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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 408 में से

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पृष्ठ 284

282 / बन्दी जीवन
पर देशबन्धुदासजी से परामर्श किया था उस समय मैं कलकत्ता फरार हालत में
नहीं आया था। परिपक्व बुद्धि न रहने के कारण एवं दुनियादारी की बातों से
एकदम अपरिचित रहने के कारण मैंने देशबन्धुदास को अपना विरोधी बना लिया
था। मेरी गिरफ्तारी के बाद बंगाल प्रान्तीय राजनीतिक कांफ्रेंस के अवसर पर
विचारालय से दण्ड प्राप्त न होने पर भी जो सैकड़ों युवकों को जेलों में बन्द कर
दिया गया था उस सम्बन्ध में जो आलोचना हुई थी उस समय देशबन्धु दासजी
ने खुले जलसे में यह कहा था कि नज़रबन्द राजबन्दियों में सभी व्यक्ति निर्दोष
नहीं हैं इसलिए सब नज़रबन्दों की मुक्ति के लिए प्रयत्न करना युक्ति-संगत एवं
न्याय-संगत नहीं होगा। प्रान्तीय कांफ्रेंस में देशबन्धु दासजी की इन बातों का
प्रचंड विरोध हुआ था। विरोध होने पर भी देशबन्धु दासजी ने स्पष्ट शब्दों में
कांफ्रेंस के सामने यह प्रश्न रखा था कि क्या आप लोग कहना चाहते हैं कि शचीन्द्र-
नाथ सान्याल निर्दोष व्यक्ति हैं। इस बात पर कांफ्रेंस में घोर वाद-विवाद हुआ
था एवं देशबन्धुदासजी से यह कहा गया था कि यदि श्री सान्याल निर्दोष व्यक्ति
नहीं हैं तो खुले इजलास में उनका विचार क्यों नही होता। सम्भव है कि सरकार
के खुफिया विभाग से आपको कुछ खबर मिली हो। लेकिन कांफ्रेंस के सामने ऐसी
कोई बात नही है जिससे हम शचीन्द्रबाबू के विरुद्ध खुले सम्मेलन में आपकी तरह
कुछ कहें। खुले सम्मेलन मे सभी पार्टियों के व्यक्तियों ने मेरे पक्ष मे सी० आर०
दास जी के विरुद्ध आवाजें उठाईं थी। हमारे देश के गण्यमान्य नेताओं की मनो-
वृत्ति का परिचय इन सब बातों से खूब मिल सकता है। क्रान्तिकारी आन्दोलन
प्रधान रूप में गुप्त रीति से ही चल रहा था। इस आन्दोलन के विरुद्ध प्रकाश्य
रूप में कटूक्ति करना बहुत आसान बात थी। कारण कि इन कटूक्तियों का उत्तर
देना सब समय क्रान्तिकारियों के लिए आसान नही होता था क्योकि उन्हे तो
गुप्त रीति से ही काम करना पड़ता था। हमारे देश के प्रायः सभी गण्यमान्य
नेताओं ने इस आन्दोलन के प्रति अनेकों बार अनेकों प्रकार से कटूक्ति की है।
यदि किसी ने इन सब कटूक्तियों के विरुद्ध कुछ कहने का साहस किया तो हमारे
देश के गण्यमान्य लब्ध-प्रतिष्ठित नेता गणों ने उसकी खबर लेने की खूब चेष्टा की
है। लेकिन इसमे एक विशेष अपवाद अवश्य है वह है महात्मा गांधी। महात्मा
गांधी ने भी बेलगांव कांग्रेस मे क्रान्तिकारियो के प्रति भीषण कटूक्ति की थी।
लेकिन जब मैंने उन कटूक्तियों का प्रत्युत्तर महात्माजी के पास भेजा तो महात्माजी
ने विशेष उदारता एवं न्याय निष्ठा के साथ मेरे प्रत्युत्तर को ज्यों-का-त्यों 12
फरवरी सन् 1925 के 'यंग इंडिया' में छाप दिया था और बाद को उन्होंने अपने
मन्तव्य को भी उसी प्रत्युत्तर के अन्त मे छाप दिया था। इसके लिए आज भी
मेरा हृदय महात्माजी के श्री चरणों का स्पर्श करता है।
एक दफे की बात है, किसी काम से मैं कलकत्ता आया था। श्री सी० आर०
दासजी से मेरी खूब बहस हुई थी। दास और मुझे छोड़कर उस कमरे में एक
व्यक्ति और थे। ये सज्जन बंगाल के प्रसिद्ध नेता श्री अश्विनीकुमार दत्त के भाई