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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 408 में से

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पृष्ठ 299

उत्तर भारत में दल का विस्तार / 297
भेज दी। अमेरिका के लिए प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्र 'दि न्यू रिपब्लिक' मे यह अपील
ज्यो-की-त्यों छप गई और उसके साथ श्री तारकनाथदासजी ने भी इस अपील के
महत्त्व के बारे मे एक लेख लिखा। जापान से रासबिहारी बोस ने उस पत्र की
एक प्रति मेरे पास भेजी थी। सम्भवतः इस अपील की एक प्रति महात्माजी के
यंग इण्डिया को भी भेजी गई थी। भारत मे इस अपील के विषय मे कोई चर्चा
नही हुई।
बंगाल के उपन्यासकार श्री शरत्चन्द्र चटर्जी से एक सम्वाद सुनकर हम
चकित हो गए। शरत् बाबू भी हम लोगो की भाँति महात्माजी के अन्ध भक्त
नही थे। यो तो बंगाल के अधिकांश व्यक्ति महात्माजी के अन्ध भक्त नही है
फिर भी जब शरत् बाबू जैसे व्यक्ति की सम्मति हमारी सम्मति से मिल गई तो
हमे बडी खुशी हुई। इस प्रकार महात्माजी के बारे मे चर्चा करते समय वारदोली
के सत्याग्रह को इसलिए स्थगित नही किया गया था कि चौरीचौरा मे हिंसात्मक
काण्ड हो गया बल्कि बारदोली के किसान पहले ही से सालभर का लगान
सरकार को दे चुके थे। केवल इतना ही नही यह भी खबर थी कि बारदोली के
किसानो ने अपनी हटाने योग्य सारी वस्तुएँ अपने मकानों से अलग कर दी थी।
गुजरात के एक सब डिवीजनल अफ़सर ने यह संवाद महात्माजी को दिया था इस
पर महात्माजी ने अपने विश्वस्त व्यक्ति को बारदोली भेजा था। उसने भी
महात्माजी के पास एस० डी० ओ० की बातों को सही बताया। ऐसी अवस्था मे
बारदोली के सत्याग्रह आन्दोलन को स्थगित कर देने के अतिरिक्त महात्मा के
पास और रास्ता ही क्या रह गया था।
उत्तर भारत के विप्लववादी आन्दोलन के सम्बन्ध में देहली के कांग्रेस
अधिवेशन के विशेष अवसर पर दो महत्त्वपूर्ण बाते हुई थी जिनका उल्लेख इस
स्थान पर करना विशेषतः आवश्यक है।
कांग्रेस के इस अधिवेशन के पहले ही मै इलाहाबाद के श्री पुरुषोत्तमदास
टंडन से भली प्रकार परिचित हो चुका था। टंडनजी अच्छी तरह से जानते थे
कि हम लोग गुप्त रीति से क्रान्तिकारी आन्दोलन मे लगे हुए हैं। हम लोगों के
प्रति उनकी पूर्ण सहानुभूति थी। परन्तु वास्तविक क्षेत्र में हम लोगों ने उनकी
सहानुभूति से कुछ लाभ नही उठा पाया। टंडनजी अपरिवर्तनवादी थे। देहली
कांग्रेस मे यह प्रस्ताव पास हो गया कि कांग्रेस जन लेजिस्लेटिव कौंसिल के सदस्य
बनकर उसके कार्य मे भाग ले सकते हैं। सत्याग्रह आन्दोलन एक बार व्यर्थ हो
चुका था। अपना आन्दोलन समाप्त होने पर महात्माजी राजनीतिक क्षेत्र से
कुछ दिनो के लिए अलग हो जाते हैं। किसी आन्दोलन के विफल हो जाने पर
जनता मे अवसाद छा जाता है। आशा भंग के आघात से जब जनता उत्साह
और उद्यमहीन हो जाती है ऐसी अवस्था में महात्माजी कार्यक्षेत्र से अलग हो
जाते हैं। अवसाद के दिनों में अन्य नेतागण राष्ट्रीय आन्दोलन को चलाते हैं।
फिर जब आन्दोलन उग्र रूप धारण करता है तो फिर महात्माजी कार्य क्षेत्र में