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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 408 में से

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पृष्ठ 287

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उत्तर भारत में दल का विस्तार

मुझे युक्तप्रान्त एवं पंजाब का बार-बार दौरा करना पड़ा और जब मैंने
समझ लिया कि उन प्रदेशों का काम अन्य व्यक्तियों पर छोड़कर दूसरी जगह
जाया जा सकता है तब मैं अपने बाल-बच्चों को साथ लेकर फरार हालत में
कलकत्ता चला आया। लेकिन इसके पहले पंजाब में और विशेष रूप से युक्तप्रान्त
में क्रान्ति का कार्य बहुत कुछ आगे बढ़ा था। यहाँ अपने साध्य के अनुसार उसका
परिचय देने की मैं चेष्टा करता हूँ।
सन् 1923 के प्रारम्भ में युक्तप्रान्त एवं पंजाब में मैंने कम-से-कम बीस या
पच्चीस विप्लव केन्द्र स्थापित कर लिए थे। सन् 1923 में मैंने दिल्ली में कांग्रेस
के विशेष अधिवेशन में भाग लिया था। उस समय तक ढाका अनुशीलन समिति के
साथ मेरा कोई सम्बन्ध नही था। देहली में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के बाद
ही मैंने अपने संगठन का नाम 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' रख दिया था
और इस नामकरण के अवसर पर ही अपने संगठन का लक्ष्य एवं साधन इत्यादि
को लेते हुए एक परिपूर्ण नियमावली बनाई थी। इस प्रकार पौर्वापर्य निर्णय करने
के लिए मेरे पास कुछ साधन मौजूद हैं
जब मैं जमशेदपुर मे श्रमजीवियों के आन्दोलन में काम कर रहा था उसी
समय मैं क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए धन मिलने की व्यवस्था भी कर रहा था।
मेरे परम सौभाग्य से एक महानुभाव धनी व्यक्ति ने मुझे मासिक एक सौ पचास
रुपए देने का वचन दिया था। मेरी गिरफ्तारी के बाद भी ये महानुभाव नियम-
पूर्वक प्रति मास एक सौ पचास रुपए देते गए। इन्ही रुपयो से हम लोगों का रेल
खर्च इत्यादि निकल आता था। ढाका अनुशीलन समिति के साथ सम्बन्ध स्थापित
होने के पहले तक युक्तप्रान्त या पंजाब में हम लोगों ने कभी कोई डकैती नही
की। जो सज्जन हमे प्रतिमास एक सौ-पचास रुपए देते थे उन्होंने कभी भी हम
लोगों से इसका कोई हिसाब नही माँगा। विश्वास के ऊपर हम लोगों का काम
चलता था। इस प्रकार से और कुछ आदमी भी थोड़ी रकमों से हम लोगों की
सहायता करते थे। एक दफे मैं मेरठ के वैश्य अनाथालय में श्री विष्णुशरणजी
दुबलिस के यहाँ ठहरा था। विष्णुशरणजी उस समय वैश्य अनाथालय के अध्यक्ष
थे। एक दिन अनाथालय में अलीगढ़ के प्रसिद्ध व्यक्ति ठाकुर टोडरसिंहजी आए।