जब जनता उत्साह
और उद्यमहीन हो जाती है ऐसी अवस्था में महात्माजी कार्यक्षेत्र से अलग हो
जाते हैं। अवसाद के दिनों में अन्य नेतागण राष्ट्रीय आन्दोलन को चलाते हैं।
फिर जब आन्दोलन उग्र रूप धारण करता है तो फिर महात्माजी कार्य क्षेत्र में
298 / बन्दी जीवन
अवतीर्ण होते हैं। सन् 1921 के सत्याग्रह आन्दोलन के समय महात्माजी कौंसिल
प्रवेश के विरोधी थे और देशबन्धु दास, पण्डित मोतीलाल नेहरू और लाला
लाजपतराय इत्यादि कुछ नेता गण कौंसिल प्रवेश के पक्ष में थे। पं० जवाहर-
लाल श्री पुरुषोत्तमदासजी टंडन इत्यादि नेतागण महात्माजी की तरह कौंसिल
प्रवेश के विरोधी थे। देहली कांग्रेस में दास पक्ष की विजय हुई। ऐसी परिस्थिति
में मैंने टंडनजी से यह आग्रह किया कि अब समय आया है कि कांग्रेस ध्येय
में परिवर्तन करने की चेष्टा की जाय। अपनी विशेष मानसिक परिस्थिति
के कारण टंडनजी ने अबकी बार मेरे परामर्श को स्वीकार कर लिया। जहाँ
तक मुझे स्मरण है बाबू राजेन्द्रप्रसादजी ने भी खुले अधिवेशन में टंडनजी के
प्रस्ताव का समर्थन किया था। टंडनजी ने यह प्रस्ताव किया था कि कांग्रेस के
ध्येय में अब परिवर्तन करने का समय आया है। इस प्रस्ताव के समर्थकों में मेरा
नाम भी था। परन्तु मेरे बोलने का समय आने से पहले ही मौलाना अबुलकलाम
आजाद जी सभापति के आसन से कुछ देर के लिए हट गये थे और उस समय
श्री दास जी सभापति के आसन पर बैठे थे। मैंने तो मन ही मन समझा कि मुझे
अच्छा अवसर मिला। परन्तु दुर्भाग्य से मौलाना मुहम्मदअली बोलने को खड़े
हो गये और लगभग डेढ़ या दो घण्टे तक बोलते ही रहे। दासजी उन्हें बोलने
से रोकना नहीं चाहते थे। इसके बाद मुझे बोलने का अवसर नहीं मिला।
टंडनजी पूर्ण स्वाधीनता के ध्येय को तो पसन्द करते थे। परन्तु इस ध्येय
को कार्यरूप में परिणत करने के लिए जीवन में उन्होंने क्या प्रयत्न किये यह
मुझे ज्ञात नहीं है। देहली अधिवेशन के बाद कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में भी
उन्होंने कांग्रेस के ध्येय को बदलने की कोई चेष्टा की या नहीं मुझे पता नहीं।
हिंसा-अहिंसा के प्रश्न पर भी उनकी नीति क्रान्तिकारियों अथवा श्री अरविन्द या
लोकमान्य तिलक की नीति से भिन्न न थी। श्री तिलक ने गीता रहस्य लिखकर
अपने दार्शनिक सिद्धान्त को युक्ति एवं भारतीय दर्शन के आधार पर सुप्रतिष्ठित
करने की चेष्टा की। श्री अरविन्द ने सालों तक दैनिक एवं साप्ताहिक पत्रों में
अपने राष्ट्रीय एवं दार्शनिक सिद्धान्तों का प्रचार किया। उस समय भारत एवं
विशेषकर बंगाल में सशस्त्र क्रान्ति की लहर उमड़ रही थी। अकाली सिक्खों
की तरह उन्होंने भी कभी विप्लव आन्दोलन की निन्दा नहीं की। प्रकाश्य
आन्दोलन के सम्पर्क में अथवा व्यक्तिगत जीवन में उन्होंने कभी भी हिंसा और
अहिंसा के सिद्धान्त पर राजपुरुषों के दृष्टिकोण से अपने पक्ष को दुर्बल नहीं
किया। देशबन्धुदासजी ने भी अपने देहावसान के कुछ दिन पहले तक अपनी
नीति तिलक और अरविन्द की भाँति स्थिर रखी। जब कलकत्ते के पुलिस
कमिश्नर टेगार्ट की भूल में 'डे' साहब मारे गए तो बंगाल प्रान्तीय कांग्रेस
कमेटी में 'डे' साहब के मारनेवाले श्री गोपीमोहन के प्रति सम्मान एवं प्रीति
सूचक प्रस्ताव पास किया गया था। इस प्रस्ताव के पास कराने में देशबन्धुदास
जी की पूर्ण सहायता थी। महात्माजी इस बात से एकदम बिगड़ गए एवं
उत्तर भारत में दल का विस्तार / 299
महात्माजी ही के कारण अ० भा० कमेटी मे बंगाल प्रान्तीय काग्रेस कमेटी के
प्रस्ताव के विरुद्ध दूनरा प्रस्ताव लाया गया। दासजी अपने प्रस्ताव पर डटे
रहे। अवश्य महात्माजी को अधिक वोट मिले फिर भी गोपीमोहन शाह की
प्रशंसा मे जो प्रस्ताव पहले पास हो चुका था उसके पक्ष मे भी यथेष्ठ वोट
आये। महात्माजी अपने व्यक्तित्व के कारण जीत तो अवश्य गए परन्तु उन्होंने
स्वय ऐसा कहा था कि दासजी के पक्ष मे भी इतने वोट आए इससे यह स्पष्ट
प्रतीत होता है कि अहिंसा का पक्ष अभी प्रबल नही हुआ। महान् आश्चर्य की
बात तो यह है कि सरदार भगतसिंह की प्रशंसा मे कराची काग्रेस में महात्माजी
के ही परामर्श एव सहायता से एक विशेष प्रस्ताव पास हुआ। इससे भी आश्चर्य
की बात यह है कि विलायत मे राउण्ड टेबुल काफ्रेम मे जाने के पहले बम्बई
मे अ० भा० काग्रेम कमेटी की बैठक मे कराची के इस भगतसिंह के प्रशंसा-
सूचक प्रस्ताव के विरुद्ध एक अन्य प्रस्ताव पास किया गया। ओर कराची वाले
प्रस्ताव को वापस कर लिया गया। इस प्रकार हिंसा अहिंसा की नीति पर काग्रेस
आन्दोलन मे जितनी बार प्रश्न उठ खड़े हुए टंडनजी ने कभी भी महात्माजी के
विरुद्ध अपने पक्ष का समर्थन नही किया।
व्यक्तिगत जीवन मे टंडनजी महान् त्यागी पुरुष हैं। जिस समय आप
लाहौर के एक बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर थे लाला लाजपतराय का देहान्त हो
गया। लाला जी लोक सेवक सघ के अध्यक्ष थे। महात्माजी के कहने पर
टंडनजी ने मैनेजिंग डायरेक्टरी छोड़कर लोक सेवक सघ का कार्यभार अपने
ऊपर ले लिया। सन् 21 के सत्याग्रह आन्दोलन के समय टंडनजी ने वकालत
छोड़ दी और उमके बाद उन्हें बहुत आर्थिक कष्ट सहने पड़े। फिर भी कभी
उन्होंने किसी के सामने हाथ नही फैलाये। इसके अतिरिक्त महात्माजी के
राष्ट्रीय आन्दोलन मे आने के बहुत पहले से ही टंडन जी अपने व्यक्तिगत जीवन
मे अहिंसा नीति का पालन करते आए है। आप इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी
'क्रीपसोल' वाले कैनबेस के जूते पहनकर वकालत करने आते थे। राष्ट्रीय
आन्दोलन के क्षेत्र मे आप सदा ही क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रति हार्दिक
सहानुभूति रखते थे। लेकिन ये सब बाते होते हुए भी भारतीय क्रान्तिकारी
आन्दोलन का यह बड़ा दुर्भाग्य है कि टंडनजी जैमे महानुभाव ने इस आन्दोलन
मे सक्रिय रूप से भाग नही लिया। बहुत कहने-सुनने पर काग्रेस के देहली
अधिवेशन में आपने स्वाधीनता का प्रश्न उठाया था।
राष्ट्रीय आन्दोलन के बड़े-बड़े नेताओं के विषय में में इसलिए इतनी बातें
लिख रहा हूँ कि पाठकों को इन महानुभावों की मनोवृत्तियों से परिचित होने
का अवसर मिले। यह कहना अत्यन्त कठिन है कि भविष्य में भारतीय क्रान्ति-
कारी आन्दोलन कैसा रूप ग्रहण करेगा। परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि भारत के
इतिहासकारों को भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का विश्लेषण करना पड़ेगा।
मुझे आशा और विश्वास है कि मेरे इतिहास से भविष्य के इतिहास लेखकों को
300 / बन्दी जीवन
सहायता मिलेगी। इसी अभिलाषा मे मैने इस इतिहास को लिखना प्रारम्भ
किया है।
आज तो काग्रेस ने अवश्य ही यह स्वीकार कर लिया है कि पूर्ण स्वाधीनता
प्राप्त करना ही हमारा ध्येय है परन्तु इस स्थिति पर पहुँचने के लिए काग्रेस मे
वर्षों तक मर्मान्तक द्वन्द्व हुए है और देहली के अधिवेशन मे ही इसकी सर्वप्रथम
चेष्टा हुई थी यह बात भी स्मरण रखने योग्य है।
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क्रान्तिकारी दल और कम्यूनिस्ट
अब एक दूसरी विशेष महत्त्वपूर्ण बात का उल्लेख कर रहा हूँ। देहली में
एक और व्यक्ति से मेरी मुलाक़ात हुई। आपकी आयु अनुमान से तीस वर्ष की
रही होगी। आपसे मेरा पूर्व परिचय न था। आपका नाम कुतुबुद्दीन अहमद था।
अपना परिचय देते हुए आपने बताया कि वे श्री मानवेन्द्रनाथ राय के आदमी
हैं। इस परिचय से मेरे मन में बड़ा हर्ष और कुतूहल हुआ। कुतुबुद्दीन साहब ने
बड़े प्रेम से कहा में बहुत दिनों से आपसे मिलना चाहता था। मानवेन्द्र राय ने
आपको मास्को बुलाया है। वहाँ कम्यूनिस्ट इण्टर नेशनल कांग्रेस होने जा रही
है। राय साहब की इच्छा है कि आप भी उस समय पर उपस्थित हों। विशेष-
कर आप ही से मिलने के लिए में देहली आया हूँ।" मैंने कहा, "कम्यूनिज्म के
बारे में मैं ठीक-ठीक मब बातें नहीं जानता।" कुतुबुद्दीन साहब ने उत्साहपूर्वक
कहा, "आपको यह सब बातें समझाना मेरा काम है।"
में तो कम्यूनिज्म के बारे में सब बाते पहले ही से अच्छी तरह जानना
चाहता था। कुतुबुद्दीन माहब का प्रस्ताव तो मेरे लिए एक सौभाग्य की बात
थी। उनके साथ बहुत देर तक मेरी बातचीत हुई। कुतुबुद्दीन साहब से ही मैंने
जीवन में सर्व प्रथम कम्यूनिज्म के मूल तत्व को यथार्थ रूप में समझा। मेरे
जीवन की यह एक महान् ऐतिहासिक घटना है।
कुतुबुद्दीन साहब ने मुझसे कहा कि कम्यूनिज्म का ध्येय है समाज की ऐसी
व्यवस्था करना जिससे समाज की कोई भी सम्पत्ति किसी व्यक्ति के हाथ में न
रहकर समाज के हाथ मे रहे। यह सुनते ही मेरे मन में हिन्दुओं के संन्यास आश्रम
की बात आई इसलिए उसी क्षण मैंने कहा कि यह तो मनुष्य जीवन की चरम
उन्नति पर निर्भर है। मनुष्य जीवन की अन्तिम उन्नति हुए बिना कैसे यह
सम्भव है कि समाज की सम्पत्ति व्यक्ति के हाथ में न रहकर समाज के हाथ में
चली जाय। यह सुनकर कुतुबुद्दीन साहब ने कहा कि नहीं क्रान्ति के भागं से
भी समाज व्यवस्था ऐसी बनाई जा सकती है जिसके परिणाम में सम्पत्ति
व्यक्ति के हाथ मे से समाज के हाथ में चली जाय एवं उसी अवस्था में शिक्षा-
दीक्षा की सहायता से मनुष्य की चरम उन्नति संभव होगी। मेरे लिए यह
एकदम नई कल्पना थी। मैं थोड़े समय के लिए चकित-सा रह गया। और मुझे