बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तर भारत में दल का विस्तार / 287
फिर कोट के ऊपरी जेब में रख दिया। टिकट लेने गया। उस समय खिड़की के
सामने दो ही चार आदमी थे लेकिन फिर भी उन दो-चार आदमियों में ही जाते
समय कुछ धक्कम-धक्का हुआ। उस समय मैं समझ नहीं पाया कि धक्कम-धक्का
करना गिरहकटों की एक तरकीब है। बाद को जेल में इस तरकीब का पता
चला था। एक आदमी यदि किसी को धक्का देता है तो स्वभावतः ही धक्का खाने
वाला धक्का देने वाले की तरफ देखता है। थोड़ी देर के लिए उसका पूर्ण ध्यान
धक्का देने वाले के प्रति आकृष्ट रहता है। इसी अवसर पर गिरहकट अपनी
कारीगरी दिखला देते हैं। उस ज़रा-सा ही धक्कम धक्के के बाद जब मैंने खिड़की
के सामने आकर लाहौर का टिकट माँगा तो टिकट बाबू ने कहा कि गाड़ी आने
में अभी देर है टिकट अभी नहीं बटेगा। जब मैंने खिड़की से बाहर आकर नोट
अपने मनीबेग में रखना चाहा तो देखा मनीबेग गायब है। मेरे होश-हवास
बिलकुल उड़ गए। किंकर्तव्यविमूढ की तरह रह गया, क्या कहूँ और क्या न
कहूँ कुछ समझ में नहीं आया। अवश्य मेरे मुँह से यह निकला होगा कि अरे
मनीबेग गायब है क्योंकि किसी ने मुझसे कहा कि जाओ पुलिस में इत्तला दे दो।
इत्तला भी देता तो पुलिस को अपना नाम-धाम क्या बताता। यदि मैं अपना असल
नाम बताता हूँ और यह कहता हूँ कि मेरठ में आकर वैश्य अनाथालय में मैं
ठहरा था तो भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर पुलिस को इस बात का प्रमाण मिल
जाता कि दुबलिसजी के साथ मेरा सम्बन्ध है। लेकिन फिर भी मैं रेलवे थाने में
गया एक पुलिस का हेडकानस्टेबुल दौड़कर मेरे साथ टिकट बाँटने के जंगले के
सामने आया। वहीं के लोगों से कुछ पूछताछ की कि कौन टाँगावाला यहाँ था
कौन गया है, उसका कोई जान-पहचान का आदमी उस समय उस स्थान पर था
या नहीं इत्यादि बातों को जानकर फिर हम लोग रेलवे थाने में वापस आए।
मुझसे पूछा गया कि मेरठ में मैं कहाँ ठहरा था। मैंने बता दिया कि वैश्य यतीम-
खाने में ठहरा था। पुलिसवालों ने मुझसे पूछा कि रिपोर्ट लिखूँ या नहीं। मैंने
बताया कि झूठ-मूठ लिखने से क्या फायदा, रुपया मिलना तो है नहीं। लेकिन यह
भी मैंने बताया कि मनीबेग में पाँच सौ रुपए के नोट थे। यदि रुपया वापस मिल
जाय तो पता लगानेवाले को आधा दे दूंगा। रिपोर्ट नहीं लिखवाई। दिल छोटा
करके पुलिस के दफ्तर से फिर उसी टिकटघर के सामने आकर खड़ा हो गया और
सोचा कि मैं कितना बड़ा बेवकूफ हूँ। अब कौन-सा मुँह लेकर कहाँ वापस जाऊँ।
कितनी मुश्किल से तो रुपये मिलते हैं। बड़ी मुसीबत है। थोड़ी देर तक इस
प्रकार के विमर्श के बाद दुबलिसजी के यहाँ वापस जाना ही ठीक समझा। मेरे
दिल में यह एक अत्यन्त भय हो रहा था कि दुबलिसजी और मेरे अन्य साथी मेरे
ऊपर यह सन्देह न करने लग जाएँ कि मैं रुपए हजम कर बैठा हूँ। यदि ऐसा
होता तो मैं मिट्टी में मिल जाता। लेकिन ये रुपए मैं जहाँ से लाता था उसका
पता हमारे दल के और किसी को न था। मुझे छोड़कर और दो व्यक्तियों को
इसका पता रहता था। एक तो देने वाले और दूसरा वह जिसके जरिए से मैं कभी-