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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 408 में से

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पृष्ठ 288

286 / बन्दी जीवन
मैं एक पेड़ के नीचे चारपाई पर बैठा हुआ था। चारपाई पर बन्दी जीवन की दो-
एक प्रतियाँ पड़ी थीं। ठाकुर साहब मुझे पहचानते नहीं थे। टोडरसिंहजी बन्दी-
जीवन की एक प्रति को उठाकर लेखक के प्रति बहुत प्रशंसासूचक शब्द कहने लग
गए। इसके पहले दुबलिसजी ने मुझे बताया था कि ठाकुर टोडरसिंहजी एक धनी
जमींदार हैं, अच्छे व्यक्ति हैं। लेकिन यह भी कह दिया था कि अपना परिचय इन्हें
अभी न देना। दुबलिसजी समझते थे कि सम्भव है टोडरसिंहजी क्रान्तिकारी
आन्दोलन के प्रति सहानुभूति न प्रकट करे। दुबलिसजी किसी काम से घर के
अन्दर गए थे। बाहर चारपाई पर बैठे-बैठे टोडरसिंहजी से मेरी बातचीत होने
लगी। बातचीत के प्रसंग में मेरा परिचय पूछने पर टोडरसिंहजी को मैंने अपना
परिचय दे दिया। मैंने समझ लिया था कि टोडरसिंहजी से सहायता लेनी
असम्भव बात नहीं थी। लेकिन दुबलिसजी ने मेरा इस प्रकार से परिचय देना
पसन्द नहीं किया और बाद को यह कहकर मेरी खूब हँसी उड़ाई कि ज्योंही टोडर-
सिंहजी ने कहा कि बन्दी जीवन के लेखक को यदि मैं सामने पाता तो उनका पैर
छूता त्योंही सान्यालजी लपककर कह उठे कि मैं ही लेखक हूँ। आज भी दुबलिसजी
इस बात पर चुटकी लेते हैं यद्यपि यह बात सच नहीं है कि मैंने एकदम से
अपना परिचय टोडरसिंहजी को दे दिया था। टोडरसिंहजी से बात करते समय
मैंने यह अनुभव किया था कि ठाकुरसाहब पर प्रभाव डालने से कुछ काम निकल
सकता है। इसी गरज से उनके पूछने पर मैंने अपना परिचय दे दिया। परिणामतः
टोडरसिंहजी मुझे अपने स्थान पर ले गए। उन्होंने मुझे प्रेम से भोजन कराया,
और अन्त में मेरे एक आदमी को चालीस रुपया मासिक वेतन पर अपने यहाँ के
एक स्कूल में शिक्षक रखने के लिए वे राजी हो गए। टोडरसिंहजी क्रान्तिकारी
आन्दोलन के विशेष पक्षपाती नहीं थे तथापि इस प्रकार से उन्होंने हम लोगों को
चालीस रुपए मासिक देना स्वीकार किया था। टोडरसिंहजी महात्माजी के अनु-
रक्त अनुयायियों में से थे तथापि उनसे हम लोग यह सहायता लेने में समर्थ हुए
थे। लेकिन दुर्भाग्यवश जिस व्यक्ति को मैंने टोडरसिंहजी के स्कूल में भेजा था
वह व्यक्ति हम लोगों के काम के उपयुक्त न था। दो महीनों के बाद वह व्यक्ति
विप्लव कार्य से अलग हो गया। इसी व्यक्ति ने बनारस में मेरे विवाह के अवसर
पर मुझे चुभती हुई बातें सुनाई थीं। गनीमत यह थी कि सरल रूप से एक पत्र
द्वारा मुझे उन्होंने यह सूचना दी कि विप्लव कार्य से अब मैं अलग हो रहा हूँ
क्योंकि इस काम के लिए मैं अपने को उपयुक्त नहीं समझ रहा हूँ। यह घटना
सितम्बर सन् 1923 के पहले हुई। टोडरसिंहजी से हम लोगों ने और कोई विशेष
सहायता नहीं पाई।
मेरठ की एक और घटना विशेष उल्लेख योग्य है। यह घटना भी ढाका अनु-
शीलन समिति के साथ सम्बन्ध स्थापित होने के पहले ही हुई थी। मेरठ होकर मैं
लाहौर जानेवाला था। मेरे मनीबेग में पाँच सौ रुपए के नोट और कुछ रेज़गारी
थे। मेरठ स्टेशन से मनीबेग से दो दस-दस रुपए के नोट निकाले। मनीबेग को