बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तर भारत में दल का विस्तार / 295
इस काम में विपिन गांगुली की पूर्ण सहानुभूति थी। उन्होंने यह कहा था कि वे
ऐसा आन्दोलन तो खूब चाहते हैं लेकिन कठिनाई तो पैसे की है। अर्थ के बिना
कोई भी आन्दोलन चलाया नहीं जा सकता। मुझे कुछ अर्थ पाने की पूर्ण आशा
थी। इसलिए मैं इस कार्य में पूर्ण उद्यम से लगना चाहता था। गांगुली साहब ने
मुझे यह वचन दिया था कि पैसे की बात को छोड़कर अन्य सब बातों में वे मेरे
साथ पूर्ण रूप से सहयोग करेंगे।
इस अपील को लेकर मे सुभाष बाबू के पास भी गया था। उन्होंने इस
अपील को बहुत गम्भीर तथा शान्तचित्त होकर पढ़ा। इस विषय पर मेरे साथ
उनका कुछ वाद-विवाद भी हुआ। सुभाष बाबू का कहना था कि अभी वह समय
नही आया है कि मे कांग्रेस के कार्यक्रम से भिन्न किसी अन्य कार्यंक्रम को लेकर
चलूँ । उनका यह भी कहना था कि एक ही व्यक्ति के लिए गोपनीय एवं प्रकाश्य
आन्दोलन मे काम करना उचित नहीं है।
सुभाष बाबू के साथ क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे मे बातचीत करने का
मेरा यह प्रथम अवसर था। मे चाहता था कि सुभाष बाबू हमारे आन्दोलन का
नेतृत्व ग्रहण करे। नेतृत्व के बारे मे मेरे दिल मे कोई ऐसी भावना नही थी कि मैं
दूरा रे का नेतृत्व स्वीकार न करूँ। वरन सुभाष बाबू को यदि मे अपने नेता के
पद पर बैठा सकता तो मेरे आनन्द की सीमा न रहती। यही सब बातें मैने
सुभाष बाबू को समझानी चाही। सुभाष बाबू ने एकाग्रचित्त होकर मेरी बाते
तो सब सुन ली परन्तु उन्होने अपना कोई स्थिर मत नही व्यक्त किया। उन्होंने
बार-बार यही कहा कि अभी मेरा समय नही आया है। अन्त मे यह निश्चय
हुआ कि मे उनमें कलकत्ते मे फिर मिलूं। इस निश्चय के अनुसार मे उनसे
कलकत्ते में फिर मिला। यथास्थान इसका वर्णन विस्तारपूर्वक आगे किया
जाएगा। सुभाष बाबू ने मेरी लिखी हुई अपील पर अन्त तक हस्ताक्षर नही
किए।
बंगाल के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी दल अनुशीलन समिति के नेताओं के पास भी
मे गया था। अब तक इस समिति के साथ मेरा बिगड़ा हुआ सम्बन्ध सुलझा
नही था। इसलिए मुझे इस बात का विशेष आग्रह न था कि अनुशीलन समिति
के नेतागण मेरी अपील पर अवश्य ही अपने हस्ताक्षर कर दें। थोडे शब्दों में
मैंने उन्हें अपना आशय समझाया। पहले तो उन्होंने अपने हस्ताक्षर देने में
आनाकानी की। मैने भी उनसे अधिक अनुरोध नही किया। उनकी इस आना-
कानी को देखकर मैने भी कुछ लापरवाही से यह कह दिया कि यदि आप इस
अपील पर हस्ताक्षर करना उचित न समझें तो न कीजिए। मेरी उदासीनता
को देखकर वे कुछ सोच में पड़ गए। न जाने क्या समझकर मुझसे उन्होंने
कहा कुछ देर ठहर जाएँ हम आपस में परामर्श कर लें। कुछ देर के बाद उनमे
से कुछ ने प्रतिनिधि की हैसियत से अपील पर हस्ताक्षर कर दिए। लेकिन
उनका दृष्टिकोण कुछ ओर ही था। मे यह चाहता था कि क्रान्तिकारी नेतागण