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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 408 में से

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पृष्ठ 290

288 / बन्दी जीवन

कभी रुपया जाता था। इसके अलावा मुझसे प्रश्न करनेवाला तो कोई था नही।
मनीबेग गायब होने का किस्सा यदि मैं प्रकाश न करता तो किसी को क्या मालूम
होता। ये सब बातें होते हुए भी मेरे मन में एकाएक भय और लज्जा उत्पन्न हुई
थी।
मुझे वापस आते देखकर दुबलिसजी मेरे पास आकर हँसते हुए खड़े हो
गए और पूछा क्या बात है। गाड़ी छूट गई। मैंने कहा टाँगेवाले को तो कुछ दे दो
फिर बताता हूँ। टाँगेवाले को पैसे दे दिए और मैंने अपनी बेवकूफी की कहानी
कह सुनाई। सब बातें सुनकर क्रोध का और अविश्वास के स्थान पर मेरे प्रति
दुबलिसजी के हृदय मे दया का उद्रेक हुआ। मुझे आश्वासन दिलाकर दुबलिसजी
ने कहा कि आप आज रात-भर ठहर जाइए। मैं आपको कुछ रुपया लाकर देता
हूँ। मेरे लिए दुबलिसजी ने एक बण्डी भी दी जिसकी भीतरी तरफ एक जेब
थी। दूसरे दिन दुबलिसजी ने कही से दो सौ रुपए लाकर मुझे दिए। उस दिन से
आज तक मैं कभी भी मनीबेग कोट या कमीज के ऊपरी हिस्से मे नही रखता हूँ।
मेरे बदन में हमेशा एक बण्डी रहती है। उस बण्डी को छोडकर और कही मैं
पैसा नहीं रखता। जीवन में यह दूसरी बार हुआ था, जब मेरे जेब से रुपया
निकल गया। पहली बार हावडा स्टेशन मे एक दफे मेरे जेब से और कुछ रुपए
निकल गए थे।
मेरठ में रहते समय एक और सज्जन से मेरी जान-पहचान हुई थी जिसका
उल्लेख करना यहाँ पर अप्रासंगिक न होगा। उन सज्जन का नाम था चौधरी
विजयपालसिंह। हम लोगों के साथ उनकी गहरी सहानुभूति थी लेकिन हम लोगों
की सहायता करने का उन्हे अवसर नही मिला। उनके पास से मैंने एक किताब
ली थी उसका नाम है सोवियत कन्स्टिट्यूशन। सितम्बर सन् 1923 के पहले ही
मैंने इस प्रकार से सोवियत कन्स्टिट्यूशन को समझाने की चेष्टा की थी। सन्
1923 में दिल्ली कांग्रेस के बाद मैंने कम्युनिज्म को समझने के लिए अच्छी तरह
से चेष्टा की उसी समय सोवियत कन्स्टिट्यूशन से भी यथेष्ठ लाभ उठाया। यह
किस्सा बाद का है। दुबलिसजी के साथ मेरी गहरी मित्रता हो गई थी। दुबलिस-
जी का घर था मेरठ जिले के मवाना ग्राम में। मवाना से हस्तिनापुर बहुत क़रीब
है। दुबलिसजी ने अपने घर ले जाने के लिए मुझसे विशेष आग्रह किया था और
कहा था कि मवाना से हस्तिनापुर बहुत क़रीब है ओर हस्तिनापुर देखने योग्य
स्थान है। ऐसा कौन-सा भारतवासी होगा जिसके हृदय मे हस्तिनापुर का नाम
सुनकर चांचल्य पैदा न हो। इन्द्रप्रस्थ हस्तिनापुर और दिल्ली ये तीन नाम
भारत के इतिहास में मानो एक सूत्र में ग्रथित है। लेकिन मुझमें एक बुरी आदत है
कि जिस काम के लिए जहाँ जाता हूँ उसको छोड़कर एक तिल-भर भी इधर-उधर
जाना मुझसे नहीं होता। यह एक त्रुटि है। व्यापक रूप मे किसी चीज को न देखना
एक अपूर्णता है। मैं अपने कामों मे ऐसा उलझा हुआ रहता था कि दो दिन की
जगह तीन दिन एक स्थान पर रहना मेरे लिए कठिन हो जाता था। मैं आज