बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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अपने मौलिक कार्यक्रम को लेकर प्रकाश्य रूप से राजनैतिक क्षेत्र में अवतीर्ण हों।
कलकत्ता क्रान्तिकारी दल के नेता श्री विपिनचन्द्र गांगुली ने तो इस बात के
महत्त्व को अनुभव किया परन्तु अनुशीलन समिति के नेताओं ने इसे व्यर्थ
समझा।
इस अपील को लेकर मैं देशबन्धुदास के पास भी गया था। अपील पढ़कर
दासजी कुछ हँसे और बोले कि कौंसिल प्रवेश का कार्यक्रम इसमें क्यों नहीं
रक्खा। मैंने भी हंसकर कहा कि कौंसिल प्रवेश के कार्यक्रम से तो हम सहमत
हैं ही यदि अन्य सब बातों से आप सहमत हों तो इस कार्यक्रम को भी इस अपील
में रखा जा सकता है। मैं जानता था कि दासजी इसमें अपना हस्ताक्षर न देंगे।
दासजी उस समय एक ही बात पर अपनी पूरी शक्ति लगा रहे थे। कौंसिल
प्रवेश को छोड़कर और किसी प्रश्न पर उनका ध्यान न था।
इस सिलसिले में एक विचित्र बात से मुझे बहुत लाभ हुआ। मुझे यह
अपील छपवानी थी। (इसके लिए मेरे पास पैसे न थे।) देहली की जिस
धर्मशाला में मैं ठहरा था उसी में मेरे दल के कुछ साथी भी थे। यह अपील
मैंने उनके परामर्श से उसी धर्मशाला में बैठकर लिखी थी। उसी समय मेरे एक
साथी ने मुझे नोटों का एक बंडल दिया और कहा कि ये रुपए उसे अमुक कमरे
में मिले थे। यदि उस व्यक्ति का पता चल जाय जिसका यह रुपया है तो उसे दे
दिया जाएगा अन्यथा इसे अपने काम में लगाया जाय। मैं मन-ही-मन ऐसा
सोचता था कि यदि कोई रुपया मांगनेवाला न आए तो अच्छा हो। मुझे हर
घड़ी यही चिन्ता थी कि कोई मांगनेवाला तो नहीं आ रहा है। परन्तु सौभाग्य
से न किसी ने रुपया मांगा न रुपया खोने की उस धर्मशाला भर में कोई चर्चा
ही हुई। इस बंडल में पछत्तर रुपये के नोट थे। देहली के एक आर्यसमाजियों के
प्रेस से यह अपील छपवाई थी। शीघ्रता के कारण प्रेस ने अपील की छपवाई के
दाम अधिक ही लिए थे। इस बात की सुविधा मुझे अवश्य मिली कि इस प्रेस ने
मेरी अपील छाप तो दी, सम्भव था कि दूसरे प्रेस इस काम को न करते।
इन छपे हुए अपीलपत्रों को कांग्रेस पंडाल के अन्दर हम लोगों ने बाँटना
चाहा लेकिन स्वयंसेवकों ने ऐसा करने से हम लोगों को रोका। तब प्रोफेसर
जितेन्द्रलाल बनर्जी की सहायता से हम स्वयंसेवकों के सरदार श्री आसफअली
के पास पहुंचे। आसफअली साहब ने वायदा किया कि वे अपने स्वयंसेवकों की
सहायता से इस अपील को पंडाल के अन्दर बंटवा देंगे। हमने इस अपील की पांच
हजार प्रतियां छपवाई थीं। लगभग दो या तीन सौ प्रतियां अपने पास रखकर
बाकी सब प्रतियाँ आसफअली को दे दीं। लेकिन बाद को हमें यह देखकर बड़ा
आश्चर्य हुआ कि उनमें से एक प्रति भी किसी को नहीं दी गई थी।
इस अपील की प्रतियाँ मैंने भारत के भिन्न-भिन्न प्रान्तों के सम्वादपत्रों को
भेज दीं लेकिन भारत के किसी पत्र ने इस अपील को नहीं छापा। इसकी कुछ
प्रतियाँ जापान में श्री रासबिहारी एवं अमेरिका में श्री तारकनाथदास के पास भी