बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकाशित कर दूँ। मुझे जहाँ तक पता है उससे मैं कह सकता हूँ कि भारत के और
किसी भी विप्लव दल ने ऐसी चेष्टा नहीं की थी जैसी कि हमारे दल के द्वारा
हुई थी ! सरदार गुरुमुखसिंह के दल में अवश्य ऐसी चेष्टा सफलतापूर्वक हुई
थीं।
उस व्यक्ति का नाम आज मैं भूल गया हूँ जिसे हम लोगों ने काश्मीर की
प्रसिद्ध सरहद गिलगिट में एवं पेशावर की सरहद जमरूद इत्यादि की तरफ भेजा
था। हम लोगों का उद्देश्य यह था कि इन सरहदों के जरिए से बाह्य जगत् से
भारत के विप्लव आन्दोलन का योग सूत्र स्थापन किया जाय। इस व्यक्ति ने कई
महीनों तक भीषण कष्ट सहन करते हुए गिलगिट के आसपास में मुसीबत के
दिन बिताए थे। उनकी सहायता से हम लोगों को यह पता चला था कि भारत
और चीन के लिए गिलगिट के रास्ते से व्यापारी आते-जाते हैं, लेकिन उनकी
बड़ी सख्त निगरानी होती है। महीनों तक का रसद साथ लेकर इन रास्तों से
गुज़रना पड़ता था। धन और बुद्धि से काम लेने पर इस रास्ते से अस्त्र-शस्त्र
मंगाना असंभव बात नहीं थी। आज अवश्य इन रास्तों से अस्त्र मँगाने की
आवश्यकता नहीं है। लेकिन जिन दिनों की बात यहाँ लिख रहा हूँ उन दिनों में
हम लोग विदेश से बड़े पैमाने में अस्त्र-शस्त्र मँगाने का रास्ता ढूंढ़ रहे थे। यदि
मैं शीघ्र पकड़ा गया न होता तो संभव है, हमारा विप्लव आन्दोलन कुछ और ही
रंग-रूप ग्रहण किए होता। गिलगिट के रास्ते के अलावा पेशावर के रास्ते का
भी हम लोगों ने भली प्रकार से निरीक्षण कर लिया था। अवश्य ही ब्रिटिश
सरकार को यह पता है कि पेशावर के रास्ते से बाहर के विप्लवकारियों का
गुजरना संभव एवं स्वाभाविक है।
सन् 1923 के सितम्बर मास में देहली में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन हुआ
था। ऐसे अवसरों पर भारत के प्रत्येक प्रांत से हर प्रकार के मनुष्य आया करते
हैं। इस कारण कांग्रेस के अधिवेशन के समय अन्तर प्रांतीय संगठन का कार्य बहुत
आगे बढ़ जाता है। देहली के कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के समय मैंने कराची के
अध्यापक गिडवानी साहब, श्री कुरेशी साहब (जो कि एक समय महात्मा गांधी
के 'यंग इंडिया' के सम्पादक भी रह चुके थे), महाराष्ट्र के हार्डीकर साहब
मिर्जापुर के बैरिस्टर श्री यूसुफ इमाम साहब, बुन्देलखण्ड के दीवान शत्रुघ्नसिंह
आदि से बातचीत की थी। अध्यापक गिडवानी साहब जानना चाहते थे कि
क्रान्तिकारी आन्दोलन के साथ देशबन्धु चितरंजनदास का कहाँ तक सम्बन्ध था।
मैं भी जानना चाहता था कि क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे में गिडवानी साहब
की क्या धारणा है। उनसे बातचीत करने पर मुझे यह निश्चय हो गया था कि
गिडवानी साहब अहिंसा नीति को सिद्धान्त के तौर पर नहीं मानते थे। नीति
के हिसाब से भी हिंसा और अहिंसा के रास्ते पर उनकी कोई निश्चयात्मक
धारणा नहीं थी। जिस समय की बात मैं लिख रहा हूँ उस समय गिडवानी
साहब राष्ट्रीय विद्यालय के अध्यापक थे। अपने प्रांत के नवयुवकों में उनकी