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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 408 में से

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पृष्ठ 285

श्री मोतीलालजी, जवाहरलालजी तथा श्री सी० आर० दास से भेंट / 283
अथवा भतीजे थे । सब बातें आज याद नहीं हैं लेकिन इतना याद है कि देशबन्धु
अत्यन्त उत्तेजित होकर तीव्र स्वर से भर्त्सना व्यंजक शब्दों में मेरे प्रत्येक प्रश्न
का उत्तर दे रहे थे । उत्तेजित होने से युक्ति स्थिर नहीं रहती है । अन्त में उस
तीसरे सज्जन से रहा नहीं गया । मेरे पक्ष को लेकर उन्होंने भी श्री सी० आर०
दासजी से बहस की । मुझे इस समय अपना एक प्रत्युत्तर याद है । दासजी अहिंसा
नीति के पक्ष में तीव्र रूप से वाद-विवाद कर रहे थे और उन्होंने अन्त में यह कहा
था कि पाशविक बल से आत्मिक बल कहीं अधिक प्रबल है । तुम लोग शारीरिक
बल पर अत्यधिक ध्यान दे रहे हो आत्मिक बल पर नहीं । इस पर मैंने यह उत्तर
दिया था कि "आप हम लोगों को गलत समझ रहे हैं । आप समझते हैं कि पिस्तौल
या बन्दूक का चलाना एक पाशविक बल मात्र है । आप भूल जाते हैं कि ट्रीगर
(Triger) का खींचना पाशविक बल से नहीं होता है । ट्रीगर को खींचने के पीछे
कुछ कम आत्मिक बल की आवश्यकता नहीं होती । एक पहलवान भी तो ट्रीगर
खींच सकता है लेकिन पहलवान होने से ही वह क्रान्तिकारी आन्दोलन में भाग
लेगा ऐसी बात नहीं है । आत्मिक बल रहे बिना क्या कोई व्यक्ति क्रांतिकारी
आन्दोलन मे सम्मिलित हो सकता है । एक तरुण वयस्क युवक पहलवान की अपेक्षा
कही कम शारीरिक बल रखता है लेकिन विप्लवकार्य में यह तरुण युवक महज ही
मे ट्रीगर खींच सकेगा लेकिन पहलवान वह ट्रीगर नही खींच सकता । ट्रीगर
खींचने को आप पाशविक बल क्यों समझ रहे हैं ।"
इसी प्रकार से एक और बात मुझे अब भी खूब याद है । यह बात सहायता
पाने के सिलसिले में ही हुई थी । किस नीति के अनुसार क्रान्तिकारी आन्दोलन
सफल होगा उसके बारे मे बातचीत हो रही थी । जब सब प्रश्नों का उत्तर मैंने
सफलता पूर्वक दे दिया तो अन्त में दास जी ने यह प्रश्न किया कि "अच्छा मान लो
और सब बात ठीक है, लेकिन आम जनता को किस प्रकार से तुम लोग अपने
साथ लोगे ? तुम लोगों के कार्यक्रम में जनता का साथ लेने का कोई विधान नही
है । जनता को साथ लिये बिना कोई भी क्रान्तिकारी आन्दोलन सफल नही हो
सकता ।" मैंने इसके उत्तर मे कहा था, "आम जनता को साथ लेना हम लोग अधिक
कठिन बात नही समझते है । इस बात को ले लीजिए, कलकत्ता के आसपास दस-
पन्द्रह मील के अन्दर जितने कारखाने है उनमें कम-से-कम दस-ग्यारह लाख
मजदूर काम करते होगे । तीन-चार महीने के परिश्रम से इन कारखानों मे हड़ताल
करा देना विशेष कठिन बात नही है । इतनी बडी हड़ताल के अवसर पर
मिलिटरी, पुलिस और पलटन कारखानों की रक्षा के लिए अवश्य आ जाएगी ।
ऐसे मोकों पर मजदूरों को भडका देना कोई कठिन बात नही है । ऐसी परिस्थिति
में यदि हमारे पास फ़ौजी शिक्षा प्राप्त किये हुए उपयुक्त व्यक्ति आवश्यक संख्या में
हों और अपने प्रयोजन के अनुसार उपयुक्त संख्या में अस्त्र-शस्त्र भी हो तो क्या,
क्रान्ति का प्रारम्भ करना कुछ कठिन बात है । ऐसी अवस्था में क्या जनना हमारा
साथ नही देगी ?" मुझे याद है दासजी इसका कोई उत्तर नही दे पाए थे ।